संघ चरित

सुधीर राघव
कहत भागवत, सुनो अडवानी। अटलराज यह नीति बखानी||
संघकुल रीत सदा चली आई। ढांचा गिरे तो मुकर जाई ||
सरकार बने तो चुप लगाई। नहीं बने तो फिर चिल्लाई ||
संघ मन हिंदू बसिहें ऐसे | सर्पकंठ मुक्तामणि जैसे ||
पुन: पुन: उगल चाटिहें रीति। पीएम बने समझावें नीति ||
मोदी मन नहीं आनि गुसाईं। पाटि पढ़ि जो संघ पढ़ाई ||
जाए पाक चरण पादुका लावा | धन्य भाग्य जो कुर्सी पावा||
तुम हू गए चिल्लाए जिन्हा जिन्हा। पर इक भूल परम यह कीन्हा ||
पीएम बने से पहले गईऊ। और पाक के गुण भी गाईऊ ||
जासु पाप तुम कुर्सी गंवाई | ढलत बुढ़ापे रहा खिसयाई ||
मन की बात बिसार दे, मन ही मन ये विचार।
जो न राष्ट्रपति बनाए गए, का लेओगे उखार ||

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