इस लंगड़े को देखकर लार टपक जाएगी

आदमी जब आम नहीं हुआ था, खास था। आम तब भी लंगड़ा था।
आम के लंगड़े होने में जो खासियत है। स्वाद है । महक है। वह न तो उसके दशहरी होने में है, न सफेदा, न चौसा, न तोतापरी, न अलफांसों, न मालदा, न फजली,  न नीलम और न देसी होने में हैं।

भोले की नगरी काशी से जुड़कर मोदी जी तो दुनिया में  अब मशहूर हुए हैं मगर काशी का लंगड़ा तो ढाई सदी से मशहूर है। अकेले मोदी जी ही नहीं, रामनगर का लंगड़ा भी दुनिया घूम रहा है।

आम को खाना भी एक कला है। आम की हर किस्म को खाने का एक अलग सही तरीका है। देसी डाल का पका हो तभी खाएं मगर अब इसके दर्शन दुर्लभ हैं। देसी को डंडी वाली साइड से खुरच कर हल्का जमीन की ओर निचोडे़ं। रस कीदो तीन बूंदें टपक जाने दें तब चूसें। नहीं तो इसका कसैला चैंप आपका मुंह पका देगा। इसकी गुठली में रैशों का गुच्छा और जूस ही होता है। आपको गुठली ही करीने से चूसनी होती है।

सफेदा को आप चाकू की मदद से गुठली के दोनों ओर से दो फांकों में काट लें। फिर फांक को छिलके सहित हथेली पर रखें और दूसरेहाथ से चम्मच से गूदा निकालकर ऐसे ही खाएं जैसे कप से निकालकर आइसक्रीम खाते हैं।

चौंसा भी देसी आम की तरह ही चूसकर खाएं। इसकी गुठली में रेसे नहीं होते और इसे हथेली से दबाते हुए चूसने पर इसका गूदा ही जूस बन जाता है और रसीला स्वाद देता है।

तोतापरी या पैरी आम खटास की वजह से खाया कम जाता है और जूस बनाने वाली कंपनियों का पसंदीदा है। देखने में सुंदर है,  सलाद के टेबल पर निखरता है।

दसहरी को आप चूसकर औरचाकू से काटकर जैसे चाहे खाएं। चूसकर खाएं तो थोड़ा सावधानी बरतें। दबाव का संतुलन बिगड़ते ही इसका छिलका कहीं से भी फट सकता या गुठली उछल कर आपके कपड़े गंदे कर सकती है।

लंगड़ा को आप छुरी कांटे की मदद से प्यार से खाएं। छुरी लगाकर हलका सा खींचने पर इसका छिलका जिस  अंदाज में गूदे को छोड़कर उतरता है। वह आपको सम्मोहित कर देगा। फिर आप छुरी से गूदे के छोटे छोटे पीस काट लें और कांटे से खाएं।

आम की कोई भी किस्म हो उसे ठंडाकर ही खाएं।

Comments