शहंशाह मदारी और कालाधन जमूरा

सुधीर राघव
मदारी : जमूरे! पब्लिक को अपना नाम तो बताओ।
जमूरा : कालाधन!
मदारी : हां ..तो कालाधन! बाबू को सलाम कर!
जमूरा : किया!!
मदारी : नेता को सलाम कर!
जमूरा : किया!!
मदारी : अफसर को सलाम कर!! दारोगा को सलाम कर!! गुंडे को सलाम कर!! सेठ को सलाम कर!!
जमूरा : किया! किया! किया!
मदारी : अब सारी जनता को सलाम कर!
जमूरा : नहीं....! कलाधन इसको सलाम नहीं करेगा।
मदारी : इस पेंट वाले भाई.. इस पाजामे वाले भाई को सलाम कर!
जमूरा : नहीं...! नहीं करेगा।
मदारी : अच्छा तो इस हाफपेंट को सलाम कर!!
जमूरा : किया!
मदारी : तू पाजामें वाले को सलाम नहीं करेगा...तू पेंट वाले को सलाम नहीं करेगा तो हाफपेंट वाले को सलाम क्यों करेगा।
जमूरा : क्योंकि उसको तू भी सलाम करता है!! इसलिए कालाधन भी उसे सलाम करेगा।
मदारी : जनता तुझसे नाराज है! बोलती है, तुझे सजा दूं! कालधन! तुझे इसकी सजा मिलेगी!
मदारी कालाधन को जमीन पर लिटा देता है। चादर से ढक देता है। फिर चाकू से गरदन काटने का अभिनय करता है। कालाधन चादर के नीचे तड़पने का दिखावा करता है।
मदारी : भाइयो-बहनो! बोलो मैंने आपके सामने काले धन की गरदन काटी कि नहीं! ब़ोलो! अब आपको इसका खून दिखाना चैये कि नई चैये!! इसको मार कर आपका पुराना धन नया करना चैये कि नई चैये!
जनता : मदारी! ...मदारी!...चाहिए! चाहिए....!!
मदारी : हां तो बहनो-भाइयो! अब आप लाइन में लग जाओ। अपना पुराना सारा धन जमा कराओ। बच्चो तुम अपनी गोलक लाओ! मताओ-बहनो! तुम अपने बक्से टटोलो। दूज-टीका, बेटी का दहेज, बेटे की साइकिल के लिए जो जमा किया है सब ले आओ!!
जनता पागलों की तरह कतार में लग जाती है। कुछ बेहोश होकर गिरने लगते हैं। कुछ मर भी जाते हैं मगर लाइन नहीं टूटती। कालाधन उठकर खङा हो जाता है। उसका रंग थोङा और गुलाबी हो गया है।
मदारी हाक लगाता है - मित्रो! लाइन में भीङ है तो पेटीएम करो!
#सुधीरराघव

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