आओ अब क्रिकेट से खेलें

सुधीर राघव
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व्यंग्य

क्रिकेट को भगवान मिल गया है और किक्रेट धर्म बन गया है। धर्म में आठ मठ बनाकर लीग खेली जा रही है। लीग भरपूर मनोरंजन कर रही है। जमकर पैसा खींच रही है। करोड़ों के वारे-न्यारे हो रहे हैं। जाहिर है, जिसके पास पैसा है, वही मठाधीश बनने को आतुर है। इसलिए मठों को लेकर भी जंग शुरू हो गई है। इन्हें बढ़ाकर आठ से दस कर दिया गया है। पर मामला बेकाबू दिख रहा है। मठों की इस रार की लपेट में नेताओं की टोपी उछल रही है। क्रिकेट शर्मशार हो रही है। खिलाड़ी और दर्शक हक्के-बक्के हैं। क्रिकेट के भगवान सिर्फ क्रिकेट खेल रहे हैं और क्रिकेट से कोई और खेल रहा है। यह जो खेल रहा है, छाती ठोक कर खेल रहा है। देखो, उसे कौन रोकता है।
क्रिकेट से जो खेल रहा है, वह राजनेता है, बड़ा उद्यमी है, बड़ा स्टार है, दुबई वाले भाई का आदमी है। अब इन खेलने वालों में भी रार है। इसलिए पोल-पट्टी खुल रही है। कोई सुंदरियों पर लट्टू होकर लुट रहा है तो किसी पर ड्रग्स तस्करी और सरकारी जमीन हथियाने के आरोप हैं। अब सब बातें सामने आ रही हैं।
शांति में जो बातें दबी रहती हैं, अब खुल रही हैं। दो लोग झगड़ते हैं तो दोनों का सच सामने आता है। दोनों बड़ी हस्तियां हो तो इनके झगड़े से देश को भी लाभ मिलता है। इस तरह झगडऩा लाभदायक है। हमारे मास्टर और बुजुर्ग जो बचपन में सिखाते थे कि लडऩा पाप है, वे गलत थे। झगड़े में ही चेहरों की नकाब उतरती है। आम जनता जान जाती है कि कहां-कितने करोड़ खाये गए। नेताओं की डकार से जिस चीज का पता नहीं चलता, झगड़ा उसकी पोल खोल देता है। किसने-कितना खाया? यह गीत हर चैनल पर गूंजने लगता है। इस गीत पर चीयर लीडर्स भले न नाचें मगर जनता जोश में आ जाती है। जनता जोश में आती है तो नेता की कुर्सी हिलने लगती है। आयकर वाले सक्रिय हो जाते हैं। वे बही-खाते लेकर निकल पड़ते हैं हिसाब लगाने। इससे हमें सीख मिलती है कि जो नेता आपस में झगड़ें वे ही देश का भला कर सकते हैं। जनता को भी ऐसे ही नेता चुनने चाहिए, जो टांग खींचने में माहिर हों। अपने ही दल से बगावत करने का दम रखें। किसी ने भी एक टुकड़ा ज्यादा खाया, झट से प्रेस कान्फ्रेंस कर दें। और कुछ नहीं तो ट्विटर पर ही एक ट्विट डाल दें। इसके बाद तो अखबार वाले और चैनल वाले सब खंगाल लेंगे। सीबीआई जांच होगी। अपराधी अदालतों के चक्कर काटेंगे। सुबूत मजबूत हुए तो एकाध को सजा भी होगी। ऐसे ही मिलजुल कर लोकतंत्र मजबूत होता है।
इसलिए नेताओ आगे बढ़ो और क्रिकेट से खेलो। लीग के मठों में अपनी गोटियां फिट करो। लीग पर पकड़ होगी तो दर्शकों पर पकड़ होगी। दर्शकों पर पकड़ होगी तो इसी नाम पर तुम भी वोट मांग सकोगे। नोट तो अपने आप बरसेंगे। पर एक बात ध्यान रखना कि जब नोट और वोट पर बंटने का खतरा मंडराये तो आपस में लडऩा मत भूलना। तुम्हारे लडऩे में ही देश का भला है। तुम्हारा लडऩा भी पुण्य का काम है।
(चंडीगढ़ हिन्दुस्तान के कलम पृष्ठ पर 18 अप्रैल 2010 को प्रकाशित)

Comments

Vivek kumar said…
क्रिकेट धर्म, ललित मोदी देव, चिएर्स लीडर्स अप्सराएं और ............सब बर्बाद !

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