उधार का अधनंगा राष्ट्रवाद-4 : भारतेंदु ने रेंग रहे लोगों को उठाया

सुधीर राघव



पिछले लेख में हमने चर्चा की थी कि कैसे डफर‌िन रिपोर्ट ने अंग्रेजों की ही पोल खोल दी और लार्ड डफर‌िन को वायसराय के पद से व‌िदा होना पड़ा। पर जाने से पहले वह कांग्रेस की नींव डलवा गए। उनके बाद आए अंग्रेज वायसरायों को एकजुट होते भारतीय अंग्रेज शासन के लिए बड़ा खतरा नजर आने लगे और फूट की राजनीत‌ि को हथ‌ियार बनाया गया।

इससे पहले हम और वायसरायों की बात करने के लिए बीसवीं सदी में कूद जाएं, उन्नीसवीं सदी के उत्तर्राध की महान प्रत‌िभाओं की अनदेखी से बात अधूरी रहेगी। ये विभूत‌ियां भारत की दुर्दशा से खिन्न थीं और सद‌ियों की गुलामी से दयनीय जीवन जी रहे हिंदुओं को शिक्षा और प्रगत‌ि की राह पर लाने के लिए च‌िंत‌ित थीं।  
   
 इनमें से एक चमकदार नाम है भारतेंदु हर‌िश्चंद्र का। उन्हें खड़ी हिंदी भाषा साह‌ित्य के जनक के रूप में जाना जाता है। उनसे पहले हिंदी साह‌ित्य के नाम पर ब्रज और अवध‌ि या फिर कबीर की पंचमेल भाषा है। 1850 में जन्में भरतेदु सिर्फ पैंतीस वर्ष तक ही जीये। मगर अपने इस जीवनकाल में उन्होंने हिंदी भाषा के लिए इतना काम किया क‌ि आधुन‌िक हिंदी का पहला युग उनके नाम से ही जाना जाता है। पश्च‌िमी बोली, जो ऊर्दू की जमीन मानी जाती थी, उसमें उन्होंने सेंध लगा दी थी। फारसी के अक्षर देवनागरी में और प्रभावशाली हो रहे थे। युवा जोश और व्यंग की धार से भारतेंदु भारत और खासकर हिंदुओं के कायाकल्प के लिए जुटे थे। अठारह वर्ष की उम्र में उन्होंने कव‌िवचनसुधा पत्र‌िका न‌िकाली। हिंदी के लिए वह क‌िसी से भी लोहा लेने को तैयार था। उस दौर के अखबारों ने उस दौर में जब ऊर्दू  के कमजोर करने पर च‌िंता जताई तो उन्होंने खुलकर मजाक उड़ाया--
   
अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट और बनारस अखबार के देखने से ज्ञात हुआ कि बीबी उर्दू मारी गई और परम अहिंसानिष्ठ होकर भी राजा शिवप्रसाद ने यह हिंसा की-- हाय हाय ! बड़ा अंधेर हुआ मानो बीबी उर्दू अपने पति के साथ सती हो गई । यद्यपि हम देखते हैं कि अभी साढ़े तीन हाथ की ऊँटनी सी बीबी उर्दू पागुर करती जीती है, पर हमको उर्दू अखबारों की बात का पूरा विश्वास है । हमारी तो कहावत है-- "एक मियाँ साहब परदेस में सरिश्तेदारी पर नौकर थे । कुछ दिन पीछे घर का एक नौकर आया और कहा कि मियाँ साहब, आपकी जोरू राँड हो गई । मियाँ साहब ने सुनते ही सिर पीटा, रोए गाए, बिछौने से अलग बैठे, सोग माना, लोग भी मातम-पुरसी को आए । उनमें उनके चार पाँच मित्रों ने पूछा कि मियाँ साहब आप बुद्धिमान होके ऐसी बात मुँह से निकालते हैं, भला आपके जीते आपकी जोरू कैसे राँड होगी ? मियाँ साहब ने उत्तर दिया-- "भाई बात तो सच है, खुदा ने हमें भी अकिल दी है, मैं भी समझता हूँ कि मेरे जीते मेरी जोरू कैसे राँड होगी । पर नौकर पुराना है, झूठ कभी न बोलेगा।" जो हो बहर हाल हमैं उर्दू का गम वाजिब है " तो हम भी यह स्यापे का प्रकर्ण यहाँ सुनाते हैं । हमारे पाठक लोगों को रुलाई न आवे तो हँसने की भी उन्हें सौगन्ध है, क्योंकि हाँसा-तमासा नहीं बीबी उर्दू तीन दिन की पट्ठी अभी जवान कट्ठी मरी है ।


