हमारी गिलोय पर जल्द होगा अमेरिकी दवा कंपन‌ियों का कब्जा

सुधीर राघव
गिलोय की बेल जिसमें कम से कम 35 प्रकार के औषधीय तत्व होते हैं, पर जल्द ही अमेरिकी दवा कंपन‌ियों का पेटेंट होगा। अमेर‌िका में गिलोय के औषधीय गुणों पर रिसर्च जारी है और इसके तत्वों का चूहों और जानवरों पर अध्ययन के उत्साहजन निष्कर्ष भी आ चुके हैं। हालांकि इसके तत्वों पर कई तरह के पेटेंट पहले से जारी हैं मगर उनमें ये तत्व अन्य स्रोत से प्राप्त किए गए। संतोष की बात यह है कि टिनोस्पोरिन से जुड़ा एक पेटेंट भारतीय वैज्ञानिकों के भी नाम है।
हालांकि भारत ईसा से पूर्व ही गिलोय के गुणों से पर‌िचित है मगर शोध के अभाव में इसके गुणों को हमारे रसायनविदों ने इन पर ध्यान नहीं दिया। आचार्य चरक ने गिलोय को वात दोष हरने वाली श्रेष्ठ औषधि माना है। चरक के बारे में इत‌िहासकार कहते हैं कि वह कन‌िष्क के राजवैद्य थे और उनका काल 78 ईसा पूर्व के आसपास का है।
रिसर्च के अभाव में हमारे देश में आयुर्वेद के नाम पर झोलाछाप वैद्य मनमाने तरीके से गिलोय के उपयोग बता रहे हैं। जैसे डेंगू आदि बुखार में गिलोय के तने का काढ़ा बनाकर पीने को कहा जाता है। मगर वैज्ञानिक रिसर्च बताती है कि गिलोय के तने नहीं जड़ों में वे एल्कालोइड्स होते हैं जो वायरल इन्फेक्शन से बचाते हैं।
अब हम बात करते हैं उस रिसर्च की जो अमेरिका की यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में की गई है। इस रिसर्च के अनुसार गिलोय जिसका वैज्ञानिक नाम टिनोस्पोरा कोर्डिफोलोलिया है में 35 से भी ज्यादा तरह के औषधीय तत्व हैं। इसकी जड़ों में 14 तरह के एल्कालोइड्स होते हैं। इनमें बेर्बेराइन, कोलाइन, पाल्मटेन, टेम्बेटेराइन, मैग्नेफ्लोराइन, टेट्राहाइड्रोपल्मेटाइन, टिनोस्पोरिन, आइसोकोलुंबिन इत्याद‌ि मुख्य हैं। लैब के निष्कर्ष के अनुसार ये तत्व एंटी कैंसर, एंटी वायरल इनफ्लेमेशन, इम्यूनो मोड्यूलेटरी गुण, न्यूरोलॉजिकल, साइकेट्रिक कंडीशन और मधुमेह रोधी गुण हैं।
इनमें बेर्बेराइन का औषधीय उपयोग चीन में ईसा से तीन सौ साल से हो रहा है। मगर उसका स्रोत गिलोय न होकर अन्य पौधे थे। इमली के पौधे में भी यह तत्व होता है। गहरे पीले रंग का होने की वजह से इसका इस्तेमाल प्राचीन भारत में भी ऊन और चमड़ा रंगने के ल‌िए किया जाता था। इसका इस्तेमाल डायबिटीज, अन‌ियमित धड़कन, कैंसर, अन‌ियमित ल‌िप‌िड प्रोफाइल आद‌ि में लाभदायक है।
कैंसर स्टेम सेल से जुड़ा इसका पेटेंट 2012 में नेशनल ताइवान यून‌िवर्स‌िटी ने लिया है। गिलोय में पाये जाने वाले टिनोस्पोरिन के एक दर्जन से ज्यादा पेटेंट हैं। इनमें से एड्स थेरेपी का पेटेंट हाइवर लिमटेड के नाम है तो फंगल इन्फेक्शन जांच का लुसियाना स्टेट यूनिवर्स‌िटी के पास। भारत के चेतन बलारा और अन‌िल नकुम ने वायरल इन्फेक्शन में लाभकारी गुण की पहचान कर उसका पेटेंट कराया है। इसी तरह कोलाइन व‌िटाम‌िन बी-काम्पलेक्स का अव्यव है। यह गर्भवती मह‌िलाओं के ल‌िए आवश्यक है। भ्रूण के नर्वस सिस्टम के व‌िकास में उपयोगी है। इसकी टेबलेट का पेटेंट रूडी हरमन के नाम है। गिलोय की जड़ो में पाया जाने वाला एक अन्य एल्कालोइड पल्मेटाइन ऐसा है जो पील‌िया, दस्त, हाइपरटेंशन, सूजन, लीवर संबंधी बीमार‌ियों में उपयोगी है।
