अंतरिक्षयान का वर्णन भी है यजुर्वेद में

">सुधीर राघव
अगर किन्ही पराग्रहियों ने मनुष्य को धरती पर बसाया तो वे यहां तक किन यानों से पहुंचे? ये यान कैसे थे? किससे बने थे? और इन्हें क्या कहा जाता था?

ये सब सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब हमारे वेदों में छुपे हैं। यजुर्वेद के तेइसवें अध्याय में ऐसे ही सवालों का जवाब मिलता है। यजुर्वेद के इस अध्याय में वर्णित अश्व शब्द को लें तो यहां इसका अर्थ घोङा नहीं यान निकलता है। अंतरिक्ष यान को ही अश्व कहा गया है।

यह संभव है कि पराग्रही सभ्यता जब धरती पर बसी तो उनके गुट आपसी लङाई में अपने साधनो और तकनीकों को गंवाते रहे। ऐसे में धरती पर जब उन्होंने परिवहन के लिए घोङे को पालतू बनाया तो अपने अंतरिक्ष यान के रूपक में उसे अश्व नाम दिया। परिवहन का यह साधन भी हवा से बातें करे यह मनुष्य की इच्छा रही और मुहावरों तक में झलकी।इस अध्याय के ग्याहरवें श्लोक के सवालों में से एक है कि स्वर्ग पर्यंत पहुंचने वाला महान पक्षी कौन है। इसका जवाब अगले श्लोक में यह कहकर दिया गया है कि अश्व ही स्वर्ग पर्यंत पहुंचने वाला महान पक्षी है। देखें-

द्योरासीत्पूर्विचत्तिरश्वऽ आसीदूबृहद्वयः।
अविरासीत्यिलिप्पिल रात्रिरासीत्यिशाड़ि्गला॥ 12 ॥ (यजुर्वेद, त्रियोविशंऽध्यायः)
अर्थ- पूर्व स्मरण का विषय ही वृष्टि है, अश्व ही स्वर्ग पर्यंत पहुंचने वाला महान पक्षी है। रक्षिका पृथ्वी ही वृष्टि द्वारा चिकनी होती है। रूप को निगलने वाली रात्री है।

इसके अलावा सोलहवें श्लोक में भी इसका विस्तार से वर्णन है कि यह तीव्रगामी है और देवायन मार्ग से देवताओं के पास जाता है। यह नष्ट भी नहीं होता।

न वाऽउऽएतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँऽहृदेषि पथिभिः सुगेभिः। 
यत्रासते सुकृतो यत्र ते ययुस्तत्र त्व देवः सविता दधातु॥१६॥ (यजुर्वेद, त्रियोविशंऽध्यायः)
अर्थ- हे अश्व! तुम मृत्यु को प्राप्त नहीं होते और न कभी विनिष्ठ ही होते हो। तुम तीव्रगामी होकर देवायन मार्ग द्वारा देवताओं के पास जाते हो, जिस लोक में पुण्यात्मा गये हैं तथा जहां वे निवास करते हैं, उसी लोक में सूर्य प्रेरक सविता देव तुम्हारी स्थापना करें।

ये अश्व और यान किस तरह बनते थे इसके भी कुछ संकेत दिए गए हैं। इससे भी स्पष्ट हो जाता है कि ये अश्व जीते-जागते घोड़े नहीं यान ही थी। तेइसवें अध्याय के सेंतीसवें श्लोक में स्पष्ट लिखा है कि चांदी, सोने और लेड आदि की सूचियां (शृंखलाएं) मिलाकर इनका निर्माण होता था। वायमंडल में प्रवेश करते वक्त ये जलें नहीं इसलिए इन्हें मिलाकर कोई उच्चमिश्रित धातु तैयार की जाती होगी।

रजता हरिणीःसीसा युजो युज्यन्ते कर्मभिः।
अश्वस्य वाजिनस्त्वचि सिमाः शम्यन्तु शम्यन्तीः॥३७॥ (यजुर्वेद, त्रियोविशंऽध्यायः)
अर्थ- चांदी, स्वर्ण और सीसा आदि की सूचियाँ संयुक्त होकर अश्वकार्य में लगती हैं। वे वेगवान अश्व के निमित्त भली भांति रेखा युक्त संस्कार के करने वाली हों।  
इस तरह यह प्रमाण और पुख्ता होते हैं कि धरती पर मनुष्य क्रम विकास का नतीजा नहीं बल्कि उसे यहां बसाया गया। (क्रमशः)




Comments

एक शोधपरक आलेख। बहुत अच्छा लगा।
गहन विवेचन ... नई जानकारी
भारत वैदिक काल में विज्ञान के क्षेत्र में शीर्ष पर था .........इन्ही तथ्यों को उद्घाटित करता आपका लेख एक शोध ही है जो बहुत से रहस्यों को अनावृत करेगा |
आदरणीय सुधीर जी
सादर अभिवादन !

