Thursday, June 16, 2011

क्रमविकास नहीं, मनुष्य को रचा गया

सुधीर राघव
आदिग्रंथों के अध्ययन से कई ऐसे तथ्य मिलते हैं जो डार्विन के क्रमविकास के सिद्धांत को न सिर्फ चुनौति देते हैं, बल्कि अधिक सत्य भी जान पड़ते हैं। क्रमविकास का सिद्धांत कहता है कि आवश्यकता के अनुसार जीनों ने परिवर्तन किया और पीढ़ियां नए रूप में विकसित हुईं। आदिग्रंथों से यह साक्ष्य मिलते हैं कि परालौकिक जीवों ने हमारी रचना की और पृथ्वी पर बसाया। बसाने के बाद जीवों में आवश्यकता अनुसार थोड़े बहुत परिवर्तन हों इसकी गुंजाइश अनुकूलन के रूप में रही। एक और तर्क है जो क्रम विकास को चुनौती देता है, वह उसका अपना ही तर्क है, जिससे क्रमविकास खंडित होता है। क्रमविकास का सिद्धांत कहता है कि जीवों में एक परिवर्तन कई पीढ़यों की सतत प्रक्रिया के बाद आता है, यानी कुछ सौ साल एक परिवर्तन में लग जाते हैं। एक कौशिकय जीव से जटिल जीव बनने में करोड़ों पीढ़ियां लगनी चाहिए। मनुष्य में तैतीस हजार जीन हैं और दुनिया के सबसे जटिल पौधे में पचपन हजार से ज्यादा। इस तरह पृष्वी पर जीवन कई सौ करोड़ साल पुराना होना चाहिए, जबकि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति सबसे नई पर्वत शृंखला हिमालय के साथ ही मानी जाती है।
यजुर्वेद के उन्नीसवें अध्याय में श्लोक संख्या अस्सी से पिचानवे के बीच इसका वर्णन है कि मनुष्य की रचना किस तरह की गई। आश्यचर्यजनकरूप से यह काफी सांइटफिक विवरण है। इसे पढ़ कर लगता है कि सरस्वती, अश्विनीकुमार, वरुण ऐसे चिकित्सा विग्यानी थे जिन्होंने मनुष्य के अलग-अलग अंगों का निर्माण किया। इन श्लोकों को पढ़ कर यह भी स्पष्ट होता है को पहले अन्य वनस्पतियों का निर्माण किया गया, उनके ही आधार को और परिमार्जित करते हुए मनुष्य का निर्माण किया गया। मानव की रचना करते वक्त सबसे पहले त्वचा और मांस बनाया गया फिर हड्डियों पर प्रयोग और मज्जा का निर्माण किया। देखें ये श्लोक- 

तदस्य रूपममृत५ शवीभिस्तिस्त्रो दधुर्देवताः स५रशणाः। 
लोमानि शष्यैर्बहुधा न तोक्मभिस्त्वगस्य मा५समभवन्न लाजाः॥81॥ 
तदश्विनाभिषजा रूद्रवर्तनी सरस्वती वयति पेशोsअंतरम।

अस्थि मज्जानं मासरैः करोतरेण दधतो गवां त्वचि॥82॥ 
                                                            (यजुर्वेद ॥एकनविंशोsध्याय॥)
अर्थ- दोनों (अश्विनी कुमारों) और सरस्वती तीनों देवताओं ने सम्यक प्रकार क्रीड़ा करते हुए इन्द्र का अक्षय रूप को संधान करते हुए रोगों को औषधि आदि से संपन्न किया और त्वचा को भी प्रकट किया तथा खीलें भी मांस को पुष्ट करने वाली हुईं।  पृथ्वी पर सोमरस की स्थापना करते हुए रुद्र के समान मार्ग वाले वैद्य अश्विनी कुमार और सरस्वती शरीर में स्थित इंद्र के रूप को परिपूर्ण करते हैं। शष्यादि चूर्ण मय चारु के श्राव से हड्डियों को और गलन वस्त्र से मज्जा को पूर्ण करते हैं। 

