कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिर-सुमिर नर उतरें पारा।। पांच सौ साल पुरानी चौपायी की यह कड़ी आज भी हमारे समाज की उतनी ही सही तस्वीर है, जितनी कि तबके समाज की होगी। नाम का सहारा लेकर लोग अब भी अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करते हैं, चाहे वे राजनीतिक हों, आर्थिक हों या सामाजिक। यही वजह है कि धर्मस्थलों के साये में या धर्म के नाम पर कई बार वे संगठन तेजी से ताकतवर होते हैं, जिनकी आस्था भय और आतंक में होती है। अगर हम लोग खुद से ही यह सवाल करें कि व्यवस्था को बनाए रखने के लिए भय कितना जरूरी है तो ज्यादातर यही जवाब देंगे कि भय नहीं होगा तो लोग मनमानी करेंगे। पुलिस का डर नहीं होगा तो सब चोरियां करेंगे। कानून का भय नहीं होगा तो सब अपराध करेंगे।
अब सवाल उठता है कि क्या हमारे पास चरित्र नहीं है और जो है उसका निर्माण भय ही करता है। भय नहीं होगा तो हम कुछ भी करेंगे?
इस फिलासफी और हमारे मनोविग्यान में खोट है। भय में जब तक हमारी आस्था है, तब तक समाज में आतंकवाद ऐसे ही फलेफूलेगा। वह उस रक्तबीज राक्षस की तरह है कि एक मारोगे तो उसके खून से दूसरा उग आएगा। यह भय हममें कहां से आया, यह सवाल महत्त्वपूर्ण नहीं है, यह भय हमारे अंदर जन्म से कुदरत ने दिया और जंगल के हर जीव में होता है। यह भय उसकी रक्षा भी करता है। सवाल यह है कि यह भय आज भी कायम है। जंगल में भय था मगर हमने सभ्य समाज का आधार भी भय को ही बनाया। समाज में सभ्यता की रचना करने वाले सभी धर्म लोगों को बुरे कर्मों से बचाने के लिए भय को ही आधार बनाते हैं, ईश्वर का डर दिखाया जाता है। गरुण पुराण जैसे ग्रंथ भी हैं जिन्हें पढ़ कर रूह तक कांप जाती है। करीब-करीब सभी धर्मों में इस तरह के डर दिखाए गए हैं। चाहे वह कयामत के दिन की बात हो। इस तरह सभ्य समाज की रचना करने में भी प्रेम की जगह भय का ही सहारा लेना पड़ा।
विचार का यह भय ही खतरनाक है, जो बार-बार आतंकवाद बनकर हमारे सामने आ खड़ा होता है। कहा जाता है औरंगजेब रोज सवा मन जनेऊ उतरवा देता था, उसकी धर्मिक कट्टरता ने बहुत से सिर कत्ल किए, सिर्फ इसलिए ताकि वह खुद को मजबूत रख सके और मुगलों में लंबी उम्र तक उसने शासन भी किया। इससे वह खुद तो मजबूत रहा मगर मुगल साम्राज्य की दीवारें खोखली कर गया। उसके जाते ही वह भरभरा कर गिरा। तालिबान और लादेन ने भी अपने समाज में लोकप्रियता और मजबूती अपनी धार्मिक कट्टरता की वजह से ही पायी मगर आज हालत यह है कि पूरी दुनिया में समाज की साख को बट्टा लगा और अमेरिका जैसे देश तो सिर्फ इसलिए किसी व्यक्ति की जामा तलाशी लेते हैं कि उसका सर नेम खान या ऐसा ही होता है। उनके दिल पर क्या गुजरती है।
धर्म के नाम पर अगर लोग भीरू बनेंगे तो यकीन मानो कि किसी भी महत्वाकांक्षी के मन में यह भावना आ सकती है कि इस आतंक को हथियार बनाकर भीरू लोगों को डराया जा सकता है और उन पर शासन किया जा सकता है। यही वजह है कि धर्म का चोला ओढ़कर आतंकवाद जब भी आया है, वह समाज के लिए ज्यादा घातक और ज्यादा लोगों की जान लेने वाला साबित हुआ है। धर्म युद्धों के नाम पर लोग हजारों सालों से मरते और मारे जाते रहे हैं। जो लोग कहते हैं कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता, वे गलतफहमी में हैं आतंकवाद किसी भी रंग का हो सकता है। महाभारत के युद्ध को धर्मयुद्ध कहा जाता है, इसमें १८ अक्षोणी कौरव सेना और १६ अक्षोणी पांडव सेना थी, जिसमें से पांच पांडव और कुछ ही लोग बचे थे। दुर्योधन ने अधर्म किया था मगर बाकी जो लाखों लोग मरे वे सिर्फ इसलिए क्योंकि युद्ध करना उनकी जीविका का साधन था। वे सिपाही थे। इस तरह कुछ लोगों की महत्त्वाकांक्षाओं को धर्म मानकर लोग हिंसा पर उतर आते हैं। जान लेते और देते हैं।
