माया की डुगडुगी पर बाबा का बंदर नाच

जिस बाबा को पांच सौ और हजार के बड़े नोटों में भ्रष्टाचार दिखता था उसे ₹500 व ₹2000 के नोटों के चलन में नहीं दिखता।

शास्त्र कहते हैं कि माया के वशीभूत होने पर योग का ढोंग करने वालों को अक्ल का मोतियाबिंद हो जाता है, जबकि सच्चे योगी नेति नेति कह राह में आई माया को धूलि समान ठुकराकर सच को पहचान लेते हैं।

माया की चमक से अंधा एक ढोंगी योगी यह भी नहीं पहचान पाता कि बड़े नोट बंद हुए या ये और बड़े हो गए।  वह बैंकों के भ्रष्टतंत्र से अपने नोट बदलवाकर जनता से कहता है, देखो भ्रष्टाचार खत्म हुआ। वह सरकारों से मिलकर किसानों और जंगल की जमीन हड़प कर कहता है कि दान से ही पुण्य मिलता है।

वह माया की डुगडुगी पर सलवार सूट से संवारे गए बंदर की तरह नाचता है। माया के वशीभूत होकर वह पहलवानों से फिक्स कुश्ती लङता है। वह चैनलों पर जाकर उछलकूद करता है और उसे ही योग कहता है।

मगर सच्चे योगी जानते हैं कि माया ठगनी होती है, वह सरकार बदलते ही रूप बदल लेती है।

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