कौआ और तंत्र का बेताल

सुधीर राघव
सभी नेता पैदाइशी नहीं होते। कुछ इत्तफाकी भी होते हैं। इत्तफाक उन्हें बनाते हैं।
पब्लिक के कंधे पर लदा तंत्र का बेताल चुनाव तक का समय काटने के लिए किस्सा सुनाने पर उतारू है। पब्लिक ने उसे व्यवस्था के पेड़ पर उल्टे लटके देख किसी तरह से काबू किया था मगर वह झट से पीठ पर सवार हो गया। उसने शर्त रखी क‌ि पब्ल‌िक जब तक बोलेगी नहीं तब तक ही वह पीठ पर रहेगा और जैसे ही बोली उड़ कर फिर व्यवस्था के पेड़ पर उल्टा लटक जाएगा और अव्यवस्था पैदा कर देगा। तंत्र के इस बेताल के पोपले मुंह पर अनुभव की झुर्र‌ियां हैं। उसके दांत पहले ही नेतागण निकाल चुके हैं। तो लो किस्सा शुरू होता है...
यह बात बहुत पुरानी नहीं है। दिल्लीपुर गांव में एक बरगद का पेड़ था। उस पेड़ के नीचे पंचायत लगती थी। बड़े-बड़े फैसले इसी पेड़ की छांव में होते थे। जब भी कोई समस्या आती। सारे ग्रामीण इस पेड़ की ओर उमड़ पड़ते। सारे राजनीतिक हल भी इसी पेड़ के नीचे होते थे। लोग दिक्कत और सकून के बीच द‌िन काट रहे थे। सब मौजूदा राजा से नाराज थे और उसे उखाड़ फेंकने का मौका ताक रहे थे। ...और उखाड़ने के ल‌िए जरूरी था क‌ि सब म‌िलकर एक द‌िन, एक साथ उस पेड़ के नीचे जुटें। म‌िल-जुल कर तय क‌िया गया क‌ि बस अब और नहीं। अब तो पंचायत ही लगेगी।
एक दिन जब पंचायत लगने वाली थी तो ठीक पहले एक कोआ आकर पेड़ पर बैठ गया। वह चोंच से अपने पंख खुजा ही रहा था कि उसने देखा पब्लिक का हुजूम उसी की ओर बढ़ा चला आ रहा है। पब्लिक नया नेता चुनने के लिए पेड़ की ओर आगे बढ़ रही थी। वह पूरे जोश में थी और खूब नारेबाजी हो रही थी।
भीड़ को अपनी ओर बढ़ते देख कर कोआ हक्का-बक्का रह गया। उसे व‌िश्वास ही नहीं हो रहा था कि लोग उसे इतना प्यार करते हैं। उसे इतना चाहते हैं। उसने तत्काल ट्व‌िट क‌िया-कांव-कांव। मेरे फालोअर्स की संख्या चार लाख। बस फिर क्या था बिरादरी के सारे कौवे कांव-कांव करते हुए उसके चारों ओर जमा हो गए। उन्होंने एक सुर में घोषणा की कि हमारा यह होनहार कौवा सबसे लोकप्रिय नेता है। यही राजा बनने के काबिल है। चारों ओर कांव-कांव शुरू हो गई।

उधर, जब पब्ल‌िक ने देखा कि चौपाल के पैड़ पर बड़ी संख्या में कौओं ने अचानक धावा बोल दिया है तो सब सन्न रह गए। वे अपनी नारेबाजी भूल गए।  किसी को समझ नहीं आ रहा था कि ये अचानक कहां से आ गए। ये तो नोच-नोच कर खा जाएंगे। तभी भीड़ में सो कोई बोला- शुभ काम से पहले कौवों का जमघट तो अच्छा संकेत नहीं है। इनकी बोली में मन को बांटने वाली कर्कशता है। नेता चुनने से पहले इन नरक के दूतों को भगाना जरूरी है। यह सुनना था कि लोग अपने घरों की ओर दौड़े। लौटे तो हाथ में झाड़ू और पत्थर थे। कुछ पेड़ पर चढ़ कर तो कुछ नीचे से कौवों को भगाने लगे।

उधर मस्ती में चिल्ला रहे कौवों ने देखा कि अचानक पब्लिक का मूड बदल गया है। वह भीड़ जो कुछ देर पहले तक जयजय कार कर रही थी उसने उन पर हमला बोल दिया है।  उन्हें समझ नहीं आया क‌ि यह कैसे हुआ। जो लोग कुछ देर पहले तक हमारे कौवे को इतना पसंद कर रहे थे वे झाड़ू और पत्थर लेकर अब पीछे क्यों पड़ गए। पत्थर की मारे के आगे कौवे मैदान छोड़ कर भागने लगे। वे कोस रहे थे क‌ि इस पब्ल‌िक के मूड का कोई भरोसा नहीं।

तंत्र के बेताल ने गहरी सांस लेकर कहानी का पटाक्षेप किया-पब्लिक का नेता चुनने का खेल भी बिगड़ चुका था। कंधे पर पासा बदलते हुए बेताल ने सवाल किया-बता पब्ल‌िक! कौवे को यह भ्रम क्यों हुआ कि लोग उसे नेता मानते हैं? ...जल्द मेरे सवाल का जवाब दे, नहीं तो मैं तुझे किधर का भी नहीं छोड़ूंगा।

प‌ब्ल‌िक ने हमेशा की तरह गहरी सांस ली। थोड़ा सोचा और बोली-सुन बेताल! जनता अपने मौजूदा राजा से नाराज थी और उसे हर हाल में बदलना चाहती थी। कौवा पहले से ही सुपरीयरर्टी कॉम्पलैक्स का श‌िकार था। वह पैदाइशी नेता नहीं था। इत्त‌िफाक ने उसे नेता होने का भ्रम ‌दिया। पब्ल‌िक तो पेड़ की ओर बढ़ रही थी मगर उसे अपने कॉम्पलैक्स की वजह से भ्रम हुआ। उसने सोचा क‌ि वही सबसे महान है। उसे ही ग‌िलास पूरा भरा द‌िखाई दिया है। इसलिए जनता उसकी वंदना के ल‌िए ही आगे बढ़ रही है। वह इस भ्रम में खुद तो अंधा था ही उसने प्रचारतंत्र का दुरुपयोग कर अपनी पूरी ब‌िरादरी की आंखों पर भी पर्दा डाल दिया। मगर जनता तो जनता है। वह झाड़ू और कीचड़ का फर्क समझती है। इसल‌िए उसने कौवे के पैरों तले की जमीन खींच ली। अब सब हवा में ही उड़ रहे हैं।

वाह! तंत्र के बेताल ने खुश होकर कहा- पब्ल‌िक तू बहुत समझदार है। मगर मेरी एक शर्त थी क‌ि तू बोली तो मैं उड़ा। मैं जा रहा हूं पब्ल‌िक। ले में चला। हा--हा--हा--।  बेताल व्यवस्था के पेड़ पर फ‌िर से उल्टा लटक गया।  

-सुधीर राघव
(कलरव के जनवरी अंक में प्रकाश‌ित)


   

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