जो लोग यह मानते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, वे या तो भोले हैं या बहुत ज्यादा चतुर हैं। जब तक आतंकवाद धर्म का नाम ले कर फलता-फूलता है तब तक यह उम्मीद होती है कि सत्ता अब इसी धर्म के नाम पर चलेगी मगर जैसे ही सरकारों की प्रतिहिंसा उस पर भारी पड़ने लगती है तब उसी धर्म के नेता बोलने लगते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। यह नारा बहुत देर से आता है। पंजाब में पंद्रह साल आतंकवाद चला और करीब तीस हजार लोग मारे गए। धर्मस्थलों तक में हथियार छुपाये गए। उन्हें किसी ने नहीं रोका।
धर्म के नाम पर सत्ता बनाने की महत्त्वकांक्षा सभी धर्मों के लोगों में देखी जाती है। यह गाहे-बगाहे आतंकवाद के रूप में सामने आती है। इस तरह आतंकवाद हरा, पीला, भगवा, नीला, केसरिया, लाल, सफेद किसी भी रंग में हो सकता है। जब तक हम बच्चों को धर्म के नाम पर भय का पाठ पाढ़ाएंगे, तब तक वे दादागीरी का सपना देखते रहेंगे। दंबंग होने की धुन भविष्य में और लादेन पैदा करेगी। धर्म के नाम पर सिर्फ प्रेम का संदेश दिया जाए तभी दुनिया से आतंकवाद खत्म हो सकता है।
आतंकवाद की खुराक भय है और जब तक धर्म में भय दिखाने की बात होगी तब तक यह विष बेल पलती रहेगी। एक पत्ता तोड़ोगे तो दूसरा उगता रहेगा।
सेक्सी ममता
-
महिला आयोग की श्रीमती ममता का कहना है की 'सेक्सी' माने सुन्दर। यदि सेक्सी
माने सुन्दर तो फिर 'सुन्दर' ही कहो न , ज्यादा सभ्य लगता है। फिर भी ममता जी
को इतन...
1 hour ago

18 comments:
बहुत अच्छी प्रस्तुति।
हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।
स्वच्छंदतावाद और काव्य प्रयोजन राजभाषा हिन्दी पर, पधारें
very nice..
bahut hi badiya ..
A Silent Silence : Mout humse maang rahi zindgi..(मौत हमसे मांग रही जिंदगी..)
Banned Area News : Book on 'secret lovers' of Carla Bruni set to release in France
very nice..
अच्छी प्रस्तुति।
सुधीर जी ...आप मेरे जैसे लोगों को भोला कहिए या कुछ और
ये लेकिन मैं इस बात को कभी स्वीकार नहीं कर सकता कि
आतंकवाद का कोई धर्म होता है या रंग . ये केवल एक बुराई है
बुराई रंगहीन और धर्महीन ही होती है . हाँ आतंकवादियों
का कोई न कोई धर्म ज़रूर होता. मेरे पोस्ट पर आये कमेन्ट में
आप ने खुद स्वीकार किया रंग अपने आप में किसी का प्रतीक
नहीं होते और यहाँ आप कह रहे हैं कि
आतंकवाद किसी भी रंग का हो सकता है। जो कि एकदम विपरीत है
आपके आतंकवाद पैदा होने के कारण पर मैं कुछ नहीं कहना चाहता .
इस संदर्भ में आश्चर्य की बात यह भी है कि जो लोग इस बात पर छत पर
खड़े होकर चिल्लाते रहे कि आतंकवाद के साथ किसी मज़हब, रंग या विचारधारा को जोड़ना गलत है
क्योंकि आतंकवादी चाहे किसी भी मज़हब या संप्रदाय के हों, वे खूनी, निर्मम और अमानुषिक होते हैं।
आतंकवादी का न कोई मज़हब होता है, न विचारधारा।
जो लोग अब तक यही बात उस आतंकवाद के बारे में कहते रहे
जो सीधे-सीधे इस्लाम के फैलाव और हिंदुओं तथा भारतवर्ष से नफरत पर टिका रहा है,
वही अब उछल-उछलकर भगवा रंग को आतंकवाद से जोड़कर ऐसी खुशी मना रहे हैं
मानो आतंकवाद का भगवाकरण किसी राष्ट्रीय त्यौहार का विषय हो।
Aapke liye ye link de rahun ho sake to use bhi zaroor padhna.
http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/bharatiyam/entry/%E0%A4%85%E0%A4%97%E0%A4%B0-%E0%A4%86%E0%A4%A4-%E0%A4%95-%E0%A4%AE-%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5
ye Vijay Tarun ka likha gayaa blog hai.
