गरीब और किसान ही निशाने पर

सुधीर राघव
भाजपा नेताओं ने अपनी गाड़ियों में लाखों रुपये के पुराने नोट पकड़वाए, गंगा में नोट बहाए, कचरे में भी रखवाए ताकि उनका नेता कह सके कि सचमुच नोट जनता ने छुपा रखे थे। ये नोट सिर्फ इसलिए फैंके और दिखाए जा रहे हैं ताकि मोदी जनता को मुहं दिखाने के काबिल हो सकें।
यह सर्जीकल स्ट्राइक गरीबों और किसानो पर हुआ है। यह बिल्कुल वैसा है जैसा जैविक हथियारों का शोर मचाकर अमेरिका ने इराक पर हमला किया था मगर मिला कुछ नहीं। सिर्फ जनता तबाह हुई। सिर्फ गरीब मार हुई है। बैंकों की लाइन में और पैसे के अभाव में करीब साठ लोगों की जान जा चुकी है।
वही मूर्खता मोदी सरकार ने की है। कालेधन का शोर मचाकर गरीबों और किसानों पर कार्पेट बंबारमेंट की गई है। गरीब और किसान रोटी को मोहताज है। सरकार की साख खत्म है। गरीब अपनी साख से ही उधार पर जी पा रहा है।
किसी बङे उद्योगपति को नहीं पकङा गया। मोदी को 14 लाख का सूट देने वाले मोदीभक्त ने मोदी जी की इज्जत बचाने के लिए दो सौ फीसदी जुर्माने पर जरूर कुछ करोङ जमा कराए हैं।
इस तरह भक्त और पार्टीजन ही नोट इकट्ठे कर सार्वजनिक स्थलों पर अपने पास ही पकङवा रहे हैं। महाराष्ट्र का मंत्री तक पार्टी ने इस काम में लगा दिया है।
नोटबंदी के लिए इसलिए नवंबर का समय चुना गया ताकि किसान अपनी मुख्य रबी की फसल ही न बो सकें। उनके पास भूखे मरने और अपनी जमीने बेचने के अलावा और कोई विकल्प न बचे।
सीमा पार वाले तो सारे मोदी के फैन हो चुके हैं। नोटबंदी की ऐसी योजना तो कोई लाहौर में बैठे आकाओं के चरण छूकर ही बना सकता है, जिससे पूरे भारत में उत्पादन ठप हो जाए और देश आर्थिक एमरजेंसी की गर्त में चला जाए।
खुश आतंकियों ने अपनी गतिविधियां रोक दी हैं। भारत को बरबाद करने के लिए मोदी ही काफी हैं तो उन्हें मेहनत करने की क्या जरूरत।
इसबार गरीब किसान रबी की फसल न बो सकें, क्या इसकी तैयारी सरकार की ओर से 6 महीने से चल रही थी?
क्या नोटबंदी के पीछे सरकार का प्लान यह है कि गरीब किसान नवंबर में अगर कुछ बोयेगा नहीं तो अप्रैल में कुछ कटेगा भी नहीं? क्या इसलिए सहकारी बैंकों पर पुराने नोट न लेने कि बंदिश लगा दी गई है?
क्या अगले साल हालात यह होने वाले हैं की भूखा मरता किसान जमीन बेचने को मजबूर होगा? क्या इसलिए ही आजकल कई बाबाओं और उद्योग पतियों के चेहरे पर पहले से कहीं ज्यादा रौनक है?
ये सब अगले साल उस वक्त का इंतजार कर रहे हैं, जब किसान मजबूर होकर जमीने बेचेगा तब ये गिद्धों की तरह मंडराते हुए पहुंच जाएंगे और उनकी जमीने औने-पौने फोन दाम पर खरीदकर उद्योग लगाएंगे।
क्या यही है सरकार का भारत निर्माण? मैक इन इंडिया?

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