धर्म का ताला

सुधीर राघव

मन पर लटका
धर्म का ताला
और भ्रम का जाला 
रोशनी को अंंदर नहीं आने देता

अंधेरे से डरता है आदमी
भटकता है आदमी
गुरु की तलाश में
जो ज्ञान का ताला लिए
उसे ही ढूंढ रहा है

मन पर एक और ताला
भ्रम का एक और जाला
अंधेरे से घबराकर
भटकता है आदमी
ईश्वर की तलाश में
जो माया के ताले में
बांध रहा है सबको

मन पर एक और ताला
भ्रम का एक और जाला
अंधेरे से घबराकर
भटकता है आदमी
प्रेम की तलाश में
जो रिश्तों का बंधन लिए
ढूंढ रहा है उसे ही

सात तालों में कैद मन
तरसता है रोशनी को
जो उस अबोध बच्चे के मन में बरस रही है
वह जन्मा है अभी अभी
उसका मन खुला कपाट
नहीं है कोई ताला
न कोई जाला
उसकी मुस्कान तो देखो।



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