कौन बचाएगा संस्कृति???

सुधीर राघव

संस्कृति मुझे भी बचानी थी

और तुम्हे भी बचानी थी

मगर इसे तो वे ही बचा सकते हैं

जिनके हाथ में टीवी का रिमोट है

सिनेमा के टिकट हैं...

अफसोस!!!!

वे अलग संस्कृति में

ढल रहे हैं।।

रिमोट मेरे हाथ में भी है
तुम्हारे हाथ में भी


मल्टीप्लैक्स में

टिकट लिए


कतार में

मैं भी खड़ा हूं

और तुम भी।।


मेरे मित्र,

तुम्हारी दीवार पर लगा

बिकनीपोश नारी चित्र

धुंधला पड़ जितनी जल्दी हटा

उसीसे यह उम्मीद जगती है

शायद हम अपनी संस्कृति बचा ले जाएं।।

हिस्स!!!

Comments

बहुत अच्छा व्यंग्य है। हम सिर्फ़ ‘हिस्स’ कहते हैं, पर रिमोट पर अंगूली चलाना भूल जाते हैं। विकृत होती संस्कृति की छवि बदलने के लिए कब हम रिमोट का बटन दबाएंगे। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
राजभाषा हिन्दी पर - कविताओं में प्रतीक शब्दों में नए सूक्ष्म अर्थ भरता है!
मनोज पर देसिल बयना - जाके बलम विदेसी वाके सिंगार कैसी ?
सुधीर said…
मनोज जी,
विचारों के स्तर पर हम इतने ही ईमानदार होते हैं। आडम्बर और पाखंड का आलम यह है कि हमें खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए कुछ खलनायक चेहरे भी चाहिए ताकि उन पर सारे दोष मढ़ कर खुद पाप मुक्त हो जाएं। आपने कविता के पीछे `‍‌व्यंग्य` को समझा और इसकी तारीफ की, इसका शुक्रिया।
सार्थक और उम्दा व्यंग..... मनोज जी से मैं भी सहमत हूँ.
सुधीर जी ..आपने बड़े अच्छे ढंग से अपनी बात रखी है . आभार .
ब्लॉग जगत में विचारों से असहमति को लगता है निंदा के रूप में लिया जाता है। एक अलग तरह का तनाव पैदा होता है। हम इन्हें सहन नहीं कर पाते हैं, ऐसा करने वाले को नाराजगी भी झेलनी पड़ती है। इसमें कोई अलग बात नहीं है, जो व्यक्ति दुखी होगा, वह नाराजगी तो जताएगा ही। पर क्या हमें वैचारिक असहमति पर दुखी होना चाहिए? सभी के विचार एक जैसे हो जाएंगे तो विचार विनिमय कैसे होगा? उसकी जरूरत ही नहीं रहेगी। इससे तो अच्छा है कि हम अंतर्जाल की जगह घर की डायरी में अपना-अपना लिखें और अपना-अपना पढ़ें। पर समाज इसका नाम नहीं है, सभ्य समाज विचारों को साझा करने का नाम है और असहमतियों पर तर्क-वितर्क करने का नाम है। इंटरनेट ने हमें यह मौका दिया है। हां मैं हां मिलाने वाले लोग ही अच्छे नहीं होते। असहमत हैं तो असहमति प्रकट करनी ही चाहिए।

मैं भी नहीं चाहता कि आप सब भी मेरी इस बात से सहमत हों। अगर कोई असहमति है तो जरूर बताइएगा। बेहिचक बताइएगा। धन्यवाद।।



सुधीर जी ...आपकी इस बात से मैं भी सहमत हूँ. आपने बिलकुल सही लिखा है.
सुधीर said…
वीरेंद्र जी, धन्यवाद। वैचारिक असहमति विषयों को लेकर हमारे बीच में भी हुई मगर में कुछ ऐसे ब्लॉगर्स भी देख रहा हूं जो असहमति नहीं पचा पाते और गाली-गलौच की हद तक चले जाते हैं। ब्लॉग जगत की यह एक बड़ी बुराई है, इस पर आप सबको भी अपनी बात खुलकर रखनी चाहिए।
ZEAL said…
.

सुधीर जी,

बहुत सुदर रचना की बधाई।

इस सुन्दर रचना में निहित व्यंग भी काबिले तारीफ़ है। उस व्यंग को सार्थक किया वीरेंदर जी की टिपण्णी ने। उन्हें भी आभार एवं बधाई।

लेखन सफल हो जाता है यदि पाठक उसे सही पर्सपेक्टिव में समझ लें। वर्ना मेहनत व्यर्थ हो जाती।

एक बार पुनः आपको बधाई।

यदि कुछ बुरा लगे तो क्षमा कीजियेगा।

.
सुधीर said…
zealजी,
लेखन की सफलता के लिए लेखक नहीं लिखता। समाज की घटनाओं, भवनाओं की अभिव्यक्ति के लिए लिखता है, इसलिए लिखता है कि उसे कुछ कहना होता है। विचारों को साझा करना होता है। लोग उसे अपने-अपने अनुभव के हिसाब से समझते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कुछ लोग रामायण और गीता ही समझते हैं कुरान या बाइबल नहीं। या कुरान समझते हैं तो रामयण, गीता और बाइबल नहीं, या बाइबल को समझते हैं और अन्य ग्रंथों को नहीं। किसी के समझने और न समझने से दुनिया के किसी लिखे के अर्थ नहीं बदले हैं। उसके अपने संदर्भ रहते हैं और जो उन अनुभूतियों में से गुजरते हैं, वे-वे उसे समझते जाते हैं। कुछ लोग इन सबकी मूल भावना को भी समझते हैं। पर उनकी संख्या कम ही है। जब तक इनकी संख्या नहीं बढ़ेगी, समाज से झगड़े खत्म नहीं होंगे। इन महान ग्रंथों का नाम सिर्फ इसलिए लिया है ताकि भाव स्पष्ट हो जाए (कृपया इसे अन्यथा न लें) ।
आपको रचना पसंद आई, इसके लिए शुक्रिया।
जहां तक बुरा मानने की बात है तो आपने जो शब्द लिखा है कि क्षमा कीजिएगा, बस वही बुरा लगा।
तर्क से असहमति हो सकती है, उसमें बुराई नहीं हो सकती। हां, जहां आपकी वैचारिक असहमति हो तो उसे जरूर दर्ज कराएं। उसके लिए आपका सदैव स्वागत है। वीरेंद्र जी, मनोज जी और आपने इसके व्यंग्य को या जो भी भाव है, इसे समझा मैं इसे अपना सौभाग्य कहूंगा कि आप सब लोग जैसी अनुभूतियों से रोज गुजरते हैं, मैं भी उन्हें महसूस कर सका।
Kunwar Kusumesh said…
सुधीर जी,
भारतीय संस्कृति और हिस्स्स्स....से जुड़ी आपकी कविता और उसमे छुपा व्यंग पसंद आया.आजकल संस्कृति सम्बन्धी चर्चा में आप बड़ी तेज़ी से लगे हुए हैं,यहाँ भी और अन्य ब्लॉगों पर भी टिप्पणी के माध्यम से. मेहनत कर रहे है आप.
मेरे ब्लॉग पर भी आ जाया करें.

कुँवर कुसुमेश
ब्लॉग:kunwarkusumesh.blogspot.com

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