क्रिकेट को खेल ही रहने दें, धर्म न बनाएं

एक स्कूल की घटना बता रहा हूं। छात्रों को दिवाली का प्रस्ताव लिखने के लिए दिया गया। एक छात्र लिख कर लाया हमारे देश में बहुत से त्योहार मनाए जाते हैं। दिवाली उनमें से एक है। होली भी एक त्योहार है, इस दिन हम एक दूसरे पर रंग फैंकते हैं। गुरुपर्व पर हम गुरुद्वारों में जाते हैं। लंगर छकते हैं। क्रिसमस पर हम चर्च में प्रार्थना करते हैं। ईद पर हम एक दूसरे के गले मिलते हैं। रक्षाबंधन पर बहने अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं। .....इत्यादि।

जरा सोचो इस लेख पर अध्यापक की प्रतिक्रिया क्या रही होगी। जाहिर है उसने छात्र को मुर्गा बनाया और दो चार बेंत भी फटकारे। अध्यापक अगर बहुत ज्यादा सभ्य होता तो वह कहता, जाओ पुस्तकालय में जाकर अध्ययन करो। परिवार वालों से पूछों, दिवाली के बारे में पता करो और फिर से प्रस्ताव लिखो।

विषय की पूरी जानकारी न हो तो व्यक्ति विषय से भटकता है। संजय भास्कर के ब्लॉग आदत..मुस्कुराने की पर क्रिकेट का समाज के विकास में योगदान पढ़ कर ऐसा लगा। शीर्षक पढ़कर लगा कि इसमें क्रिकेट के योगदान को लेकर अच्छी जानकारियां मिलेंगी मगर निराशा हुई। क्रिकेट के अलावा बाकी सब विषयों पर शब्द खर्च किए गए। पोस्ट का लेखक कहता है कि -जब सवाल पूछ लिया तो जवाब दिया जाना जरूरी है।



यह नजरिया ही अटपटा है। सवाल पूछा है, इसलिए जवाब देना जरूरी नहीं होता, जवाब हो तभी वह दिया जाना चाहिए, नहीं तो विषय से भटककर आप हास्यस्पद हो जाते हैं। आप धर्म तो अकेले क्रिकेट को बताते हैं मगर जब इसके योगदान की बात आती है तो अन्य खेलों की ओट में छिपने लगते हैं। मैं यह भी जानना चाहता हूं कि वे कौन से मानक हैं, जिनके तहत ठीकठाक क्रिकेट खेलने वाले को तो भगवान कह दिया जाता है, मगर अपने दम पर एक नहीं कई बार हॉकी विश्वकप जिताने वाले को सिर्फ जादूगर कहा जाता है। जादूगर यानी हाथ की सफाई दिखाने वाला। क्या ये मानक आपको अन्य खेलों के प्रति हमारी उपेक्षा के द्योतक नहीं लगते।



