तेजबहादुर दाल में देखो

सुधीर राघव


ऊपर से आदेश नहीं है
नीचे सैनिक पिटते हैं
तेजबहादुर दाल में देखो
देश के सपने पलते हैं

नेता अफसर मुर्गा खाएं
सरहद पर सिर कटते हैं
छप्पन इंच का सीना लेकर
दुश्मन के पांव पकड़ते हैं

गाय माता तुम्ही विधाता
सांड सड़क पर फिरते हैं
सोनचिरैया उठा गठरिया
अब रामराज को चलते हैं

कागज ही पहचान बना
यहां इंसानो की बस्ती में
हाथों में आधार लिए
सब जिंदा मुर्दे लगते हैं

काला कूकुर खाए गुलगुले
भूखे बाल बिचरते हैं
शनि महाराज व्याकुल हैं
क्यों मूर्ख तेल चुपड़ते हैं

तेज बहादुर दाल में देखो
देश के सपने पलते हैं।।


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