आजकल खास हिन्दुओं की नई खेप आम हिन्दुओं को कायर, नपुंसक और न जाने क्या-क्या कह रही है। वैसे आम भारतीय के लिए यह बोली नई नहीं है। लंबे समय से नेताओं के मुंह से यह बोली सुनते आए हैं। आपसी नफरत को बढाते हुए मुल्क का बंटवारा भी कर चुके हैं। आम और खास हिन्दू का अंतर इनकी ओर से बस इतना ही बताया जाता है कि आम हिन्दू का खून नहीं खौलता और खास हिन्दू का खून खौल रहा है। कश्मीर को लेकर और आतंकवाद को लेकर। इनके खून खौलने का शिकार भी आम हिन्दू ही होता है, सबसे ज्यादा गालियां उसे ही पड़ती हैं कि तुम्हारा खून नहीं खोलता। तुम कायर हो और नपुंसक हो।
अस्सी के दशक में ऐसे ही खून खौलाने का काम मुसलमानों में लादेन ने किया था। अनपढ़ और कबीलायी क्षेत्र में सबसे ज्यादा खून खौला और युवक नई पढ़ाई पढ़कर तालिबान बने। अब उस खून खौलने का खामियाजा पूरी मुसलमान कौम झेल रही है। जिनका नहीं खोला वे आम मुसलमान भी। आज पूरी दुनिया में उन्हें शक की नजर से देखा जाता है। जिहाद के नाम पर जो आतंकवाद शुरू किया गया, मासूम लोगों की जान ली गई, लेकिन आज सबसे ज्यादा खामियाजा इस विचारधारा को अपनाने वाले या संबंधित पूरा समुदाय ही उठा रहा है। अमेरिका से लेकर पूरी दुनिया की सरकारें इनकी नकेल कसने में जुटी हैं और आतंकवाद को सब जगह मार पड़ रही है। इनके अपने समुदाय में लोग अब खुलकर इन के खिलाफ आने लगे हैं।
भारत जिस तेजी से तरक्की कर रहा है, वह जाहिर है यूरोप और अमेरिका को खटक ही रहा है। मुसलिम आतंकवाद को खड़ा कर और उसे निपटाने के नाम पर प्रमुख तेल अर्थव्यवस्था पर कब्जा किया ही जा चुका है। तो क्या अब खास हिन्दुओं के नाम पर कोई हिन्दू लादेन खड़ा करने की कोशिश है, ताकि अगले दस बीस साल में भारत को अगला इराक, इरान, अफगानिस्तान या पाकिस्तान जैसा बना दिया जाए।
जहां तक आतंकवाद से निपटने का काम है तो हमारी सेना और पुलिस अपनी पूरी ताकत लगा कर इसे कर रही है। हिन्दुओं का भी खून खौलाकर क्या कश्मीर या आतंकवाद की समस्या सुलझेगी या हमारी पुलिस और सेना के लिए एक और सिरदर्द बढे़गा। उसका ध्यान और क्षमता बंटेगी। ऐसे ही नब्बे के दशक में कुछ लोगों ने खास हिन्दू बनने की कोशिश की और पटाक्षेप जिन्ना की मजार पर माथा टेक कर किया। सभी राजनितिक दल वोट बैंक के नाम पर ऐसे नाटक करते हैं, क्योंकि उनका तो यह धंधा है, मगर आम आदमी को उस कीचड़ में घसीटना, जहां नेता लोग पहले से लोट-पोट हो रहे हैं, बुरा ही नहीं देश के लिए खतरनाक भी है। नेताओं के बहकावे में आकर हम भड़कते रहे तो देश खामियाजा उठायेगा ही, जैसा अफगानिस्तान ने उठाया है। आम आदमी को गालियां दे देकर उस कीचड़ में न घसीटा जाए तो बेहतर है।
जहां तक मुसलमानों के नाम पर आतंकवाद की समस्या है तो मुझे लगता है कि वह अगले कुछ साल में नियंत्रण में आ जाएगी क्योंकि मुसलमान भाई खुद भी काफी जागरूक हो रहे हैं। मस्जिद विवाद पर फैसले को लेकर दोनों समुदायों ने जो धैर्य दिखाया वह इस बात का संकेत है। हिंसा और आतंकवाद से सब पीड़ित हैं। अगर हमारी शांति की इच्छा को, हमारी सहिष्णुता को, हमारे धैर्य को हमारी कायरता समझा जा रहा है तो ये खास लोग समझते रहे। इन्हें पता है कि ये खास लोग हैं ये हर हाल में सुरक्षित रहेंगे। लादेन और मुल्ला उमर की तरह, टोरा-बोरा की पहाडि़यों में, आईएसआई या सीआईए के संरक्षण में। भुगतेगा और मरेगा तो आम आदमी ही।
अपने जवानों पर भरोसा रखिये। एक जागरूक नागरिक की तरह आसपास की चीजों पर नजर रखिए। आम नागिरक से हमारे वीर जवानों को इतनी ही मदद काफी है। खून खौलाकर अशांति और दो समुदायों को भड़काने की बोली बंद की जाए।
(जरूरी नहीं कि आप सब मेरी इस बात से सहमत हों। अगर कोई असहमति है तो जरूर बताइएगा। बेहिचक बताइएगा। धन्यवाद।।)
सेक्सी ममता
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महिला आयोग की श्रीमती ममता का कहना है की 'सेक्सी' माने सुन्दर। यदि सेक्सी
माने सुन्दर तो फिर 'सुन्दर' ही कहो न , ज्यादा सभ्य लगता है। फिर भी ममता जी
को इतन...