आइये अब इस सवाल को देखते हैं क्रिकेट एक मनोरंजन का साधन है। इस संबंध में एक बात पूछना चाहूंगा कि एक दिन में मनोरंजन के कितने घंटे होने चाहिए। एक-दो-तीन या छह। एक महीने में अगर तीन टेस्ट हुए तो कुल मिलाकर नब्बे घंटे का मनोरंजन हुआ। कुछ वनडे भी हुए तो महीने के सबसे उपयोगी समय के सौ से ज्यादा घंटे सिर्फ मनोरंजन में गए। प्रतिदिन आठ घंटे के हिसाब से महीने में २४० घंटे काफी उपयोगी होते हैं इसमें से आधा समय हमें मनोरंजन को दे देना चाहिए। बहुत बढ़िया। इसका असर देखते हैं...
व्यवस्थाओं के पतन में क्रिकेट का हाथ- सरकारी कार्यालयों में क्रिकेट के जुनून ने काफी काम प्रभावित किया है। मैच के लिए छुट्टी लेना। ड्यूटी के समय में रेडियो कान से लगाये रखना, हमारे देश के सरकारी कार्यालयों में ये दृश्य आम था। एक तो भ्रष्टाचार और ऊपर से कामचोरी की आदत। क्रिकेट का इसमें योगदान क्या है यह बताने की जरूरत नहीं। सब जानते हैं। हमारा मीडिया भी क्रिकेट के नाम पर लोगों की भावनाओं से खेलता है। एक वरिष्ठ पत्रकार अपने ब्लॉग पर लिखते हैं कि कॉमनवेल्थ घोटाला मीडिया सामने लेकर आया। क्रिकेट में इससे बड़े घोटाले हैं, आईपीएल भी मीडिया सामने नहीं लाया, वह तभी निकला जब मोदी और थरूर ने खुद ट्विट किया। मीडिया को पता है कि क्रिकेट से विग्यापन मिलते हैं अन्य खेलों से क्या मिलेगा। मैच फिक्सिंग की कहानी भी किसी से छुपी नहीं है।
आदत.. मुस्कुराने की संदर्भ वाली पोस्ट के लेखक आमीन ने एक और सवाल उठाया है कि कोई किसी की भी पूजा कर सकता है। हां, करे। उसे कौन रोक रहा है। जैसे कोई किसी की पूजा कर सकता है, वैसे ही कोई किसी से असहमत भी तो हो सकता है। असहमत होना क्या गुनाह है। पूजा करने वाला तो अपनी भावनाएं सार्वजनिक कर सकता है मगर असहमत होने वाला नहीं, यह कौन सा मानक है।
कहना चाहूंगा कि क्रिकेट की इस अंधी भक्ति ने अन्य खेलों को भी देश में काफी नुकसान पहुंचाया है। मगर नई पीढ़ी में यह अंधी भक्ति नहीं दिखाई देती, जो हमारी पीढ़ी में थी। वह समझदार है और क्रिकेट के नाम पर हो रहे खेल को भी समझती है। क्रिकेट के नाम पर हो रहे इस खेल से तो खुद खिलाड़ी भी दुखी हैं। इस बार ट्वेंटी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप की हार के बाद धोनी ने लेट नाइट पार्टियों का जिक्र किया था इसके अलाव खिलाड़ी बर्न आउट की बात भी करते रहते हैं। महीने में सौ घंटे के मनोरंजन को मनोरंजन नहीं कहा जा सकता। यह धंधा बन रहा है। इसमें ज्यादातर वे हैं जो क्रिकेट खेलते नहीं हैं। कुछ चारणभाट प्रंशसागीत गा रहे हैं, कुछ कारोबारी मोटा मुनाफा कमा रहे हैं।
क्रिकेट के अगर लाभ गिनें तो आज भारत इस खेल में महाशक्ति है। आईसीसी उधर ही झुकता है, जहां भारत चाहता है न कि इसका जन्मदाता ब्रिटेन। इसे यह शक्ति बनाया है, इसके नाम के पीछे पैदा किए गए जुनून ने। यह देश में कितने करोड़ का बिजनेस है यह आंकड़े भी इसके लाभ में दिए जा सकते हैं। मगर यह इसके खेल होने की गरिमा के नहीं, इसके तेजी से धंधा बनने की कहानी कहते हैं।
अंत में स्टाइलिश खिलाड़ी लक्ष्मण के बारे में कहना चाहूंगा कि कौन कहता है कि चमत्कार दोहराये नहीं जाते। पहले द्रविड़ के साथ और इस बार रैना के साथ लक्ष्मण ने दिखाया कि चमत्कार करना वह जानते हैं। इस टेस्ट में सचिन ने भी जीवनदान मिलने के बाद लक्ष्मण का अच्छा साथ निभाया। लक्ष्मण की ये दो पारियां मुझे किसी भी खिलाड़ी के शतकों के अंबार पर भारी लगती हैं। इसके बावजूद मैं लक्ष्मण को भगवान नहीं कहना चाहूंगा, वह एक सच्चा खिलाड़ी है। वह विपरीत परिस्थियों में जीत पैदा करता है। उसने अपनी टेस्ट क्रिकेट का उच्चतम स्कोर बांग्लादेश के खिलाफ नहीं बनाया है।
इसलिए कह रहा हूं कि क्रिकेट को खेल ही रहने दें और इसे धर्म न बनाएं। इसे धर्म बनाकर बहुत से ठेकेदार अपनी दुकानें चलाना चाहते हैं। ये दुकानें इस खेल और खिलाड़ी दोनों को तबाह कर सकती हैं।


संदर्भ के लिए अवश्य देखें -

http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2010/08/blog-post_06.html

http://pramathesh.blogspot.com/2010/08/blog-post_05.html
बाज़ार के हवाले भूख

Comments

Mansoor Ali said…
Behtreen Sameeksha,swasthya chintan,vichaarny alekh.
Dhanywaad.
aap ne to blog par Chakka Mar dia.
Akshita (Pakhi) said…
सही कहा आपने...
____________
'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है.
बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
brajesh said…
well concept. It must be cricized and b banned. otherwise ppl will get again and again such common wealth game where (wealth comes in common way in the pocket of organizer). Whether the entertainment is concern in concern of game its too much if u doing entertainment in such way hving seen the game for so much long time like 2-4 hours it will nt give u anything but boring feeling and till wasting....... so Just take game as game don't make it religion or way of entertainment. it must be in limited hours. nt like that ipl which runs for month or more than month..... u just c the things there is 3900 crore rs is going to b waste (now i can say it is wastage, not for the pride of our country and our high presence in field of game)while our ppl r starving in orrissa, bengal and a lot of states....... If 1 ppl were donated 1 crore rs. just imagine how much ppl were crorepati.... but its just game of game to earn money to fill the blank tijories and acoount..... so just stop all that we must hv to shoute and b unit agains such ''game''. nice article of Raghav ji it must be continued in favour of country as well as our children's future....
Babli said…
बहुत ही बढ़िया और विचारणीय आलेख! उम्दा प्रस्तुती!
Anonymous said…
vichaar karne laayak baat kahi hai aapne......
bahut badiya...



http://bannedarea.blogspot.com/
Pawan Rana said…
bhut acha kiya sir apne in cricket ke bakto ka bhut sa nikal diya, ye log to cricket ko bigad rhe h...khiladi bechara mehnat karta rah jata hai..team main selection kisi aur bhai ka ho jata...is duniya ka sbse bda danda ban gya h cricket
Babli said…
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स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ !

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