उधार का अधनंगा राष्ट्रवाद-2 : बंक‌िम ने कैसे बोए नफरत के नए बीज



सुधीर राघव

पिछले लेख में आपने पढ़ा क‌ि आनंदमठ के जरिए बंक‌िमचंद्र ने किस तरह मुसलमानों के खिलाफ झूठा राष्ट्रवाद खड़ा किया, जो अंग्रेजों के चरणों में नतमस्तक था। किस सफाई से उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ हुए संन्यासी विद्रोह की सच्ची संघर्षगाथा को मुस्ल‌िमानों के खिलाफ काल्पन‌िक जहर उगलती उपन्यास गाथा में बदल दिया। इसके लिए उन्होंने न केवल इत‌िहास के साथ खिलवाड़ क‌िया, बल्क‌ि वह घटनाकाल भी अठारवीं सदी से उठा कर सीधे बारहवीं सदी में ले गए। (1174 में फसल अच्छी नहीं हुई, अत: ग्यारह सौ पचहत्तर में अकाल आ पड़ा- भारतवासियों पर संकट आया। ----आनदमठ से) बंकिम की काल गणना को हिजरी मानकर  काल दोष को तो एकबार के लिए काफी हद तक दूर किया जा सकता है मगर कथानक में तथ्य दोष कथा के साथ साथ बढ़ता जाता है।


बंगाल में अंग्रेजों से हार चुके डरे मुस्ल‌िम समुदाय को निशाना बनाने में कोई जोखिम नहीं था, उल्टा उन्होंने अपने कथानक से जो राष्ट्रवाद खड़ा किया, वह अंग्रेजों के प्रत‌ि अपनी वफादारी प्रकट करने जैसा था। बंक‌िम का यह राष्ट्रवाद चाणक्य के राष्ट्रवाद से एकदम भिन्न था। चाणक्य के राष्ट्रवाद में स्वाभ‌िमान सर्वोपरि था। वह सेल्युकस के खिलाफ सर्वोच्च हिंदू सत्ता स्थाप‌ित करने का पक्षधर है, जबक‌ि आनंदमठ का राष्ट्रवाद मुस्लमानों से सत्ता छीन कर अंग्रेजों के हाथ में रखने की वकालत करता है। बंक‌िमचंद्र का राष्ट्रवाद कैसा है, ‌इसकी यह बानगी देखें-

--

महापुरुष ने कहा-अंगरेज उस समय बनिया थे- अर्थ संग्रह में ही उनका ध्यान था। अब संतानों के कारण ही वे राज्य-शासन हाथ में लेंगे, क्योंकि बिना राजत्व किए अर्थ-संग्रह नहीं हो सकता। अंगरेज राजदण्ड लें, इसलिए संतानों का विद्रोह हुआ है। अब आओ, स्वयं ज्ञानलाभ कर दिव्य चक्षुओं से सब देखो, समझो!
सत्यानंद-हे महात्मा! मैं ज्ञान लाभ की आकांक्षा नहीं रखता-ज्ञान की मुझे आवश्यकता नहीं। मैंने जो व्रत लिया है, उसी का पालन करूंगा। आशीर्वाद कीजिए कि मेरी मातृभक्ति अचल हो!
महापुरुष-व्रत सफल हो गया- तुमने माता का मंगल-साधन किया- अंगरेज राज्य तुम्हीं लोगों द्वारा स्थापित समझो! युद्ध-विग्रह का त्याग करो- कृषि में नियुक्त हो, जिसे पृथ्वी श्स्यशालिनी हो, लोगों की श्रीवृद्धि हो।
सत्यानंद की आंखों से आंसू निकलने लगे, बोले-माता को शत्रु-रक्त से शस्यशालिनी करूं?
महापुरुष-शत्रु कौन है? शत्रु अब कोई नहीं। अंगरेज हमारे मित्र हैं। फिर अंगरेजों से युद्ध कर अंत में विजयी हो- ऐसी अभी किसी की शक्ति नहीं?
सत्यानंद-न रहे, यहीं माता के सामने मैं अपना बलिदान चढ़ा दूंगा।
महापुरुष -अज्ञानवश! चलो, पहले ज्ञान-लाभ करो। हिमालय-शिखर पर मातृ-मंदिर है, वहीं तुम्हें माता की मूर्ति प्रत्यक्ष होगी। (आनंदमठ से)


