दीमक सरकार

सुधीर राघव


हर बार
और
हर सरकार
देश का विकास नहीं करती

एक दीमक सरकार भी होती है
जो चाटती है
खोखला करती है
देश को
जातीय दंगों से
धर्म के पंगों से

जो काटती है
और बांटती है
देश को
तन की भूख से
मन की बात से
बेरोजगारी से
लाचारी से

नफरत की आग से
जब मन की नमी सूख जाती है
तब पनपते हैं
उसमें दीमक
जो चाटते हैं देश की आत्मा को
और उनके
हगे-मूते से
जो कीचड़ बनता है
उसमें कमल खिलते हैं।।


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