बादल और मोदी

सुधीर राघव
सीवरेज तो शहरों में नहीं डाल पाते तो गांवों में कहां से डाल दें।
देश के स्वच्छता अभियान की जमीनी हकीकत बयान करती यह बात पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने जालंधर के आदमपुर इलाके में संगतदर्शन के दौरान साठ गांवों की पंचायतों की मांग पर कही।
प्रकाश सिंह बादल जमीन से जुङी नेताओं की उस पीढ़ी से हैं, जिसने देश को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राजनीति के अपार अनुभवी बादल खरी खरी कहते हैं। उनके खरेपन में भी कङवाहट नहीं होती बल्कि शब्द गुदगुदाते हैं। इस उम्र में भी शब्द चयन में उनका बौद्धिक कौशल आपको विस्मित कर देगा। उनका अनुभव इसलिए भी अपार है, क्योंकि कांग्रेस के दिग्गज नेता भी दो चुनावों में उन पर पार नहीं पा सके हैं।
अब फिर विषय पर लौटते हैं। मोदी जी का स्वच्छता अभियान टीवी चैनलों और अखबारों में जबरदस्त है। उसका कोई मुकाबला नहीं है। मगर धरातल पर यह उस नौटंकी की तरह जिसका पर्दा किसी भी वक्त गिर सकता है। विज्ञापनबाजी से आप भावनाएं तो पैदा कर सकते हैं मगर जरूरी नहीं कि जरूरतभर की अक्ल भी पैदा कर लें। स्वच्छता के लिए आपको ठोस प्लानिंग की जरूरत है। प्लानिंग के मोर्चे पर मोदी जी की अनुभव हीनता साफ झलकती है। उनका सारा वाकचातुर्य धरा रह जाता है। यही वजह है कि जो बात बादल समझ रहे हैं, मोदी उसे नहीं समझ पाते।
स्वच्छता अभियान के नाम पर गांवों में बिना सीवरेज डाले हजारों शौचालय बना दिए गए हैं। छोटे छोटे सैप्टिक टैंक खोदकर, इनके इस्तेमाल पर भी जोर दिया जा रहा है। जब ये सैप्टिक टैंक भर जाएंगे तब क्या होगा। छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों की वास्तविक आय जिस तरह लगातार कम हो रही है, क्या वे इस स्थिति में हैं कि सैप्टिक टैंकों की नियमित सफाई का खर्च वहन कर सकें। इतना ही नहीं सैप्टिक टैंकों की सफाई के बाद एकत्र मल की भारी मात्रा को गांवों में खुले में फैंके जाने के अलावा और क्या विकल्प होगा। अंतत: यह स्वच्छता अभियान मल खुले में करने की जगह खुले में फैंकने का अभियान ही साबित होगा।
इतना ही नहीं, इस मूर्खतापूर्ण भेङचाल में कई खतरे छुपे हैं। पहले तो लोग गांव से दूर शौच के लिए जाते थे, मगर अब गांवों की गलियों में ये भरे हुए सेफ्टी टैंक बरसात या बाढ़ की सूरत में भयाभय स्थिति बनाएंगे। महामारी फैलाएंगे। रोम की महान सभ्यता भी अपने ही कचरे और मल से उठी महामारियों से लुप्त हुई थी। ऐसा इतिहासकार कहते हैं।
स्वच्छता अभियान को सफल बनाना है तो गांवों में पहले सीवरेज सिस्टम बनाना होगा, उसके बाद शौचालय बनवाए जाएं। विज्ञापन और दिखावा करने का पैसा इस पर खर्च किया जाए। पहले गांवों और शहरों में सीवरेज, ड्रेनेज सिस्टम मजबूत किया जाए, उसके बाद सांसदो, विधायकों का वेतन बढाने की बात हो। मगर मोदी जी से इस तरह की व्यवस्था की उम्मीद कम है, क्योंकि उनके चरित्र में यूरोपीय इतिहास के किशोरवय राजाओं की तरह दिखावा ज्यादा है और अनुभव तथा समझदारी कम। अनुभवी बादल इस बात को समझते हैं और बेहिचक कहते हैं कि शहरो में सीवरेज डाल नहीं पाते, गांवों में कहां से डाल दें।

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