वीरेंद्र जी,
आपने तरुण विजय के लेख का लिंक दिया, जो उन लोगों के लिए लिखता है जो पहले एक मस्जिद गिराने के लिए आंदोलन चलाते हैं और जब वह गिरा दी जाती है तो अदालत में जाकर मुकर जाते हैं कि हमने नहीं गिराई। इस गिराने में बहुत सी जानें भी जाती हैं, मकसद के लिए जान देने वाले शहीद कहलाते हैं, मगर ये लोग अपने ही शहीदों को यह कहकर गाली देते हैं कि यह काम हमने नहीं किया (अर्थात यह काम गलत था और उन्हें इसका अपराधबोध है और दशक बीत जाने के बाद इनके नेता इसके लिए माफियां भी मांगते हैं।) भावनाओं को भड़काने वाले ऐसे लेख तालिबानों और लादेन के लिए भी खूब अफगानिस्तान में लिखे गए। वहां भी बहुत से तरुण विजय थे जो तालिबानों की धर्म बीट देखते रहे। आज नतीजा क्या है, तालिबानों की वह कथित देशभक्ति और धर्मभक्ती दुनिया में सबसे ज्यादा रक्तपात का कारण बनी और भारत कश्मीर से लेकर दक्षिण तक इस आतंक को भोग रहा है। वहां इस तरह के तरुण विजय भी अब यही लिख रहे हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।
अगर आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता तो धर्म के नाम पर आ रहे चढ़ावे से हथियार क्यों खरीदे जाते हैं। अगर धर्म के नेताओं को यह साबित करना है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता तो उन्हें उन लोगों के नुकसान की भरपायी करनी चाहिए, जिन्हें धर्म का नाम लेकर निशाना बनाया गया। अगर धर्म के नाम पर रक्तपात हो रहा है और धर्मस्थलों का पैसा हथियारों में लगता है तो उस धर्म के आगुओं को इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए। अगर संन्यासी दूसरे धर्म के लोगों पर जाकर बम फोड़ते हैं या मदरसों से सीख कर तालिबानी अन्य धर्म के लोगों को सताते हैं तो क्या इनके नैताओं की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती है? सिर्फ यह कहकर पल्ला झाड़ लेना कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, सबको बेवकूफ बनाना है।
आपने कहा है कि आतंकवाद एक बुराई है, तो मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि कौनसा धर्म बुराइयों से अछूता रहा है, समय के साथ विसंगतियां हर धर्म में आई हैं और इन्हीं धर्मों में कुछ साहसी और महान संत हुए जिन्होंने सुधारवादी आंदोलन चलाए, सभी धर्मों में ये आंदोलन चले। इसी तरह धर्मों के साये में पल रही आतंकवाद रूपी बुराई को शब्दों के आंडबर से छुपा कर नहीं हटाया जा सकता, यह तभी दूर होगी जब धर्मों के बड़े नेता सुधार के लिए आगे आएँ। इसके लिए सबसे पहले तो उन्हें यह मानना होगा कि धर्म से जुडा़ आतंकवाद है और दूसरी कौशिश उसे दूर करने की होनी चाहिए।
जहां तक तुम्हारे ब्लॉग पर मेरी टिप्पणी कि रंग किसी के प्रतीक नहीं होते का तुमने अधूरा इस्तेमाल किया है, जिससे पूरा संदर्भ गलत लग रहा है, इसलिए उसी पंक्ति को मैं फिर से यहां रखकर स्पष्ट करता हूं
-मान्यताएं समाज में ऐसी ही समस्याएं खड़ी करती हैं और आतंकवाद भी रंगीन हो जाते हैं, जब रंग खुद किसी के प्रतीक नहीं होते उन्हें जैसे लोग इस्तेमाल करते हैं, वे उसीके प्रतीक लगने लगते हैं।-
इसमें स्पष्ट है कि जैसे लोग इस्तेमाल करते हैं रंग उसी के प्रतीक लगते हैं, जब आतंकवादी हरा, लाल या भगवा झंडा लहराएंगे तो ये रंग भी उसीके प्रतीक हो जाएंगे। अब यह आपको तय करना है कि पहले रंगों के प्रतीकों को बचाने की बात की जाए या इन्सानों को। मुझे लगता है कि मैं इन्सानों को बचाने की बात करूंगा, अगर इन्सानों को बचाने के लिए आतंकवाद छोड़ दिया जाएगा तो रंगों के प्रतीक अपने आप बच जाएंगे। जिनके मकसद खोटे होते हैं, वही बात घुमाकर करते हैं, तरुण विजय भी भावनाओं को भड़काने के लिए बातों को बहुत घुमा फिरा कर लिखते हैं, पांचजन्य पर विश्वास करने वालों की संख्या इसलिए ही घटी।
वीरेंद्र जी,
आपने तरुण विजय के लेख का लिंक दिया, जो उन लोगों के लिए लिखता है जो पहले एक मस्जिद गिराने के लिए आंदोलन चलाते हैं और जब वह गिरा दी जाती है तो अदालत में जाकर मुकर जाते हैं कि हमने नहीं गिराई। इस गिराने में बहुत सी जानें भी जाती हैं, मकसद के लिए जान देने वाले शहीद कहलाते हैं, मगर ये लोग अपने ही शहीदों को यह कहकर गाली देते हैं कि यह काम हमने नहीं किया (अर्थात यह काम गलत था और उन्हें इसका अपराधबोध है और दशक बीत जाने के बाद इनके नेता इसके लिए माफियां भी मांगते हैं।) भावनाओं को भड़काने वाले ऐसे लेख तालिबानों और लादेन के लिए भी खूब अफगानिस्तान में लिखे गए। वहां भी बहुत से तरुण विजय थे जो तालिबानों की धर्म बीट देखते रहे। आज नतीजा क्या है, तालिबानों की वह कथित देशभक्ति और धर्मभक्ती दुनिया में सबसे ज्यादा रक्तपात का कारण बनी और भारत कश्मीर से लेकर दक्षिण तक इस आतंक को भोग रहा है। वहां इस तरह के तरुण विजय भी अब यही लिख रहे हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।
