कंधे पर लाश

सुधीर राघव
उसने कंधे पर
उठाई अपनी लाश
और निकल पङा
अच्छे दिन की तलाश में
वह चलता गया
मील कोस
अंधेरे से उजाले तक
उजाले से अंधेरे तक
और पहुंच गया
उसी अस्पताल में
जहां से वह उठाकर चला था
अपने कंधे पर अपनी लाश
दरवाजे पर डाक्टरों की भीङ थी
एक एंबुलेंस आकर रुकी
स्ट्रेचर पर लदे नेता के लिए
"इस एंबुलेंस का किराया कौन देगा"
काउंटर पर बैठे कैशियर ने पूछा
सुपरिंटेंडेंट ने झिङका-
"डाल दे पुअर पेशेंट के खाते में
नेता जी ने ही उनके लिए एंबुलेंस फ्री की है"
सामने कंधे पर अपनी
लाश उठाए उठाए
उसे दुनिया गोल नजर आने लगी
वह चक्कर खाकर गिरा
मगर उसकी लाश उस पर
अब भी सवार थी
यह वही पुअर पेशेंट था
जिसके नाम पर पलता है
इस देश का नेता
इस देश का अफसर
अपने दोनों हाथों में
अच्छे दिन लिए।

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