आपका आलेख "अंतरिक्षयान का वर्णन भी है यजुर्वेद में" पढ़ कर चकित रह गया … आपके ज्ञान को नमन करता हूं !

आपकी पिछली बहुत सारी पोस्ट्स भी खंगाली … विविध विषयों को ले'कर लिखी गई ठोस सामग्री पढ़ पढ़ कर अभिभूत हो गया हूं …

प्रशंसा के लिए पर्याप्त शब्द नहीं हैं … आगे भी आते रहना पड़ेगा , ज्ञान-वृद्धि के लिए ।

हार्दिक बधाई और शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार
Deepak Saini said…
हमारे वेद ज्ञान का भंडार तो है ही लेकिन नमन आपको जो इस भंडार से चुन चुन कर जानकारी हमें दे रहे है
Babli said…
बहुत बढ़िया पोस्ट! अच्छी जानकारी प्राप्त हुई!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
द्योरासीत्पूर्विचत्तिरश्वऽ आसीदूबृहद्वयः।
अविरासीत्यिलिप्पिल रात्रिरासीत्यिशाड़ि्गला॥ 12 ॥ (यजुर्वेद, त्रियोविशंऽध्यायः)
अर्थ- पूर्व स्मरण का विषय ही वृष्टि है, अश्व ही स्वर्ग पर्यंत पहुंचने वाला महान पक्षी है। रक्षिका पृथ्वी ही वृष्टि द्वारा चिकनी होती है। रूप को निगलने वाली रात्री है।

कृपया इस श्‍लोक का विस्‍तृत अर्थ समझाएं. पक्षी की बात तो समझ में आई, लेकिन इसमें कुछ और भी नजर आ रहा है. अगर विस्‍तार से बताएंगे तो पाठकों को अच्‍छा लगेगा.
अज जब वेद पुराण पढना सब के बस की बात नही तो आपका ये प्रयास सार्थक है। बहुत ग्यानवर्द्धक विवेचन। धन्यवाद।
Rakesh Kumar said…
आप मेरे ब्लॉग पर आये ,इसके लिए बहुत बहुत आभार आपका.वेदों का ज्ञान गहन है,जो अधिकाँश आध्यात्मिक है.एक ही शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं.'अश्व' का अर्थ बहुतसी जगह इन्द्रियों व मन का भी लगाया गया है.
सुन्दर जानकारी के लिए आभार.
सुधीर said…
@ MSingh
आपको अगर इस श्लोक के बाकी हिस्सों का अर्थ समझना है तो इससे पहले के ग्याहरवें श्लोक को पूरा पढ़ना होगा, जो इस तरह से है- का स्विदासीत्पूर्वचित्तिः कि ५ त्विदासीद् बृहद्वयः। का स्विदासीत्पिलप्पिला का स्विदासीत्पिरागिला॥
अर्थ - हे ब्राह्मन) पूर्व स्मरण का विषय कौन है? स्वर्ग पर्यंत उड़ने वाला महान पक्षी कौन है? चिकनी वस्तु कौन सी है? रूप को निगलने वाला कौन है?
इन्ही सवालों के जवाब में उक्त बातें कही गई हैं, इनसे आप भी समझ सकते हैं।
सुधीर said…
@Rakesh Kumar
व्यक्ति तुलना करता जाता है और समय के साथ बातों के बहुत से अर्थ पैदा होते जाते हैं। ये अनेक अर्थ भ्रम का कारण भी बनते हैं। इसलिए उनके मूल अर्थों को जानपाना आसान नहीं है। जाहिर है अध्ययन व्यक्ति की अपनी जानकारी के अनुरूप ही अर्थ देता है। शब्द चूंकि समय के साथ अपने अर्थ बदलते हैं, इसलिए यह शृंखला मैंने उल्टेक्रम में रखी है सबसे पहले पुराणों से तथ्य लिए अब यजुर्वेद से फिर अथर्वेद से और अंत में ऋग्वेद से मिली जानकारियों को साझा करूंगा। जहां तक अध्यात्म का अर्थ है तो मुझे लगता है कि यह आत्मा के अध्ययन से है। आत्मा अगर ऊर्जा है तो उसका भी अध्ययन किया जा सकता है।
शोधपरक रोचक आलेख ....
सुधीर said…
@सर्व श्री मनोज कुमार,डॉ॰ मोनिका शर्मा, सुरेन्द्र सिंह " झंझट ", राजेन्द्र स्वर्णकार,Deepak Saini, Babli, निर्मला कपिला, Dr (Miss) Sharad Singh, उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए आपका धन्यवाद।
बहुत ग्यानवर्द्धक विवेचन। धन्यवाद।
Kunwar Kusumesh said…
बहुत ज्ञानवर्धक पोस्ट.आभार.
Sarika Mukesh said…
बहुत बढिया!! आपको बहुत-बहुत साधुवाद!!

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