अगर आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता तो धर्म के नाम पर आ रहे चढ़ावे से हथियार क्यों खरीदे जाते हैं। अगर धर्म के नेताओं को यह साबित करना है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता तो उन्हें उन लोगों के नुकसान की भरपायी करनी चाहिए, जिन्हें धर्म का नाम लेकर निशाना बनाया गया। अगर धर्म के नाम पर रक्तपात हो रहा है और धर्मस्थलों का पैसा हथियारों में लगता है तो उस धर्म के आगुओं को इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए। अगर संन्यासी दूसरे धर्म के लोगों पर जाकर बम फोड़ते हैं या मदरसों से सीख कर तालिबानी अन्य धर्म के लोगों को सताते हैं तो क्या इनके नैताओं की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती है? सिर्फ यह कहकर पल्ला झाड़ लेना कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, सबको बेवकूफ बनाना है।
आपने कहा है कि आतंकवाद एक बुराई है, तो मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि कौनसा धर्म बुराइयों से अछूता रहा है, समय के साथ विसंगतियां हर धर्म में आई हैं और इन्हीं धर्मों में कुछ साहसी और महान संत हुए जिन्होंने सुधारवादी आंदोलन चलाए, सभी धर्मों में ये आंदोलन चले। इसी तरह धर्मों के साये में पल रही आतंकवाद रूपी बुराई को शब्दों के आंडबर से छुपा कर नहीं हटाया जा सकता, यह तभी दूर होगी जब धर्मों के बड़े नेता सुधार के लिए आगे आएँ। इसके लिए सबसे पहले तो उन्हें यह मानना होगा कि धर्म से जुडा़ आतंकवाद है और दूसरी कौशिश उसे दूर करने की होनी चाहिए।
जहां तक तुम्हारे ब्लॉग पर मेरी टिप्पणी कि रंग किसी के प्रतीक नहीं होते का तुमने अधूरा इस्तेमाल किया है, जिससे पूरा संदर्भ गलत लग रहा है, इसलिए उसी पंक्ति को मैं फिर से यहां रखकर स्पष्ट करता हूं
-मान्यताएं समाज में ऐसी ही समस्याएं खड़ी करती हैं और आतंकवाद भी रंगीन हो जाते हैं, जब रंग खुद किसी के प्रतीक नहीं होते उन्हें जैसे लोग इस्तेमाल करते हैं, वे उसीके प्रतीक लगने लगते हैं।-
इसमें स्पष्ट है कि जैसे लोग इस्तेमाल करते हैं रंग उसी के प्रतीक लगते हैं, जब आतंकवादी हरा, लाल या भगवा झंडा लहराएंगे तो ये रंग भी उसीके प्रतीक हो जाएंगे। अब यह आपको तय करना है कि पहले रंगों के प्रतीकों को बचाने की बात की जाए या इन्सानों को। मुझे लगता है कि मैं इन्सानों को बचाने की बात करूंगा, अगर इन्सानों को बचाने के लिए आतंकवाद छोड़ दिया जाएगा तो रंगों के प्रतीक अपने आप बच जाएंगे। जिनके मकसद खोटे होते हैं, वही बात घुमाकर करते हैं, तरुण विजय भी भावनाओं को भड़काने के लिए बातों को बहुत घुमा फिरा कर लिखते हैं, पांचजन्य पर विश्वास करने वालों की संख्या इसलिए ही घटी।
वीरेंद्र जी,
आपने तरुण विजय के लेख का लिंक दिया, जो उन लोगों के लिए लिखता है जो पहले एक मस्जिद गिराने के लिए आंदोलन चलाते हैं और जब वह गिरा दी जाती है तो अदालत में जाकर मुकर जाते हैं कि हमने नहीं गिराई। इस गिराने में बहुत सी जानें भी जाती हैं, मकसद के लिए जान देने वाले शहीद कहलाते हैं, मगर ये लोग अपने ही शहीदों को यह कहकर गाली देते हैं कि यह काम हमने नहीं किया (अर्थात यह काम गलत था और उन्हें इसका अपराधबोध है और दशक बीत जाने के बाद इनके नेता इसके लिए माफियां भी मांगते हैं।) भावनाओं को भड़काने वाले ऐसे लेख तालिबानों और लादेन के लिए भी खूब अफगानिस्तान में लिखे गए। वहां भी बहुत से तरुण विजय थे जो तालिबानों की धर्म बीट देखते रहे। आज नतीजा क्या है, तालिबानों की वह कथित देशभक्ति और धर्मभक्ती दुनिया में सबसे ज्यादा रक्तपात का कारण बनी और भारत कश्मीर से लेकर दक्षिण तक इस आतंक को भोग रहा है। वहां इस तरह के तरुण विजय भी अब यही लिख रहे हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।