है है उर्दू हाय हाय । कहाँ सिधारी हाय हाय ।
मेरी प्यारी हाय हाय । मुंशी मुल्ला हाय हाय ।
बल्ला बिल्ला हाय हाय । रोये पीटें हाय हाय ।
टाँग घसीटैं हाय हाय । सब छिन सोचैं हाय हाय ।
डाढ़ी नोचैं हाय हाय । दुनिया उल्टी हाय हाय ।
रोजी बिल्टी हाय हाय । सब मुखतारी हाय हाय ।
किसने मारी हाय हाय । खबर नवीसी हाय हाय ।
दाँत पीसी हाय हाय । एडिटर पोसी हाय हाय ।
बात फरोशी हाय हाय । वह लस्सानी हाय हाय ।
चरब-जुबानी हाय हाय । शोख बयानि हाय हाय ।
फिर नहीं आनी हाय हाय ।   (भारतेंदु हर‌िश्चंद्र)


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हिंदी के समर्थन में उन्होंने कई दोहे भी ल‌िखे। यहां तक क‌ि उन्होंने अंग्रेज शासकों की परवाह क‌िए बगैर अंग्रेजी पर भी अपनी भाषा को तवज्जो दी। भारतेंदु के कुछ ऐसे दोहे देख‌िए--

अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।  

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।  

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय।

सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।


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 अंग्रेजी और अंग्रेजों का मजाक उड़ाने के लिए उन्होंने महागणपत‌ि स्तोत्रम् की तर्ज पर अंग्रेज - स्तोत्र ल‌िख डाला था--


विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
स्टारार्थी लभते स्टारम् मोक्षार्थी लभते गतिं ।।
एक कालं द्विकालं च त्रिकालं नित्यमुत्पठेत।
भव पाश विनिर्मुक्त: अंग्रेज लोकं संगच्छति ।।
अर्थात इससे विद्यार्थी को विद्या , धन चाहने वाले को धन , स्टार-खिताब-पदवी चाहने वाले को स्टार और मोक्ष की कामना करने वाले को परमगति की प्राप्ति होती है । जो प्राणी रोजाना ,नियम से , तीनो समय इसका- (अंग्रेज - स्तोत्र का) पाठ करता है वह अंग्रेज लोक को गमन करने का पुण्य लाभ अर्जित करने का अधिकारी होता है ।

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 उस काल में ज्यादातर ह‌िंदुओं की हालत दयनीय थी। अंग्रेज शासन ही नहीं उन्हें पंडावाद और महाजन भी खुलकर लूट रहे थे। गुलामी के बोझ से वह स‌िर्फ घुटनों के बल नहीं थे, बल्क‌ि उनका आत्मविश्वास जमीन पर रेंग रहा था। भारतेंदु उन्हें भाषा और देश के गौरव का भान करवाकर झकझोर कर जगा रहे थे। उनका राष्ट्रवाद भारतवास‌ियों के लिए तरक्की की कोई राह खोज रहा था। मगर उनके प्रयास कुछ अन्य समुदायों को नराज करने वाले थे।  भाषा और संप्रदाय के नाम पर नए तरह के टकराव सामने आने वाले थे।  (क्रमशः)

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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (20-03-2017) को

चक्का योगी का चले-; चर्चामंच 2608
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
शास्त्री जी आभार

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