वेतनभोगी और नेता

सुधीर राघव
'महंगाई डायन खाय जात है`, बेचारा वेतनभोगी रघुवीर यादव का सुर निकाल रहा है-क्या करें मालिक वेतन ही नहीं बढ़ाता है। खर्चे लगातार बढ़ रहे हैं। अब गुजारा नहीं होता।
'तो फिर नेता क्यों नहीं बन जाते?` मित्र समझा रहा है-संसद में जाओ और मजे से अपना पांच-छह गुणा वेतन बढ़ाओ। न किसी से पूछने की जरूरत, न कोई रोकने वाला। बोझ बढ़ेगा तो डाल दो पब्लिक पर, वह है न ढोने के लिए।
'नेतागीरी हमसे नहीं होगी, उसके लिए भी तो कुछ क्वालीफिकेशन वगैरा चाहिए या नहीं।Ó वेतनभोगी अपनी लाचारी जता रहा है- हमें भाषण करना भी तो नहीं आता है और लोग क्यों सुनेंगे हमारी? सुनने के लिए पहले ही बड़े-बड़े नेता पड़े हैं। उनके बीच हम कहां टिकेंगे।
'अरे! नेता बनने के लिए किसी क्वालीफिकेशन की जरूरत नहीं है।...अच्छा यह बताओ कि तुम्हारे परिवार में कभी कोई मंत्री, विधायक रहा है।`
'नहीं।`
'कोई पार्षद या सरपंच।`
'नहीं।`
'तब तो तुम सिर्फ जमीन से जुड़े नेता बन सकते हो।` मित्र बात को खोलकर समझा रहा है।
'जमीन से जुड़ा नेता? वो क्या होता है?`
'जमीन से जुड़ा नेता नहीं जानते।..अरे राजनीति में भी जमीन बनानी पड़ती है।...और जमीन यानी प्रॉपर्टी। जमीन से जुड़ा नेता मतलब इस प्रॉपर्टी से डील करने वाला। हर नेता को जमीन चाहिए। इसलिए जमीन से जुड़े नेता की नेताओं में बहुत इज्जत होती है। वह चुनाव में खड़े होने, बैठने सबके पैसे लेता है। कोई जीते या हारे, कोई किसी की जमीन कब्जाए या कोई किसी को जमीन से बेदखल करे, उसका कमीशन पक्का।...यानी दोनों हाथों में लड्डू।`
'इसके लिए करना क्या होगा?` वेतनभोगी की आंखें फैलकर सवालिया निशान हो जाती हैं।
'कुछ खास नहीं, बस रोज शहर के जो दो चार बड़े नेता हैं उनके यहां जाओ। दिन भर वहीं डटो, खाओ-पियो और यह हवा बनाते रहो कि हर मोहल्ले में बस तुम्हारे ही लोग हैं। चार-छह चेले चपाटे रखो। बड़े नेता जिस मोहल्ले में जाएं तो वे फूल मालाएं लेकर पहले से पहुंच जाएं। तुम्हारे और नेताजी के नाम के जयकारे लगाएं।...इसके बाद जब चुनाव नजदीक आएं तो चेलों की मार्फत यह शिगूफा छुड़वाओं की इस बार तुम भी मैदान में ताल ठोकने वाले हो। किसी पार्टी की टिकट के तुम मोहताज नहीं हो, अपने दम पर जीतने की कूव्वत रखते हो।...फिर देखो कैसे नेता खुद तुम्हारे पास दंडवत करते हुए नोट लेकर पहुंचते हैं।`
'यह सब भी हमसे नहीं होगा।` वेतनभोगी बेबसी जता रहा है-चेला-चपाटे कहां से लाएंगे। इसके लिए भी तो खर्चा-पानी चाहिए। पैसा कहां से आएगा? ...कुछ और बताओ।
'कुछ और...तो आत्महत्या कर लो। आत्महत्या का भी तो सरकार पैसा
देती है।`
'यह पैसा तो बस किसानों को मिलता है। वेतनभोगी को देखना है तो पंजाब के मास्टरों को देख लो, बेचारे रोज पानी की टंकी पर चढ़े रहते हैं, कई ने जान दी, क्या हुआ?...कोई अच्छी सलाह दो।` वेतनभोगी बुरा सा मुंह बना रहा है।
'अच्छी सलाह...तो मर्द बनो मर्द।`
'मतलब?`
'मतलब...बच्चा दूध पीने की जिद करे, बिस्कुट मांगे, खिलौना मांगे तो डांट दो। बीवी नई साड़ी की फरमाइश करे तो झल्ला जाओ कि आज खाना कैसा बनाया है। अभी तक खाना बनाना नहीं आता। संयम सीखो। सप्ताह में दो चार दिन व्रत रखो?`
मित्र की इस सलाह पर वेतनभोगी मौन है। मगर बाहर गली में लाखों सामवेत स्वर उठ रहे हैं-महंगाई डायन खाय जात है...।

(हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के कलम में २९ अगस्त २०१० को प्रकाशित)

Comments

Vivek kumar said…
prasangikata ke saath achhi post lagi sir.
paper me bhi padha tha.
Sudhir ji....Ye vayang bahut mast hai.

Bahut hi badhiya..post.
Sudhir ji....Ye vayang bahut mast hai.

Bahut hi badhiya..post.

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