अगर आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता तो धर्म के नाम पर आ रहे चढ़ावे से हथियार क्यों खरीदे जाते हैं। अगर धर्म के नेताओं को यह साबित करना है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता तो उन्हें उन लोगों के नुकसान की भरपायी करनी चाहिए, जिन्हें धर्म का नाम लेकर निशाना बनाया गया। अगर धर्म के नाम पर रक्तपात हो रहा है और धर्मस्थलों का पैसा हथियारों में लगता है तो उस धर्म के आगुओं को इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए। अगर संन्यासी दूसरे धर्म के लोगों पर जाकर बम फोड़ते हैं या मदरसों से सीख कर तालिबानी अन्य धर्म के लोगों को सताते हैं तो क्या इनके नैताओं की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती है? सिर्फ यह कहकर पल्ला झाड़ लेना कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, सबको बेवकूफ बनाना है।
आपने कहा है कि आतंकवाद एक बुराई है, तो मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि कौनसा धर्म बुराइयों से अछूता रहा है, समय के साथ विसंगतियां हर धर्म में आई हैं और इन्हीं धर्मों में कुछ साहसी और महान संत हुए जिन्होंने सुधारवादी आंदोलन चलाए, सभी धर्मों में ये आंदोलन चले। इसी तरह धर्मों के साये में पल रही आतंकवाद रूपी बुराई को शब्दों के आंडबर से छुपा कर नहीं हटाया जा सकता, यह तभी दूर होगी जब धर्मों के बड़े नेता सुधार के लिए आगे आएँ। इसके लिए सबसे पहले तो उन्हें यह मानना होगा कि धर्म से जुडा़ आतंकवाद है और दूसरी कौशिश उसे दूर करने की होनी चाहिए।
जहां तक तुम्हारे ब्लॉग पर मेरी टिप्पणी कि रंग किसी के प्रतीक नहीं होते का तुमने अधूरा इस्तेमाल किया है, जिससे पूरा संदर्भ गलत लग रहा है, इसलिए उसी पंक्ति को मैं फिर से यहां रखकर स्पष्ट करता हूं
-मान्यताएं समाज में ऐसी ही समस्याएं खड़ी करती हैं और आतंकवाद भी रंगीन हो जाते हैं, जब रंग खुद किसी के प्रतीक नहीं होते उन्हें जैसे लोग इस्तेमाल करते हैं, वे उसीके प्रतीक लगने लगते हैं।-
इसमें स्पष्ट है कि जैसे लोग इस्तेमाल करते हैं रंग उसी के प्रतीक लगते हैं, जब आतंकवादी हरा, लाल या भगवा झंडा लहराएंगे तो ये रंग भी उसीके प्रतीक हो जाएंगे। अब यह आपको तय करना है कि पहले रंगों के प्रतीकों को बचाने की बात की जाए या इन्सानों को। मुझे लगता है कि मैं इन्सानों को बचाने की बात करूंगा, अगर इन्सानों को बचाने के लिए आतंकवाद छोड़ दिया जाएगा तो रंगों के प्रतीक अपने आप बच जाएंगे। जिनके मकसद खोटे होते हैं, वही बात घुमाकर करते हैं, तरुण विजय भी भावनाओं को भड़काने के लिए बातों को बहुत घुमा फिरा कर लिखते हैं, पांचजन्य पर विश्वास करने वालों की संख्या इसलिए ही घटी।
बहुत सुन्दर और शानदार प्रस्तुती!
शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!
सुधीर जी ....आप ने बहुत सारी बातें लिखीं .उन बातों के बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहता मेरी बहस केवल आतंकवाद को रंग और धर्म से
जोड़ने पर है.मैं तो केवल ये सिद्ध करना चाहता हूँ
कि आतंकवाद का न तो कोई धर्म होता है न कोई रंग.ऐसा मानने वालों में , मैं केवल अकेला हूँ, या हिन्दू कट्टरपंथी हैं या केवल संघी हैं , ऐसा भी नहीं है. मैंने कुछ मुस्लिम दोस्तों के ब्लॉग भी पढ़े, जिन्होंने आतंकवाद को धर्म से जोड़ने पर आपत्ति की. कांग्रेस पार्टी ने भी इसकी आलोचना की है.आपने भी ऐसे कई लोगों और संगठनों के वयान पढ़े होंगे जिन्होंने आतंकवाद को किसी रंग या धर्म से जोड़ने पर अपना ऐतराज जताया है.जिन्होंने इसका समर्थन किया है वह एक
तो आप हैं दुसरे मुलायम सिंह यदाव ,लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान हैं, कुछ और भी ज़रूर होंगें. शायद वामपंथी ऐसा ही मानते होंगे. अपनी बात के समर्थन में, मैं आपको वरिष्ट पत्रकार श्री मधुसुदन आनंद का पिछले दिनों सन्डे नई दुनिया में छपें उनके एक आलेख की कुछ पंक्तियाँ यहाँ आपके लिए लिख रहा हूँ ---"ऐसा नहीं की हमारे गृह मत्री श्री पी० चिदंबरम इस बात को न जानते हों कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता | मगर जब दक्षिण पंथी हिन्दू संगठनों और तत्वों के आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के पैटर्न के लिए 'भगवा आतंकवाद ' जैसे शब्द का प्रयोग किया तो वे भूल गए कि भगवा भारतीय जीवन का एक प्रतिनिधि रंग है |यह भारतीय संस्कृति की पहचान का रंग है | वे भूल गए कि भगवा रंग को हमारे स्वाधीनता आन्दोलन और
हमारे राष्ट्रिय ध्वज में भी जगह मिली है | भगवा रंग भौतिक त्याग और आधियात्मिक कामना का रंग है | वह सूर्योदय का रंग है, वह शौर्य और बलिदान का रंग है,वह आग और अंतिम सत्य यानी कि चिता का रंग है उसे आतंकवाद के साथ जोड़ा नहीं जा सकता."