 जिस तरह दूध में आसानी से जीवन के अंश उत्पन होकर दही बनता है, वहीं से प्रेरणा लेने की बात नीचे के श्लोक में यह कहकर की गई है कि दुग्ध के द्वारा उज्जवल अमृत रूप एवं प्रजननशील वीर्य को उत्पन्न किया। साथ ही नकारात्मक विचारों को रोकने के भी उपाय किए गए। इन श्लोकों में इस बात का बड़ा ही सुंदर वर्णन है कि किस अंग और अव्यव के लिए प्रेरणा कैसे ली? यह पूरी तरह से साइंटफिक बनाता है। इसमें वरुण एक हृदय चिकित्सक नजर आते हैं, उन्होंने हृदय के बायीं ओर तिल्ली और गले की नाड़ी को बनाया।
पायसा शुक्रममतं जनित्रँ सुरया मूत्रान्जनयन्त रेतः। 
आपमतिं दुर्मतिं वाधमानाऽऊदध्यंवात् सव्वं तदारात्॥84॥
इन्द्रः सवितादेब सुत्रामा हृदयेन सत्यं पुरोडांशेन सविता जजान। 
यकृत क्लोमानं वरुणो भिषज्यन मतस्ने वायव्यैर्न मिनाति पित्तम॥85॥
                                                                          (यजुर्वेद ॥एकनविंशोsध्याय॥)
अर्थ- तीनों देवताओं ने निर्मल दुग्ध के द्वारा उज्जवल अमृत रूप एवं प्रजननशील वीर्य को उत्पन्न किया और निकट में स्थित होकर उन्होंने अग्यान और दुर्मति को बाधा दी। आमाशय में गए उस अन्न को नाड़ी में प्राप्त और पक्वाशय में गए अन्न को सुरारस से कल्पित मूत्र से मूत्र की कल्पना की।  भली भांति रक्षण करने वाले इंद्र हृदय से हृदय को प्रकट करता है। सविता ने पुरोडास से इंद्र के सत्य को उत्पन्न किया, वरुण ने चिकित्सा करते हुए हृदय में बायीं ओर स्थित मांस पिण्ड रूप तिल्ली को और गले की नाड़ी को प्रकट किया तथा सोम संबंधी अर्ध्व पात्रों से हृदय के दोनों और की हड्डियों और पित्त की कल्पना की। 

इंद्रस्य रूपमृषभो बलाय कर्णाभ्या५ श्रोत्रममृतग्रहाभ्याम। 
यवा न बर्हिभ्रुंवि केसगणि कर्कवन्धु जग्ये मधु सारधंमुखात॥91॥ 
अंगान्यात्मन् भिषजा तश्विनात्मानमड्गैः समाधात् सरस्वती। 
इंद्रस्य रूपँ शतमानमायुश्चन्द्रेण ज्योतिरमृतं दधानाः॥93॥
                                                             (यजुर्वेद ॥एकनविंशोsध्याय॥)
अर्थ- बल के निमित्त इन्द्र का रूप उत्कृष्ट किया श्रोच से संबंधित ग्रहों द्वारा वाणी को सुनने वाली कर्ण इंद्रीय हुई। जौ और कुशा भ्रकुटियों के बालों के सम्पादक हुए। मुख के द्वारा बेर के समान और मधुसदृश्य लार आदि का प्राकट्य हुआ। इंद्र के रूप को और शतवर्ष पूर्णायु को चंद्र की ज्योति से अमरतत्व का सम्पादन करते हुए वैद्य अश्विद्रय ने आत्मा में अवयवों को संयुक्त किया और सरस्वती ने उस आत्मा का अवयवों के द्वारा संपादन किया। 

क्या इतना सब पढ़ने के बाद भी हमें लगता है कि हमें किसी परालौकिक जीव (देवताओं) ने नहीं बनाया, बल्कि क्रमविकास के रूप में हम आगे बढ़े। मुझे तो अब डार्विन पर शक होता है। क्या आपको भी? इसी क्रम में आगे अभी बहुत सी जानकारियां हैं? (क्रमशः)



10 comments:

Deepak Saini said...

आपसे सहमत हूँ
और आगे की जानकारी के लिए उत्सुक

ZEAL said...

डार्विन से हज़ारों वर्ष पूर्व लिखे /रचे गए हैं हमारे वेद और उपनिषद। उस समय के देव चिकित्सकों में जो वैज्ञानिकता थी , वो आज नहीं है। वैदिक काल की सोच , चिंतन और वैज्ञानिकता बहुत उन्नत अवस्था में थी ।

एम सिंह said...