1 hour ago

13 comments:
ये लोग जिस संस्था या पार्टी से सम्बन्ध रखते है वो तो बाद मे इन लोगों से हाथ मिला लेती है। पंजाब मे जब हिन्दूओं को बसों से घरों से बाहर निकाल निकाल कर गोलियाँ मारी गयी तब ये लोग कहाँ थे दंगा पीडितों को सब कुछ मिल रहा है लेकिन आतंकवाद पीडितों को किसी ने नही पूछा बल्कि सरकार से मिल कर मजे लूट रहे हैं तो क्या ये समझा जाना चाहिये था कि सभी सिख उग्रवादी हैं ? नही । इसी लिये उनसे बी जे पी { हिन्दुत्व} ने हाथ मिलाया तो फिर मुस्लिम भी सभी उग्रवादी नही हैं इसे भी याद रखना चाहिये। भाई चारा समाप्त करना आसान है बनाना मुश्किल। बाकी हर किसी का अपना अपना मत है। क्या कह सकते हैं।
निर्मला जी,
आपने सही कहा है। पंजाब में डेढ़ दशक में करीब तीस हजार लोगों की जान गई। ये लोग एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगलते थे। मुझे याद है बचपन में एक दिन फेडरेशन वाले स्कूल बंद करवाने आते थे तो दूसरे दिन ये लोग। बाद में १९९५-९६ में जब इन्होंने हाथ मिलाये तो उससे कुछ महीने पहले तक कोई पत्रकार भी यह बात कहता कि ये दोनों हाथ मिला लेंगे तो लोग उस पर विश्वास नहीं करते। इनका सारा मैच फ्रेंडली था और जान गई तीस हजार लोगों की।
...prabhaavashaalee abhivyakti ... chintan-manan yogy post !!!
vicharniy post.... sudhir ji
उदय जी और मोनिका जी, धन्यवाद।
बहुत अच्छे सुधीर जी! बस लिखने का यही जज्बा बनाए रखिए।
द्विवेदी जी, धन्यवाद।
द्विवेदी जी, धन्यवाद।
नेताओं को अकल जाने कब आयेगी.
भारतीय नागरिक जी,
नेताओं को अक्ल आने की क्या जरूरत, उनका तो सारा धंधा ही इस बेअक्ली से चलता है। उनसे आप उम्मीद मत रखिये कि वे कोई अक्ल की बात करेंगे। बस धर्म के नाम पर कड़ुवा बोलने वालों से हर भारतीय नागरिक को सावधान रहने की जरूरत है। नस्लीय, सांप्रदायिक और जातीय विद्वेष फैलाने वाले ही देश के सबसे बड़े दुश्मन हैं। ये खतरनाक लोग हर समुदाय और संप्रदाय में घुसे हैं और जहर फैलाने के अपने मिशन में जुटे हैं।
आपका लेख पढने से ठीक पहले माननीय राजेंद्र जी का लेख पढ़ा.....
'कश्मीरियों की जगह खुद को रखकर देखना होगा...'
शायद जवाब आपने पहले ही दे दिया है ...
चिंतन के मूल में देश होना चाहिए....ना की समाज,धर्म या जाति......देशहित सर्वोपरि है.....
very nice post.... sir ye baat un logo ko b samjyooo jo sare desh main dange karwa rahe h
Sudhir ji, aapka post padh kar achchha laga, main aapse puri tarah sahmat hoon, humare neta aise hain kyon ki humme kamjori hai..hum cast, rajya jaise choti choti cheejon ke saamne desh ko bhul jaate hain.. aur ye bhawna har star par hai..
par saath main ye bhi sach hai. ki jyadatar log yeh samajhte hain.. sirf wo aage aa kar bolte nahin.. aur iska phayda kuch asamajik log uthate hain....
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