ये तो कुछ पंक्तियाँ ही हैं. उनके सम्पूर्ण आलेख में अच्छी तरह से ये समझाया गया है कि आतंकवाद का कोई रंग या धर्म नहीं होता है
आपने तरुण विजय के लेख के सन्दर्भ में कई बातों का उल्लेख किया..मैंने आपसे ये अपेक्षा नहीं की थी आपने उन्हें संघी समझकर उनका लेख पढ़ा.अगर आपने उन्हें केवल एक लेखक समझकर उन्हें पढ़ा होता तो उसमे लिखी गई कुछ बातों को आपने ज़रूर माना होता . मैं जब भी किसी के लिखे को पढता हूँ तो वो मेरे लिए पहले एक लेखक होता है बाद में कुछ और, आज जिन लोगों को 'हिन्दू'आतंकवाद का प्रतीक मानकर 'भगवा' आतंकवाद का खौफ फैलाया जा रहा है उनकी संख्या इतनी है कि उन्हें उँगलियों पर गिना जा सकता है .(महत्वपूर्ण बात यह भी है कि उनके मामले में अदालत का निर्णय आना अभी बाकी है)लेकिन उनसे लाखों गुना लोग अच्छे और परोपकार के कामों में लगे हैं. पर उन लोगों के कामों
के आधार पर तो 'भगवा' परोपकारवाद, या 'भगवा' उपकारवाद की अवधारणा सामने नहीं आती. अच्छाई प्रत्यक्ष होने के बावजूद 'भगवा' आतंकवाद का जाप करने वाले उस अच्छाई का प्रचार नहीं करते. उसको मान नहीं देते. सुधीर जी हकीकत तो आप भी जानते हैं 'भगवा' आतंकवाद की अवधारणा वोटबैंक की नीति से ही प्रेरित है. क्या इससे 'भगवा' रंग का अपमान नहीं होता है ?
फिर भी अगर आप आतंकवाद को किसी रंग से जोड़ना ही चाहते है तो काला रंग इसके लिए सही रहेगा. वैसे मूल रूप से मुझे बुराई को किसी रंग या धर्म से जोड़ने पर आपत्ति है.
सुधीर जी .. आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ. भगवा आतंकवाद पर आपके विचार पढ़े .आपने बहुत सारे तथ्यों को अपनी सोच के मुताबिक रक्खा है,देश के चलाने वालों के मुंह से अचानक ये बात फूटती है कि भगवा आतंकवाद से बच के रहना होगा वही मंत्री अपने आप को धर्म निरपेक्ष बताते हुए चुनाव में वोट मांगते हैं.एक छोटी सी आग लगाकर चुनाव में बड़ा धमाका करना चाहते हैं और हम भारतीय एक शब्द के पीछे लड़ने लगे हम तो वो बातें भी भूल गए कि हमारा देश पुराने समय से ही
संस्कृति के रंगों से सजा है, हम अब एक -2 रंग को अलग करके देश को बर्बाद करने
पर तुल गए हैं.ये मंत्री और लेखक अपने को साबित करने के फेर में लग गए हैं.दुःख होता है जब ऐसे लेख मैं पढता हूँ.दिल को मत भूलिए जो पूरे देश में एकता को बनाए हुए है.दिमाग़ के साथ दिल को भी इस्तेमाल करना चाहिए. हम हिन्दुस्तानी हैं और हमें हिन्दुस्तान के बारे में सोचना चाहिए वह बचपन की कहानी तो आपको याद ही होगी जिसमें एक किसान और उसके
चार बेटे थे बाकी इस कहानी का सार तो आपको पता ही होगा हमें फ़ालतू की बातों को छोड़कर इस बात पर ध्यान देना चाहिए.तभी हम एक देश की सीमा से बढकर विश्व में अपना नाम और अपने भारत का नाम रौशन कर सकते हैं.मैंने इस सन्दर्भ में एक -दो लोगों के ब्लॉग पढ़े लेकिन जो भी लिखता है मिला-जुला ही लिखता है .
