सुधीर राघव
हव्वा और आदम ने ठाना
दुनिया का बंटवारा होगा,
मादा सृष्टि मेरी होगी
नर संसार तुम्हारा होगा।
पांव की जूती नहीं रहूंगी
जोर-जुल्म भी नहीं सहूंगी,
मुझको भी आज़ादी प्यारी
दासी बनकर नहीं जिऊंगी।
स्वर्ग से हम दोनों आए थे
जीवन तुमने नर्क बनाया,
सृष्टि का आधार बनी में
तुमने अपना नाम कमाया।
अंकुर कोख में मैंने पाला
सारा जीवन उसमें ढाला,
अपना कोई हक न समझा
सब तेरी झोली में डाला।
पर नर तूने कद्र न जानी
जब चाहा तब की मनमानी,
तूनें सदियों खूब सताया
अब ये अबला हुई सयानी।
जाती हूं दहलीज लांघकर
सारे दुख खूंटी पे टांगकर,
मेरे सुख का द्वार खुला है
खुश हूं मैं मुक्ति जानकर।
जाओ-जाओ नर चिल्लाया
हव्वा का प्रस्ताव भी भाया,
मुक्ति लोगी, मुक्ति दोगी
नहीं सतायेगी मोह माया।
तेरे कारण बंधन में था
बास-सुबास न चंदन में था,
अब जीवन फर्राटा लेगा
मेरा पहिया मंदन में था।
अपना स्वर्ग में फिर रच लूंगा
ज्ञान से सारे सुख कर लूंगा,
कंधे पर से बोझ हटा है,
देखो कैसे मैं जी लूंगा।
तभी सेब एक टूट के आया
हव्वा ने आदम को थमाया,
नजर मिली दोनों की फिरसे
आधा-आधा उसको खाया।
लगा ज्ञान से प्रेम बड़ा है
जीवन अब भी वहीं खड़ा है,
इसके लिए स्वर्ग ठुकराया
अब क्यों यह अहंकार चढ़ा है।
इंद्र का वह लोक छोड़कर,
देवत्व के बंधन तोड़कर।
हमने अपना लोक बसाया,
चारों ओर है अपनी माया।
माया का विस्तार है इतना,
स्वर्गलोक का सार न जितना।
अगर टूटते हैं हम दोनों,
अगर कोई बंटवारा होगा।
तो न संसार तुम्हारा होगा,
न संसार हमारा होगा।।
नेहरू खानदान की असलियत- अवश्य पढ़ें.
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जम्मू-कश्मीर में आए महीनों हो गए थे, एक बात अक्सर दिमाग में खटकती थी कि अभी
तक नेहरू के खानदान का कोई क्यों नहीं मिला, जबकि हमने किताबों में पढ़ा था कि
वह...
22 minutes ago

20 comments:
बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
मराठी कविता के सशक्त हस्ताक्षर कुसुमाग्रज से एक परिचय, राजभाषा हिन्दी पर अरुण राय की प्रस्तुति, पधारें
अगर टूटते हैं हम दोनों,
अगर कोई बंटवारा होगा।
तो न संसार तुम्हारा होगा,
न संसार हमारा होगा।।
बहुत सुन्दर सार्थक सन्देश देती रचना के लिये बधाई।
bahut hi sunder rachna hai ...
badhai sweekar karen....
बहुत सुन्दर सार्थक सन्देश देती रचना के लिये बधाई।
अगर टूटते हैं हम दोनों,
अगर कोई बंटवारा होगा।
तो न संसार तुम्हारा होगा,
न संसार हमारा होगा।।
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आपने इन पंक्तियों से दुनिया का सार लिख डाला है। बधाई। बहुत ही अच्छा लगा पढ़कर। इसलिए ही तो कहते हैं, लड़ाई किसी समस्या का हल नहीं है। प्यार ही सबसे बड़ी चीज है और ये सबको समझना चाहिए। धन्यवाद।
bhut bhut acha likha h sir apne...snsar kisi ka nahi h or hai to fir sabhi ka h
bahoot khoob lekin batwara to ho hi gaya......... ab kitne honge aur kya jaroorat hain is par prakash dalein to achcha hoga........
बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
पोस्टर!, सत्येन्द्र झा की लघुकथा, “मनोज” पर, पढिए!
भाई साहब, हमेशा की तरह आपके शब्दों की जादूगरी संदेश को कामयाबी से देने में सफल रही।
...बहुत-बहुत शुक्रिया।
बेहद बढिय़ा सर।
बहुत सुन्दर सार्थक सन्देश देती रचना के लिये बधाई।
बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
काव्य प्रयोजन (भाग-९) मूल्य सिद्धांत, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें
उत्साहवर्धक टिप्पणियों के लिए सभी साथियों का आभार। ब्रजेश जी मुझे लगता है आपके सवाल का जवाब इन पंक्तियों में हो सकता है...
हमने अपना लोक बसाया,
चारों ओर है अपनी माया।
माया का विस्तार है इतना,
स्वर्गलोक का सार न जितना।
अगर टूटते हैं हम दोनों,
अगर कोई बंटवारा होगा।
तो न संसार तुम्हारा होगा,
न संसार हमारा होगा।।
सुधीर जी ....... ग़ज़ब लिखा है.
सभी पंक्तिया जबरदस्त ...एक से बढ़कर एक.
सार्थक प्रयास ....उत्तम रचना.
आभार .....
सुन्दर सन्देश देती हुई शानदार रचना लिखा है आपने! हर एक पंक्तियाँ लाजवाब है! इस उम्दा रचना के लिए बधाई!
सभी पंक्तिया लाजवाब। बहुत अच्छी प्रस्तुति। सुन्दर सार्थक सन्देश देती रचना के लिये बधाई।
bahut sundar
bahut achhi hai kavita
मन्त्र मुग्ध कर देने वाली बेहतरीन रचना। ...आभार।
bahut badiya......
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