प्रेम खुशफहमी से शुरू होता है और गलतफहमी पर खत्म

प्रिय मनोज, खाप पंचायतों के संदर्भ में तुम्हारी लंबी टिप्पणी मुझे जीमेल और आर्कुट पर तीन हिस्सों में मिली, उसे पिछली पोस्ट में तुम हू-ब-हू देख सकते हो। तुमने अपनी बात बड़ी बेबाकी से कही और यह बेबाकी चीजों और समस्याओं को समझने में मदद करती है।
असल में मान्यताओं से मुक्ति नहीं मान्यताएं ही तनाव देती हैं। इसका लेफ्ट या राइट से कोई संबंध नहीं, जहां तक लड़कियों के जीवन बर्बाद करने वाली बात तुमने लेफ्ट वालों के बारे में बताई है उसका भी लेफ्ट और राइट से कोई संबंध नहीं है। दक्षिणपंथी बाबाओँ पर भी यौन उत्पीड़न की आरोप लगते रहते हैं और काफी कुछ सामने आता रहता है। असल में ये चीजें व्यक्तिगत चरित्र पर निर्भर करती हैं। किसी विचारधारा का इससे ज्यादा लेनादेना नहीं होता। एक लेफ्टवाला भी मान्यतावादी हो सकता है, जब वह मानकर चले कि उसे लेफ्ट ही चलना है, जबकि सारे तर्क राइट या मिडल के पक्ष में हो। हमारी सारी बहस अधिक तार्किक होने को लेकर है। हम राइट की मान्यता को लेफ्ट से काटें और लेफ्ट की राइट से, हमारा मकसद यह भी नहीं है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि मान्यता किसी खोज के लिए शुरुआती चरण तो हो सकती है मगर मंजिल मिल जाने के बाद भी उसी मान्यता से चिपके रहो तो यही मान्यतावाद है। यही समाज में तनाव पैदा करता है। जैसे कि माना मूलधन सौ की मान्यता लेकर हम असली मूलधन की गणना कर लेते हैं और बाद में असली मूलधन को ले लेते हैं और मान्यता को छोड़ देते हैं।
अब जिस लड़की का उदाहरण आपने दिया है उसके संदर्भ में ही, लड़की किसी से प्रेम करती थी, उसे उसके साथ जाना है। दूसरी ओर लड़की को यह भी पता है कि मुझे तो एक न एक दिन मां-बाप के घर से जाना ही है। अगर में इस लड़के के साथ नहीं जाउंगी, जो मुझे अच्छा लगता है और जिसपर मेरा विश्वास है तो मुझे किसी अन्जान के साथ जाना होगा। उसे घर से जाना ही है, इसलिए उसके लिए प्रेम विवाह का रास्ता दुविधा जरूर पैदा करता है मगर अंतर्मन से बाधा खड़ी नहीं करता और वह पिता का घर अपनी मर्जी से छोड़ने का फैसला भी कर लेती है। दूसरी ओर पिता की यह मान्यता है कि अगर लड़की फैसला करती है तो उसकी नाक कटती है। वह इसका विरोध करता है। वह इस पर विचार करने के लिए एक बारी भी राजी नहीं होता कि क्या लड़की इससे खुश रहेगी। बच्चे कानून का सहारा लेकर शादी कर लेते हैं। उसके बाद वास्तविकताएं सामने आती है। दूसरी तरह के तनाव सामने आते हैं। अब लड़की अपने मां-बाप को त्याग कर आई होती है। लड़के को पता है कि अब उसके सिवा इसका कोई दूसरा ठिकाना नहीं है। लड़की की स्थित कमजोर हो जाती है। लड़का अपनी खीज भी उसपर निकालने लगता है। लड़की मां-बाप से मदद भी नहीं मांग सकती। दूसरी ओर लड़के के मां-बाप पूरी तरह से लड़के के पक्ष में होते हैं और वे तो चाहते ही हैं कि लड़का इस लड़की को छोड़ दे। तनाव और बढ़ाया जाता है। इस वजह से प्रेम विवाह अक्सर असफल हो जाते हैं। इसकी ज्यदातार वजह यह है कि लड़की का बाप, जिसे हर स्थिति में बेटी को संरक्षण देना चाहिए, वह रिश्ते खत्म कर अपनी ही बेटी को समाज में कमजोर और असहाय छोड़ देता है, सिर्फ उसके उस फैसले की सजा के रूप में जिसमें उसे खुश रहना था।
ऐसे ही केस में अगर पिता लड़की की बात मान कर खुशी-खुशी शादी कर देता तो, लड़की में आत्मविश्वास रहता। तनाव के क्षणों में वह मायके से मदद भी ले सकती थी या लड़के पर भी यह डर रहता कि इसकी भी मदद करने वाले हैं। वह भी मनमाने फैसले नहीं कर सकता। एक और बात मैं कहना चाहूंगा कि प्रेम खुशफहमी से शुरू होता है और गलतफहमी से खत्म। प्रेमियों में कोई किसी का बुरा नहीं करना चाहता, मगर रोज के तनाव या आसपास के लोग उनमें कई बार गलतफहमियां पैदा कर देते हैं। गलतफहमियों से बचाने के लिए आसपास कुछ अच्छे लोग या परिवार के शुभचिंतक होने ही चाहिए। इसलिए पिता का यह फर्ज है कि वह अपनी बालिग लड़की के हर फैसले में उसका साथ थे, कम से कम उसके व्यक्तिगत फैसलों के लिए अपनी मान्यताओं को बीच में लाकर उसे कमजोर न करे। इससे वह बेटी का सबसे ब़ड़ा अहित करता है। अपने बच्चों की सुरक्षा पिता की जिम्मेदारी है।

(मान्यतावाद पर आलेख इस साइट पर भी है, देखें-
http://www.tewaronline.com/bolgari.html

Comments

brajesh said…
thik kahan aapne.......... prem sahi mein aisa prakaran hain jis mein ek galti bahoot mahangi padta hain.....
यह सही है कि पिता द्वारा बेटी को एक अलग इकाई मानना ज़रूरी है उसमे इतनी चेतना उत्पन्न होनी ही चाहिये कि वह स्वयं अपने जीवन के बारे में निर्णय ले सके । बहुत ज़रूरी बात पर आपने अपने विचार प्रस्तुत किये हैं ।
Vivek kumar said…
प्यार किसी भी मान्यता का मोहताज़ नहीं और इसे तर्क के तराजू पे भी नहीं तौलना चाहिए ... हाँ , अगर प्यार सांचा हो तो ... झूठ को तो कहीं पे घुसाया जा सकता है ....

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