वीरेंद्र जी और शिशिर जी,
सवाल सिर्फ रंग का नहीं, सवाल यह है कि धर्म का नाम लेकर आतंकवाद रूपी बुराई तेजी से बढ़ रही है। हर धर्म में कुछ ऐसे लोग घुस आए हैं या घुस रहे हैं, जिनका विश्वास हिंसा में है और वे लोगों को इसके लिए भड़काते हैं। आपको क्या लगता है अफागनिस्तान और पाकिस्तान के लोग यू ही तालिबान बन गए होंगे उन्हें धर्म का नाम लेकर ही भड़काया गया। पंजाब के आतंकवाद में भी धर्म के नाम का इस्तेमाल हुआ। पिछले चालीस साल से धर्म में आतंकवाद रूपी बुराई घुस आई है। लोगों को इसके खिलाफ खुद जागरूक होना चाहिए। जहां तक तरुण विजय का सवाल है तो उसे मैं नब्बे के दशक से पढ़ रहा हूं, वह ऐसे ही लिखता है, वह उन लोगों का प्रिय है, जिन्हें यह लगता है कि धर्म पर खतरा मंडरा रहा है, उसका मकसद तो पता नहीं क्या है मगर भाषा भड़काने वाली ही है।
जहां तक राजनीतिक पार्टियों का सवाल है, उनका उद्देश्य सिर्फ खुद को सत्ता में बनाए रखना है। उन्हें लगता है कि भगवा आतंकवाद कहने से उन्हें फायदा मिलेगा तो वह यही कहेंगे, जब उन्हें लगेगा कि मस्जिद गिराने से फायदा मिलेगा तो वे मस्जिद गिरा देंगे। कल को इन्हें ही लगेगा कि देश बेचने से फायदा मिलेगा तो ये देश भी बेच देंगे। इनके भरोसे और बहकावे में मत आओ। धर्मों में आतंकवाद रूपी बुराई पैठ बनाए इसके खिलाफ जागो। जिन धर्मस्थलों में दूसरे धर्म या दूसरे धर्म के अनुयायियों की बुराई हो उनका बहिष्कार करो। धर्म का मतलब सिर्फ प्रेम और भाईचारा होना चाहिए। कोई धर्म संकट में नहीं होता, ऐसे आतंकवादी ही धर्म को संकट में डालते हैं। जहां तक वीरेंद्र जी आप कहते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता ऐसा मुसलिम लेखक भी लिख रहे हैं तो मैं कहता हूं कि यह तो सब लिखेंगे अगर यह लिखा कि फलां धर्म से जुड़ कर आतंकवाद नुकसान पहुंचा रहा है तो उसके लिए साहस चाहिए और उन आतंकवादियों द्वारा किए जा रहे नुकसान की भरपायी भी करनी होगी। यह टिप्पणी किसी एक धर्म के लिए नहीं है, यह सभी के लिए है और सभी को सोचना होगा। यह धर्म के अनुयायियों को तय करना होगा कि कोई उनके धर्म का नाम लेकर आतंकवादी संगठन न चलाए। उन्हें चढ़ावे और दान की रकम न जाए।
वीरेंद्र जी और शिशिर जी,
सवाल सिर्फ रंग का नहीं, सवाल यह है कि धर्म का नाम लेकर आतंकवाद रूपी बुराई तेजी से बढ़ रही है। हर धर्म में कुछ ऐसे लोग घुस आए हैं या घुस रहे हैं, जिनका विश्वास हिंसा में है और वे लोगों को इसके लिए भड़काते हैं। आपको क्या लगता है अफागनिस्तान और पाकिस्तान के लोग यू ही तालिबान बन गए होंगे उन्हें धर्म का नाम लेकर ही भड़काया गया। पंजाब के आतंकवाद में भी धर्म के नाम का इस्तेमाल हुआ। पिछले चालीस साल से धर्म में आतंकवाद रूपी बुराई घुस आई है। लोगों को इसके खिलाफ खुद जागरूक होना चाहिए। जहां तक तरुण विजय का सवाल है तो उसे मैं नब्बे के दशक से पढ़ रहा हूं, वह ऐसे ही लिखता है, वह उन लोगों का प्रिय है, जिन्हें यह लगता है कि धर्म पर खतरा मंडरा रहा है, उसका मकसद तो पता नहीं क्या है मगर भाषा भड़काने वाली ही है।
जहां तक राजनीतिक पार्टियों का सवाल है, उनका उद्देश्य सिर्फ खुद को सत्ता में बनाए रखना है। उन्हें लगता है कि भगवा आतंकवाद कहने से उन्हें फायदा मिलेगा तो वह यही कहेंगे, जब उन्हें लगेगा कि मस्जिद गिराने से फायदा मिलेगा तो वे मस्जिद गिरा देंगे। कल को इन्हें ही लगेगा कि देश बेचने से फायदा मिलेगा तो ये देश भी बेच देंगे। इनके भरोसे और बहकावे में मत आओ। धर्मों में आतंकवाद रूपी बुराई पैठ बनाए इसके खिलाफ जागो। जिन धर्मस्थलों में दूसरे धर्म या दूसरे धर्म के अनुयायियों की बुराई हो उनका बहिष्कार करो। धर्म का मतलब सिर्फ प्रेम और भाईचारा होना चाहिए। कोई धर्म संकट में नहीं होता, ऐसे आतंकवादी ही धर्म को संकट में डालते हैं। जहां तक वीरेंद्र जी आप कहते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता ऐसा मुसलिम लेखक भी लिख रहे हैं तो मैं कहता हूं कि यह तो सब लिखेंगे अगर यह लिखा कि फलां धर्म से जुड़ कर आतंकवाद नुकसान पहुंचा रहा है तो उसके लिए साहस चाहिए और उन आतंकवादियों द्वारा किए जा रहे नुकसान की भरपायी भी करनी होगी। यह टिप्पणी किसी एक धर्म के लिए नहीं है, यह सभी के लिए है और सभी को सोचना होगा। यह धर्म के अनुयायियों को तय करना होगा कि कोई उनके धर्म का नाम लेकर आतंकवादी संगठन न चलाए। उन्हें चढ़ावे और दान की रकम न जाए।
