सुखना का यह संकट कौन दूर करेगा

जो भी चंडीगढ़ घूमने आता है, उसने यहां रॉक गार्डन और सुखना झील जरूर देखी होगी। इस खूबसूरत शहर की पहचान मानी जाती है यह झील। सुखना करीब छह माह से एक नए संकट से जूझ रही है। इसमें एक रहस्यमय इक्वेटिक वीड तेजी से पनप रही है। यह रहस्यमय कंटीली वनस्पती गर्मियों में सुखना की ऊपरी सतह पर इतनी ज्यादा फैल गई थी कि बोटिंग एरिया भी प्रभावित होने लगा था। तब इसे हटाने के लिए करीब सत्तर मजदूर लगाए गए। उन्हें भी इसे हटाते समय एलर्जी का शिकार होना पड़ा। अब बारिश के बाद जलस्तर बढ़जाने पर यह ऊपरी सतह पर नहीं है मगर पानी के अंदर अब भी लहलहा रही है। जिस गति से यह बढ़ती है, उससे यह पूरी संभावना है कि यह सर्दियों में पानी की ऊपरी सतह पर फिर अपना कब्जा जमा ले।

यह जलीय वनस्पति क्या है, इसे लेकर भी अटकले ही हैं, अब तक चार नाम सामने आ चुके हैं, मगर किसी को भी लेकर ही विशेषग्य पुष्ट नहीं हैं। इसे वेलिसनेरिया, ब्राजील चारा वीड, हाइड्रीला के बाद अब पोटामोजेटोन बताया जा रहा है। मजदूरों वाली योजना से इसका पूरा सफाया न होने के बाद अब प्रशासन झील में बीस हजार ग्रास कॉर्प मछलियां डालने की योजना बना रहा है।
हालंकि गर्मियों में बड़ी ग्रासकॉर्प मछलियां पानी में ऑक्सीजन की कमी से मरने लगी थीं, तब उन्हें निकालने के लिए ठेका दिया गया था। यह भी अभी तक पता नहीं है कि क्या झील में ऑक्सीजन की कमी इसी रहस्यमय जड़ी की वजह से तो नहीं हुई है।
सोमवार को हिन्दुस्तान के चंडीगढ़ संस्करण में छपी खबर के मुताबिक बॉटनी विशेषग्यों कहते हैं कि जलीय वनस्पतियां अनुकूलन के लिए अपने रंग-रूप में बदलाव भी लाती हैं। संभवतः इस बदलाव की वजह से ही यह आसानी से पहचान में नहीं आ रही।मगर अनुकूलन लंबे समय की प्रक्रिया है। अगर ऐसा है तो यह संभव है कि इस जड़ी के अंकुर या बीज कई साल पहले से सुखना की सतह पर पनपने का संघर्ष कर रहे हों।
इसी तरह की समस्या १९६० में अमेरिका के फ्लोरिडा की झीलों में शुरू हुई थी। वहां हाईड्रीला ने कुछ ही वर्षों में करीब साढ़े तीन सौ मील जल सतह पर कब्जा कर लिया था। तब उसकी रोकथाम के लिए उपाय शुरू किए गए। नतीजा यह है कि अमेरिका में इस पर नियंत्रण के लिए अब भी हर साल लाखों डॉलर खर्चे जाते हैं।

अब सवाल यह है कि सुखना को इस नए संकट से कौन मुक्त करेगा। प्रशासन इससे निपटने के लिए बस अंधेरे में तीर चला रहा है। देश के बॉटनी साइंसदानों को इसमें रुचि लेनी चाहिए। यह उन्हीं का विषय है।

Comments

बहुत विश्लेषणात्मक आलेख। काफ़ी गहन अध्ययन के बाद आपने इसे पोस्ट किया है। साधुवाद।
पांच साल रहा चंडीगढ। कई शामें, दिन बिताए सुखना के साथ। जो आप बता रहे हैं वह बहुत ही दुखद है। आशा है कि इस समस्या पर ज़ल्द ही क़ाबू पा लिया जाएगा।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
शैशव, “मनोज” पर, आचार्य परशुराम राय की कविता पढिए!
अच्छी जानकारी .........

एक बार पढ़कर अपनी राय दे :-
(आप कभी सोचा है कि यंत्र क्या होता है ..... ?)
http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_13.html
बहुत ही उत्कृष्ट विचार ,धन्यवाद .
Vivek kumar said…
upekcha ki had hai ye ....
रंजना said…
बिलकुल नयी जानकारी है यह मेरे लिए....
सचमुच यह जानना बड़ा रोचक होगा कि इसके कारन क्या हैं और निवारण किस विधि हो सकता है..

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