Friday, October 29, 2010

जीवन की कला

सुधीर राघव

मैंने बच्चों से कहा-

मैं तुम्हें सिखाऊंगा

मेरे पास बहुत सी

अच्छी-अच्छी बाते हैं,

जब मैं तुम्हारे जितना था

मेरे माता-पिता भी मुझे

सिखाते थे

पर मैं नहीं समझ सका

उन्होंने मेरे कान खींचे

तुम भी नहीं सुनते हो

मैं तुम्हारे भी कान खींचूंगा....


मैं कान खींच रहा हूं

क्योंकि जो मैं बताता हूं

बच्चे नहीं सीख रहे हैं...

बच्चे वही सीख रहे हैं

जो मैं करता हूं...


बच्चे हमसे शब्द नहीं

जीवन जीने की कला

सीखते हैं

पर वह कला क्या हमें आती है??

9 comments:

अशोक बजाज said...

अच्छी रचना , बधाई !

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

achhi class hai.... jeevan jeene ki kala seekhne ki behad zaroorat hai...

ZEAL said...

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bahut sundar prastuti --aabhar.

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विरेन्द्र सिंह चौहान said...

बच्चे वही सीख रहे हैं

जो मैं करता हूं...


बच्चे हमसे शब्द नहीं

जीवन जीने की कला

सीखते हैं

पर वह कला क्या हमें आती है??


इस कविता में आपने बहुत अच्छा सवाल पुछा है ....
शायद हमे जीवन जीने की कला नहीं आती

R.Venukumar said...

मैं कान खींच रहा हूं
क्योंकि जो मैं बताता हूं
बच्चे नहीं सीख रहे हैं...
बच्चे वही सीख रहे हैं
जो मैं करता हूं...


सही है भाषा से ज्यादा आचरण काम करता है।

VIJAY KUMAR VERMA said...

बच्चे हमसे शब्द नहीं

जीवन जीने की कला

सीखते हैं

bahut hee sargarbhit rachna ..badhayi

'उदय' said...

... shubh diwaali !!!

सोतड़ू said...

झकास

ZEAL said...

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Happy Diwali Sudheer ji.

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