वीरेंद्र जी और शिशिर जी,
सवाल सिर्फ रंग का नहीं, सवाल यह है कि धर्म का नाम लेकर आतंकवाद रूपी बुराई तेजी से बढ़ रही है। हर धर्म में कुछ ऐसे लोग घुस आए हैं या घुस रहे हैं, जिनका विश्वास हिंसा में है और वे लोगों को इसके लिए भड़काते हैं। आपको क्या लगता है अफागनिस्तान और पाकिस्तान के लोग यू ही तालिबान बन गए होंगे उन्हें धर्म का नाम लेकर ही भड़काया गया। पंजाब के आतंकवाद में भी धर्म के नाम का इस्तेमाल हुआ। पिछले चालीस साल से धर्म में आतंकवाद रूपी बुराई घुस आई है। लोगों को इसके खिलाफ खुद जागरूक होना चाहिए। जहां तक तरुण विजय का सवाल है तो उसे मैं नब्बे के दशक से पढ़ रहा हूं, वह ऐसे ही लिखता है, वह उन लोगों का प्रिय है, जिन्हें यह लगता है कि धर्म पर खतरा मंडरा रहा है, उसका मकसद तो पता नहीं क्या है मगर भाषा भड़काने वाली ही है।
जहां तक राजनीतिक पार्टियों का सवाल है, उनका उद्देश्य सिर्फ खुद को सत्ता में बनाए रखना है। उन्हें लगता है कि भगवा आतंकवाद कहने से उन्हें फायदा मिलेगा तो वह यही कहेंगे, जब उन्हें लगेगा कि मस्जिद गिराने से फायदा मिलेगा तो वे मस्जिद गिरा देंगे। कल को इन्हें ही लगेगा कि देश बेचने से फायदा मिलेगा तो ये देश भी बेच देंगे। इनके भरोसे और बहकावे में मत आओ। धर्मों में आतंकवाद रूपी बुराई पैठ बनाए इसके खिलाफ जागो। जिन धर्मस्थलों में दूसरे धर्म या दूसरे धर्म के अनुयायियों की बुराई हो उनका बहिष्कार करो। धर्म का मतलब सिर्फ प्रेम और भाईचारा होना चाहिए। कोई धर्म संकट में नहीं होता, ऐसे आतंकवादी ही धर्म को संकट में डालते हैं। जहां तक वीरेंद्र जी आप कहते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता ऐसा मुसलिम लेखक भी लिख रहे हैं तो मैं कहता हूं कि यह तो सब लिखेंगे अगर यह लिखा कि फलां धर्म से जुड़ कर आतंकवाद नुकसान पहुंचा रहा है तो उसके लिए साहस चाहिए और उन आतंकवादियों द्वारा किए जा रहे नुकसान की भरपायी भी करनी होगी। यह टिप्पणी किसी एक धर्म के लिए नहीं है, यह सभी के लिए है और सभी को सोचना होगा। यह धर्म के अनुयायियों को तय करना होगा कि कोई उनके धर्म का नाम लेकर आतंकवादी संगठन न चलाए। उन्हें चढ़ावे और दान की रकम न जाए।
जिस दिन बंदूक की गोली हिन्दू और मुसलमान को पहचान कर लगने लगेगी उस दिन संभव है कि आतंकवाद को कोई रंग या नाम दिया जा सकेगा। फिलहाल आतंकवाद को भगवा या इस्लामिक कहना सियासी धूर्तता है। यह बिना हथियार के फैलाये जाने वाला आतंकवाद है, जिसे समय-समय पर कुछ स्वार्थी लोग फैलाते रहते हैं। जैसा कि पिछले दिनों गृह मंत्री पी चिदंबरम ने किया।
आतंकवाद बंदूक की गोली नहीं फैलाती, वह दिमाग फैलाता है, जिसके हाथ में ट्रिगर होता है, और वह कोई कट्टरपंथी भी हो सकता है, जिसके मन में दूसरे धर्म के लिए कटुता भरी हो। चाहे पंजाब का आतंकवाद हो या जेहाद या भगवा आतंकवाद, धर्म के ठेकेदार यही कहते रहे हैं, उनका धर्म जिम्मेदार नहीं है। जबकि हकीकत यह होती है कि धर्मस्थलों के चढ़ावा के पैसे से हथियार खरीदे जाते रहे और धर्मस्थल आतंकवादियों की शरणस्थल बन रहे। इसलिए इन ठेकेदारों द्वारा रचे जा रहे भ्रम में नहीं फंसना चाहिए और धर्म के नाम पर दुनिया में फैलते आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होना चाहिए।
सुधीर जी
आपकी बात एक दम सत्य है आतंकवाद जहन में होता है और वह हिन्दू-मुसलमान किसी के भी हो सकता है। बावजूद इसके आतंक आतंक ही रहेगा न कि भगवा या हरा। गली, मोहल्लों, मंदिर मस्जिदों और चौक चौबारों पर बम धमाके या हथियाबंद लोगों द्वारा आक्रमण या फिर किसी हवाई जहाज को लेकर बिल्डिंग से टकरा जाने को ही हम आतंकवाद समझते हैं तो अधूरा असत्य है। अयोध्या विवाद पर फैसला आने वाला है, आरएसएस, विहिप सब एक स्वर में बोल रहे हैं फैसला हमारे खिलाफ आया तो बर्दास्त नहीं करेंगे, ये वही लोग हैं जो न्यायपालिका का सम्मान करने का दम भरते हैं। अयोध्या पर फैसला चाहे जो आए लेकिन लोग आज से आतंकित हैं कि 24 सितंबर को क्या होगा।
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