उड़ने वाला हाथी

सुधीर राघव
भक्त अपने नेता की तुलना हाथी से करते हैं और आलोचकों की कुत्तों से।
मगर हमारा नेता तो हाथी नहीं, सफेद हाथी है। इंद्र का ऐरावत। वह चलता नहीं उड़ता है। कभी अमेरिका, कभी पाकिस्तान, कभी चीन कभी फ्रांस। वह पूरी दुनिया में उड़ता है।
वह जब उड़ता है तो भक्त भाव विभोर हो जाते हैं। पुष्प बरसाते हैं। जब सफेद हाथी पाकिस्तान जाता है तो भक्त सोचते हैं कि वह दाऊद को गले से पकड़ कर लेकर आ रहा है मगर वह पांव छूकर लौट आता है।
सकपकाए भक्त तब भी सफेद हाथी को दोष नहीं देते। वे अपना सुर ही बदल लेते हैं। वे फिर गुणगान करते हैं कि हाथी जी ने महान मिसाल पेश की है। ऐसे विलक्षण भक्त पाकर गदगद हाथी और सफेद हो जाता है। वह मन की बात अलापने लगता है। इस अलाप को सुन भक्त धन्य हो जाते हैं।
हाथी पर बैठे महावत का हाल भी निराला है। उसे जब इंद्रियां पुकारती हैं तो वह चिल्लाने लगता है कि भक्तो ज्यादा बच्चे पैदा करो। पहले से पैदा बच्चों पर मक्खियां भिनक रही हैं। कोई रोजगार नहीं है। हाथी मौन रहता है।
महावत चिल्लाता है गायों की रक्षा करो। भक्त लोगों को घेर घेर कर मारने लगते हैं। सफेद हाथी और सफेद हो जाता है। वह चुप रहता है। हाथी जब लोगों के भले की बात कहता है तो भक्त उसकी बात काट देते हैं। हाथी कहता है कि सबको 15 लाख मिलेंगे तो भक्त फौरन दाढ़ी नोचकर कहता है, यह तो जुमला है। हाथी कहता है कि अच्छे दिन आएंगे तो भक्त खांसने लगता है। जनता के अच्छे दिन उसे गले की हड्डी लगते हैं। अच्छे दिन तो बस नेता के ही आते हैं।
हाथी घुटनों के बल बैठा है। कह रहा है हाई लेवल बैठक कर रहा है। भक्त उसकी लीद ढकने में लगे हैं। पहरेदार बफादार कुत्ते भौंक भौंक कर उसे उठा रहे हैं- उठो गजराज। पलटकर हमला करो। मगर हाथी की लीद हाथी से बड़ी हो चली है। उससे उठा नहीं जाता। वह उठने वाला नहीं।

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