आनंदमठ ने हिंदुओं के बीच मुसलमानों के प्रत‌ि नफरत के नए बीज भी बोए। यह एक ऐसा राष्ट्रवाद था, जो अपने ही लोगों के खिलाफ था और अंग्रेजों के समर्थन में। सभी मुसलमान फारस की खाड़ी पारकर नहीं आए थे। बड़ी संख्या हमारे अपने लोगों की थी, जिन्होंने जोर-जुल्म का शिकार होने से बचने के लिए धर्म बदला। बंक‌िम का नजरिया ‌इन सबके प्रत‌ि कैसा था, आनंदमठ में इसकी तस्वीर इस तरह है--
----

उस रात को हरिध्वनि के तुमुल नाद से प्रदेश भूमि परिपूर्ण हो गई। संतानों के दल-के-दल उस रात यत्र-तत्र वंदेमातरम और जय जगदीश हरे के गीत गाते हुए घूमते रहे। कोई शत्रु-सेना का शस्त्र तो कोई वस्त्र लूटने लगा। कोई मृत देह के मुंह पर पदाघात करने लगा, तो कोई दूसरी तरह का उपद्रव करने लगा, कोई गांव की तरफ तो कोई नगर की तरफ पहुंचकर राहगीरों और गृहस्थों को पकड़कर कहने लगा- वंदेमातरम कहो, नहीं तो मार डालूंगा। कोई मैदा-चीनी की दुकान लूट रहा था, तो कोई ग्वालों के घर पहुंचकर हांडी भर दूध ही छीनकर पीता था। कोई कहता- हम लोग ब्रज के गोप आ पहुंचे, गोपियां कहां हैं? उस रात में गांव-गांव में, नगर-नगर में महाकोलाहल मच गया। सभी चिल्ला रहे थे- मुसलमान हार गये; देश हम लोगों का हो गया। भाइयों! हरि-हरि कहो!-गांव में मुसलमान दिखाई पड़ते ही लोग खदेड़कर मारते थे। बहुतेरे लोग दलबद्ध होकर मुसलमानों की बस्ती में पहुंचकर घरों में आग लगाने और माल लूटने लगे। अनेक मुसलमान ढाढ़ी मुंढ़वाकर देह में भस्मी रमाकर राम-राम जपने लगे। पूछने पर कहते-
हम हिंदू हैं।
त्रस्त मुसलमानों के दल-के-दल नगर की तरफ भागे। राज-कर्मचारी व्यस्त हो गए। अवशिष्ट सिपाहियों को सुसज्जित कर नगर रक्षा के लिए स्थान-स्थान पर नियुक्त किया जाने लगा। नगर के किले में स्थान-स्थान पर, परिखाओं पर और फाटक पर सिपाही रक्षा के लिए एकत्रित हो गए। नगर के सारे लोग सारी रात जागकर क्या होगा.. क्या होगा? करते रात बिताने लगे। हिंदू कहने लगे- आने दो, संन्यासियों को आने दो- हिंदुओं का राज्य- भगवान करें- प्रतिष्ठित हो। मुसलमान कहे लगे-इतने रोज के बाद क्या सचमुच कुरानशरीफ झूठा हो गया? हम लोगों ने पांच वक्त नवाज पढ़कर क्या किया, जब हिंदुओं की फतह हुई। सब झूठ है! इस तरह कोई रोता हुआ, तो कोई हंसता हुआ बड़ी उत्कंठा से रात बिताने लगा। (आनंदमठ से)
----

बंक‌िम के इस राष्ट्रवाद की जड़ें कहां थीं? यह कहां से भारत पहुंचा? कौन सी शक्त‌ियां देश में ऐसा राष्ट्रवाद खड़ा करना चाहती थीं? इसमें किन की स्वार्थपूर्त‌ि थी? यह हम अगले लेख में पढ़ेंगे.....क्रमशः----

Comments

Popular posts from this blog

चौकीदार का स्विस एकाउंट

जब जब धर्म को ग्लानि होती है, मैं उसका उत्थान करने स्वयं आता हूं : ईश्वर

कहत कत परदेसी की बात- प्रसंग पहेली का हल