शेर का उपवास

सुधीर राघव
बचपन में हम सभी को बहुत सी कहानियां पढ़ाई गईं और बहुत सी सुनाई गईं। ये कहानियां होती हैं परियों की, राजाओं की, जंगल की, भूतों की...। यह क्यों पढ़ाई जाती हैं? यह समझने के लिए हम पूरी उम्र लगाते हैं, तब कोई कहानी समझ आती है। जब आप बड़े होते हैं तो कभी लगता है कि चारों ओर जंगल उग आया है और उसमें एक राजा है। कभी लगता है कि सच,... कोई परी होती है। ऐसे ही किसी न किसी मोड़ पर भूत-प्रेत या अन्य पात्र भी कभी कभार टकरा जाते हैं। आज अचानक एक ऐसी ही कहानी याद आ गई है, जो बचपन में पढ़ी थी। हो सकता है कि जिक्र करते ही आप भी समझ जाएं कि यह कहानी अब काल्पनिक नहीं रही। अपने चारों ओर नजर दौड़ाएंगे तो उसका पात्र भी खड़ा मिल जाएगा।
एक शेर बड़ा जबर शिकारी था। वह चार खाता तो बारह मारता। सब ओर उसकी दहशत थी। उसके राज में जंगल तरक्की कर रहा था। इसकी गूंज दूर-दूर तक थी। वक्त के साथ यह शेर भी बूढ़ा हो चला। दांत हिलने लगे, नाखून कमजोर हो गए। पंजे के प्रहार में वह पहले वाली ताकत न रही। ऐसे में शिकार का पीछा करता तो पोल खुल जाती। इसलिए उसे एक उपाय सूझा। वह भगवा वस्त्र पहन कर और हाथ में माला लेकर वट के पेड़ के नीचे बैठ गया। कौवे ने जब इस भेष में उसे देखा तो चौंक गया।
शेर ने उसे समझाया कि अब मैं संन्यासी हो गया हूं और उपवास पर हूं। मैंने शिकार करना छोड़ दिया है। अब कोई मोह-माया भी नहीं है। हाथ में एक सोने का कंगन है। इसे भी किसी भले मानुष को दान करना चाहता हूं।

यह सुन कर कौआ खुशी से पागल हो गया, वह बोला महाराज में पूरे जंगल को यह बता कर आता हूं। ...और उड़ गया।

इतने में एक किसान उधर से गुजरा। पहले तो वह शेर को देखकर डर गया मगर उसके भगवा वस्त्र देख उसे कौतुहल हुआ। वह कुछ बोलता उससे पहले ही शेर ने वही किस्सा दोहरा दिया जो कौवे को सुनाया था। साथ में यह भी जोड़ दिया कि मुझे तो तुम ही इस सोने के कंगन के लिए सबसे योग्य पात्र लगते हो।
किसान लालच में आ गया और जैसे ही कंगन लेने शेर के पास पहुंचा तो शेर ने उसका काम तमाम कर दिया। शेर ने पेट भरा और उसकी हड्डियां ठिकाने लगा दीं। इतने में जंगल के और जानवर भी उसके चारों ओर आ गए। सब खुद को कंगन के लिए सबसे योग्य बताने लगे। इस पर शेर ने फैसला सुनाया कि रोज एक जानवर आएगा और वह एकांत में उसकी योग्यता जांचेंगे। यह काम कल से शुरू किया जाएगा। शाम को जो उनके पास पहले आएगा उसे ही कल का समय दे दिया जाएगा। सभी जानवर खुशी-खुशी लौट गए।

हर कहानी के पीछे एक शिक्षा भी होती थी। इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है, फिलहाल मुझे याद नहीं आ रहा। हां देश में अगर चुनाव हो जाए तो हो सकता है उसके बाद याद  आ जाए।

Comments

रविकर said…
बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||

आपको हमारी ओर से

सादर बधाई ||

संघ-नाव पर बैठकर, मोदी और बघेल |
सालों शाखा में गए, खेले संघी खेल |

खेले संघी खेल, 'कुरसिया' लगे खेलने |
कांगरेस - पापड़ा , बघेला बड़े बेलने |

करत नजर-अंदाज, 'माम' नाराज दाँव-पर |
सी एम् पद की दाल, गले न संघ नाव पर ||
बढ़िया लगी कहानी....
mahendra verma said…
बढ़िया बोधकथा।
बहुत बढ़िया लगी कहानी....
आपका इशारा कहीं उनकी ओर तो नहीं है जो जनता के मननीय हैं.... परन्तु वे कभी वृद्ध नहीं होते.
G.N.SHAW said…
अच्छी कहानी ! फिर भी शेर तो शेर ही होता है ! हाँ - धूर्त से सावधान रहना चाहिए !
शेर की धूर्तता ..काबिले तारीफ़ है |
अच्छी प्रस्तुति
रंजना said…
तोता मैना,कुत्ता बिल्ली, भूत प्रेत या रजा रानी के बहाने जो कहानियां सुनाई जातीं थीं , उनके भीतर छुपे सन्देश जीने की कला सिखाने वाले , अपने आस पास का भान करने वाले होते थे...ये कथाएं किसी भी काल में अप्रासंगिक नहीं होंगी...
आप कहना सही है ! समाज में ऐसे लोग हैं! कहानी के माध्यम से कही आपकी बात पसंद आई!
Babli said…
बहुत बढ़िया लगा! बेहतरीन प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
Pawan Rajput said…
बहुत बढ़िया प्रस्तुति
apko bhut bhut badhai

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