पॉल बाबा - हर जुआरी का दिन होता है

स्पेन के संबंध में की गई पॉल बाबा की आखिरी भविष्यवाणी भी सही निकली और खुद को फुटबाल के बड़े खिलाडियों से ज्यादा चर्चित और महान साबित कर उनके संन्यास की घोषणा हो गई। यह ऐसा ही है जब कोई जुए में अथाह सम्पति जीतकर कहने लगता है कि वह अब नहीं खेलेगा। मगर यहां उस ऑक्टोपस से अन्याय हो रहा है, क्योंकि वह कुछ नहीं कर रहा, सब उसके नाम पर जलघऱ वाले कर रहे हैं। वह ऑक्टोपस जुआरी नहीं है, मगर उस जलघर में जरूर कोई जुआरी दिमाग का था, जिसने इतना बड़ा खेल खेला कि पूरी दुनिया अचम्भित है।
कैसीनो में ऐसा अक्सर देखने को मिल सकता है कि कोई जुआरी दाव पर दाव जीत रहा है। उसे सिर्फ इतना कहा जाता है कि आज उसका दिन है। कोई यह भी कहता है कि उस पर देवी मेहरबान है। जैसा कि पिछली पोस्ट में बताया गया कि यह सब प्रोबेबिलटी का गणतीय खेल है। पूर्वानुमान लगाना मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है और पूर्वानुमान अक्सर सब की जिंदगी में सच होते हैं। लेकिन जब वे लगातार सच होने लगते हैं तो आदमी खुद को भगवान मानने लगता है। यहीं वह धोखा खा जाता है।
जुए के खेल में हर जुआरी को अक्सर हारना होता है, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो। इसलिए वह हर बार यह कह कर तोबा करता है कि एक बार उतनी रकम जीत लूं तो फिर कभी नहीं खेलूंगा। मगर उनमें से शायद ही कोई ऐसा कर पाता है। जुआ खेलने वाला तो बर्बाद ही होता है मगर जुआ खिलाने वाला कभी नहीं हारता। यही प्रोबेबिलटी का गणित बताता है। इसे हम इस उदाहरण से देखते हैं। घूमते चक्र पर १०० तक अंक हैं दाव लगाने के लिए। एक बार में कोई एक अंक ही निकलेगा। इसलिए निन्यानवे अंक जुआ खिलाने वाले कैसीनो के समर्थन में है और सिर्फ एक अंक जुआरी की किस्मत के लिए। इतना एक तरफा खेल होने के बावजूद भी जुआरी खेलता है और कई बार जीतता भी है, या जीतता भी चला जाता है। एक साथ आठ नहीं पंद्रह-पंद्रह दाव भी जीतकर विजेता बनता है, मगर इसके बावजूद वह पॉल बाबा नहीं बनता।
पॉल बाबा हमारी मान्यताएं ही बनाती हैं। यह पिछली पोस्ट में भी बताया गया कि पॉल बाबा के लिए सिर्फ दो विकल्पों में से एक चुनना था, जिसके सच होने की संभावना काफी होती है। इसलिए यह कोई बड़ा दांव नहीं था। अब यह देखते हैं कि ऐसी ही भविष्यवाणियों की पुनरावृत्ति की कितनी संभावनाएं हैं, तो आप जानें की फीफा चार साल बाद होता है, ऐसे में चार सौ साल में कम से कम चौदह बार ऐसी भविष्यवाणियां सच हो सकती हैं। ज्यादा से ज्यादा तो आप मानें सौ बार। तब आप आश्चर्य से पागल हो जाएंगे। यही है प्रोबेबिलटी का खेल। जुआघरों में यही खेला जाता है और जुआरी भी पागलपन की हद तक इसके लती हो जाते हैं। इसी तरह अब दुनिया को पॉल बाबा की लत लग गई है। अपने हुनर से जीतने वाले खिलाड़ियों की चर्चा आज पॉल बाबा से कम है।

Comments

sandhyagupta said…
यही है प्रोबेबिलटी का खेल।

solah ane sach.
Shayar Ashok said…
bilkul sahi kaha......
main aapki baaton se
bilkul sahmat hoon....
प्रियदर्शिनी said…
यही तो है ,पाँल बाबा का कमाल

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