Friday, October 15, 2010

समंदर को डूबते देखा है

सुधीर राघव

बड़े-बड़े जहाज डूबते हैं

पर हौसला नहीं डूबता

सुनामी लहरों के थपेड़े

जब मचाते हैं तबाही

तहस-नहस हो जाते हैं

सौ सुरक्षा से सजे बेड़े

तब एक डोंगी की

बिसात ही क्या है

ऐसे में हौसला तैर कर

निकल जाता है

किनारे पहुंच देखता है

ऊंची लहरें उतर रही हैं

समंदर धीरे-धीर डूब रहा है।।

16 comments:

'उदय' said...

... bahut khoob !

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

Very nice poem .....
Sudhir ji....Thanks.

शरद कोकास said...

बहुत आशावादी रचना

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अच्छा संदेश देती, आशा की किरण जगाती...

दीप्ति शर्मा said...

bahut aashavadi hai aapki rachna
dhanyvad
blog mai aane ka bahut aabhar
dhashahre hi hardik shubhkamnaye

हरकीरत ' हीर' said...

बिलकुल अलग हट कर लिखा ....साथ भूमिका भी लिख देते तो ...
इस कविता क पीछे भाव क्या थे समझने में सुविधा होती ....
शीर्षक कुछ और कह रहा है ....!!

सुधीर said...

हरकीरत जी,
शीर्षक तो इन्हीं तीन पंक्तियों पर आधारित है -
किनारे पहुंच देखता है
ऊंची लहरें उतर रही हैं
समंदर धीरे-धीर डूब रहा है।।

रही बात भूमिका की तो वह बहुत सी हो सकतीं हैं। पाठक अपनी भूमिका के संदर्भ में भी सोच सकता है, एक भूमिका मुझे लिखनी हो तो यही लिखूंगा कि देह के समंदर पर विचार लहरों की तरह उठते हैं। कभी नकारात्मक हो तो सुनामी जैसे भी, मगर हौसले रखो तो इन लहरों ने वक्त के साथ शांत होना है मगर विचारों की इन लहरों में देह डूब जाती है। देह ही समंदर है। हौसला तैर कर निकल जाता है।

Anonymous said...

आशावादी रचना

pramod said...

bahut sunder kavita. ...bahut khoob

saurabh said...

विचारों की लहरों में डूबता देह का समंदर...। वाह क्या बात है।।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी और प्रेरक रचना। इसे पढकर एक शे’र याद आ अगया

जज़्बा कोई अख़लाक से बेहतर नहीं होता।
कुछ भी यहां इंसान से बढ़कर नहीं होता।
कोशिश से ही इंसान को मिलती है मंजिलें,
मुट्ठी में कभी बंद मुक़द्दर नहीं होता।

Parul said...

so nice!

ZEAL said...

.

A beautiful creation, full of zeal and hope.

Regards,

.

निर्मला कपिला said...

सुन्दर रचना है। बधाई। मुझे पता नही क्यों या शायद कम्प्यूटर की पूरी जानकारी नही है इस जगह
http://www.blogger.com/profile/00445443138604863599 जा कर कन्फ्यूज़न सी होती है एक ब्लाग को टिक करो तो दूसरे का लिन्क मिलता है कई बार इसी मे समय खराब हो जाता है। क्या मेरी समस्या का हल करेंगे। बुरा मत माने इस लिये पूछा कि रेगुलर रह सकूँ इस ब्लाग पर। शुभकामनायें

सुधीर said...

जिस लिंक पर आप क्लिक करती हैं, वह मेरे ही प्रोफाइल का है, वहां कुछ और लोगों के ब्लाग्स के लिंक भी ऊपर हैं, मगर मेरा एक्टिव ब्लाग sudhir raghav (http://sudhirraghav.blogspot.com/)ही है। आपने रुचि दिखाई, आपका आभार।
सुधीर

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

हौसला तो हौसला है, हौसलों का क्या कहें,
आँधियाँ आती रहीं, पर दिया जलता रहा ।

बधाई..सुधीर भाई!बड़ी सार्थक कविता है। कविता क्या, बल्कि पॉज़िटिव सोच से सराबोर सरोवर है!