गिलोय के तने में छह तरह के ग्लूकोसाइड पाए जाते हैं। ये न्यूरोलोजिकल डिसऑर्डर जैसे एएलएस, पार्किंसन्स, ड‌िमेंशिया, मोटर न्यूरोन, न्यूरोन लोस इन स्पाइन और हाइपोथेलेमस जैसी बीमारियों के उपचार में कारगर हैं। इसके इलावा इन ग्लूकोसाइड्स के एंटी कैंसर गुण भी सामने आए हैं। पूरे पौधे के रस में छह तरह के डिटेरपेनोइड लेक्टोन्स भी पाए जाते हैं। ये तनावमुक्त करने, एंटी माइक्रोबीयल, एंटी हाइपरटेंशन, एंटी वायरल गुण भी रखते हैं।
इसके तनों और पत्तों आदि में चार तरह के स्टीरोइड्स होते हैं। ये न्यूरोपेथी और ओस्टोपोरोसिस और ऑर्थेराइटिस के निदान में उपयोगी पाए गए हैं। गिलोय में तीन तरह के एल‌िफेट‌िक कंपाउंड्स भी होते हैं जो दर्द निवारक, हाइड्रोक्सीडोपामाइन और पार्किंसन के उपचार में चूहों में कारगर पाए गए।
दूसरी ओर आयुर्वेद में तो गिलोय का महत्व इसी बात से आंका जा सकता है कि इसका एक नाम अमृता भी है। इसके बारे में कथा है कि समुद्र मंथन के दौरान देवों और असुरों में झगड़े के दौरान जहां-जहां अमृत की बूंदें गिरीं वहीं गिलोय उत्पन्न हुई। आयुर्वेद में इसे त्रिदोष हरने वाली, रक्तशोधक, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली, ज्वर नाशक, खांसी मिटाने वाली प्राकृतिक औषधि के रूप में खूब उपयोग किया जाता है। टाइफायड, मलेरिया, कालाजार, डेंगू, एलीफेंटिएसिस, विषम ज्वर, उल्टी, बेहोशी, कफ, पीलिया, धातु विकार, यकृत निष्क्रियता, तिल्ली बढ़ना, सिफलिस, एलर्जी सहित अन्य त्वचा विकार, झाइयां, झुर्रियां, कुष्ठ आदि में गिलोय का सेवन वैद्य कराते हैं। दावा यहां तक किया जाता है कि यह शरीर में इंसुलिन उत्पादन क्षमता बढ़ाती है। इसका नियमित प्रयोग सभी प्रकार के बुखार, फ्लू, पेट कृमि, रक्त विकार, निम्न रक्तचाप, हृदय दौर्बल्य, क्षय (टीबी), मूत्र रोग, एलर्जी, उदर रोग, मधुमेह, चर्म रोग आदि अनेक व्याधियों से बचाता है। यह भी कहा जाता है कि गिलोय की बेल को हलके नाखूनों से छीलने पर जो हरा,मांसल भाग नजर आता है उसका काढ़ा बनाकर पीने से त्रिदोष नष्ट होता है। देसी नुसखे बेचने वाले अब यह दावा भी करते हैं कि गिलोय और गेहूं के ज्वारे के रस के साथ तुलसी के 7 पत्ते तथा नीम के पत्ते खाने से कैंसर जैसे रोग में भी लाभ होता है। उनके अनुसार सिर्फ गिलोय की डंडी का ही प्रयोग किया जाता है। पत्तों का नहीं। उसका लिसलिसा पदार्थ ही दवाई होता है। अगर पीलिया है तो इसकी डंडी के साथ साठी की जड़ भी कूटकर काढ़ा बनायें और पी सकते हैं।
इतने सारे गुण ज्ञात होने पर भी देश के फार्मेसी वैज्ञान‌िकों ने इसकी उपेक्षा की। नतीजा यह होगा क‌ि भव‌िष्य में ग‌िलोय के तत्व से बनीं व‌िदेशी कंपन‌ियों की दवाइयां हम महंगे दाम चुकाकर खाने को मजबूर होंगे।

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