बागबान -2

रवि चोपड़ा को जल्द ही फिल्म बागबान -2  बनानी चाहिए ।

मगर इसकी स्टार कास्ट में अमिताभ और हेमा जी को नहीं लेना चाहिए ।

उनकी जगह यह फिल्म गाय और नंदी की व्यथा की कथा कहे। अन्य पात्रों में सरकार और उन गुंडों को रखा जाए जो अपनी गोमाता और गोपापा के लिए कानून बनाने और लड़ने मारने पर तो उतारू रहते हैं मगर उन्हें पालने की जगह सड़कों पर छोड़ देते हैं। समाज के बारबार टोकने पर ये संतानें यानी सरकार और गुंडे लोगों से ही चंदा वसूल कर जनता की  जमीन पर दूर दूर गोशाला और  नंदीशाला बनाकर गोमाता और गोपापा को अलग-अलग कैद कर देते हैं।

इस सिचुएशन पर एक गाना हो सकता है। गोमाता की आंखों से आंसू बहते हैं। नंदी का भी कुछ खाने को मन नहीं करता।
गोशाला और नंदीशाला के दो रहम दिल कारिंदे तब मोबाइल पर गाय और नंदी की बात कराते हैं।

इधर से गाय कहती है बां.. .  । उधर से नंदी कहता है बां.. . . । दोनों की आंखों से आंसू झरते हैं। कैमरा क्लोज होता है।

अगला सीन एक विदेशी लोकेशन पर.. .

सरकार और गुंडे अपनी गोमाता और गोपापा को भूल जनता से वसूले गये पैसे से पार्टी कर रहे हैं।

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