आपने बहुत सुंदर तरीके से प्रस्‍तुति की है और गहराई से अध्‍ययन. एक नई सोच है.
मैं नहीं जानता कि डार्विन कितना सही है और कितना गलत. पर मेरे मन में शंका यह है कि वे देवता कैसे थे जिन्‍होंने मानव की रचना की. आखिर उनकी भी तो किसी ने रचना की ही होगी. उनका शरीर क्‍या मनुष्‍य के शरीर से अलग था. क्‍या वे अब भी हैं और अंतरिक्ष में कहीं बसे हैं?

सुधीर said...

@MSing
तुम्हारे तीनों सवालों के बारे में निश्चित जवाब तो तुम्हें खुद तलाशने होंगे मगर वेदों के अध्ययन से मैं जिस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं उससे लगता है कि देवता हमारे जैसे शरीर वाले नहीं थे। जैसा कि मैंने पिछले लेख में स्पष्ट किया है कि वह किसी नष्ट होते ग्रह से निकले थे, अगर उनका अपना शरीर धरती पर बसने के अनुकूल होता तो फिर वह मनुष्य की रचना नहीं करते, बल्कि स्वयं ही बसते। तुम्हारा दूसरा सवाल की उनकी भी किसी ने रचना की होगी, हां ऐसा हो सकता है। संभवतः उन्हें भी किसी नष्ट होते ग्रह के जीवों ने रचा हो और भविष्य में अरबों साल बाद जब सूरज दम तोड़ने लगेगा तो हो सकता है कि धरतीवासी भी किसी अन्य तारामंडल के किसी ग्रह पर वहां के अनुकूल जीवन रचकर खुद खत्म हो जाएं। तुम्हारा तीसरा सवाल कि क्या वे अब भी अंतरिक्ष में कहीं बसे हैं तो मुझे नहीं लगता कि ऐसा संभव है, अगर ऐसा होता तो वे हमसे निरंतर संपर्क बनाए रखते, जैसा कि वैदिक युग में वे प्रकट होते रहते थे। ऐसा लगता है कि स्वर्ग उनका स्पेसस्टेशन था, उनका अपना ग्रह छूटने के बाद उन्होंने वहां रहकर धरती के लिए जीवों की अपनी प्रजातियां रचीं। यह स्वर्ग समय के साथ, या किसी बड़े उल्का की टक्कर या किसी तकनीकी कारण से संभवतः नष्ट हो गया हो।

निर्मला कपिला said...

अपने रिशीमुनिओ के ग्यान भंडार आजकल कितने दुर्लभ हो गये हैं लेकिन कुछ अंश हैं जिनें पढ कर खुद पर गर्व होता है कि हमने इस पावन देश की धरती पर जन्म लिया
बेशक सांइस कितना भी कहे लेकिन शायद अधिकतर विग्यानी उस परमात्मा की सत्ता को नकारते नही सकते। कुछ रुहानी ज़ज़्बे ऐसे हैं जिनका विग्यान के पास कोई गणित नही लेकिन हमारे वेद ग्रंथों मे हर समस्या का समाधान है। बहुत ग्यानवर्द्धक पोस्ट ऐसे समय मे जब युवाओं की पहुँच मे ये ग्रंथ नही है तो ऐसे आलेखों का महत्व बहुत अधिक है। शुभकामनायें।

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

आपकी पोस्ट को ध्यान से पढ़ने के बाद मन में तरह -२ के सवाल आ रहे हैं!
कितनी मेहनत से आपने ये पोस्ट तैयार की है ! इसके लिए आपका आभार !

सुधीर said...

वीरेंद्र जी, आपके सवालों का स्वागत है।

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बहुत ही सार्थक और सारगर्भित पोस्ट.

रंजना said...

डार्विन पर मुझे शक नहीं दया आती है....

आपके आलेख से मेरी सोच ने दृढ़ता पायी है...

बहुत बहुत आभार इन सुन्दर श्रृंखलाओं के लिए....

Amrita Tanmay said...

मैंने भी हाल में ही इस विषय पर कुछ पढ़ा है. आपसे सहमत हूँ .