मान्यतावादी पैदा करते हैं विवाद

सुधीर राघव

एक किस्सा सुना रहा हूं। एक गांव के किनारे की सड़क से पति-पत्नी लड़ते हुए गुजर गए। उन दोनों को लड़ते हुए गांव के ही दो लोगों ने देखा। इनमें एक शादी-शुदा था और दूसरा कुंवारा। शादीशुदा ने कहा-जरूर औरत की गलती होगी। कुंवारा बोला नहीं, आदमी की ही गलती होगी। मेरा बाप भी बिना वजह मेरी मां से लड़ता रहता है। शादीशुदा ने अपने अनुभव के आधार पर तर्क दिए। थोड़ी देर में विवाद बढ़ गया। तर्क की जगह गाली-गलौच ने ले ली। शोर बढ़ता देख गांव के और लोग भी आ गए। अपनी-अपनी वजहों से वे सभी उन दोनों के गुटों में लामबद्ध हो गए। गर्मी बढ़ने पर हाथापाई हुई और लाठियां चलने लगी। आधे से ज्यादा गांव घायल हुआ। आपस में दुश्मनियां बंध गईं।

पाकिस्तानी भारत में आकर क्रिकेट खेलें या नहीं। लोग अपनी-अपनी मान्यता के अनुरूप इसके विरोध और पक्ष में लामबद्ध हैं। कुछ मातोश्री से निकली भभकियों से प्रभावित हैं। उन्हें दूसरों के और अपने सिर फुड़वालेने में भी संकोच नहीं हैं। कुछ अभिजीत जैसे बौदि्धक मान्यतावादी हैं, जिनके पास अपने अनुभवों के तर्क हैं कि पाकिस्तानियों को क्यों न खिलाया जाए और क्यों न गाने दिया जाए। दूसरी ओर शाहरूख खान जैसे इसके विपरीत मान्यता वाले हैं जो इन्हें नकारने में जुटे हैं। दोनों ओर खूब हल्ला है। मुंबई की शांति दाव पर लगी है। करोडो़ रुपए का खर्च उठाकर सिनेमाघरों की सुरक्षा करनी पड़ रही। दुनिया हंस रही है। जब ऊपर किस्सा पढ़ रहे थे तो आप भी गांववालों की मूर्खता पर हंस रहे होंगे। मान्यतावादियों के साथ यही दिक्कत होती हैं। वे हंसी का पात्र बनते हैं। तटस्थ लोगों को वे मूर्ख ही नजर आते हैं। इस सबके बीच भी कोई व्यावसायी अपना धंधा चला ले जाता है तो वह मूर्ख नहीं होता। वह मान्यताओं से खेलता है। जब खिलाड़ियों की बोली लग रही थी, तब शाहरूख की टीम कोलकाता नाइटराइडर्स के लिए कोई पाक खिलाड़ी नहीं खरीदा गया, जब उनकी फिल्म रिलीज होने वाली थी तो पाक खिलाड़ी प्यारे लगने लगे।
आश्चर्य तो तब होता है जब कुछ चैनल इन मान्यतावादियों का मजमा लगाकर समस्या से जलेबियां बनाते हैं। भले इससे टीआरपी बढ़ती हो, मगर समाज के और मान्यतावादियों का आक्रोश भी बढ़ता है। राष्ट्र का उपहास भी होता है।

आदमी अपने अनुभवों के आधार पर मान्यताओं से प्रभावित होता है। आम आदमी किसी मान्यता के लोकप्रियता के आधार पर भी उससे प्रभावित होता है। मन्यताओं की उम्र आदमी की उम्र से लंबी जरूर हो सकती है, मगर वह सामाज की उम्र से लंबी नहीं होती। समाज सदियों से बहुत सी मान्यताओं को बदलते हुए खत्म होते हुए देख चुका है। गैलीलियो से पहले पश्चिम में यह माना जाता था कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है। मान्यता तोड़ने के लिए जहर पीने के लिए भी बाध्य होना पड़ सकता है, क्योंकि मान्यतावादी मूर्ख ही नहीं भीड़ बनकर खतरनाक भी हो जाते हैं। हरियाणा में खाप पंचायतों के फैसले इसका एक उदाहरण भर हैं।

सदियां गुजर चुकी हैं, बहुत सी मान्यताएं टूटीं मगर समाज में अब भी मान्यतावादियों का ही बाहुल्य है। कुछ मुट्ठीभर लोग हैं जो मान्यताओं से खेलकर फायदा भी उठाते हैं। ऐसे में मीडियाकर्मियों का कम से कम फर्ज बनता है कि वे मान्यतावादी न बनते हुए व्याख्यावादी बनें। वे समस्याओं को मान्यताओं की नजर से नहीं, बल्कि मान्यताओं की सीमाएं बताते हुए वास्तु स्थिति रखें। मान्यतावदियों के झगड़े कभी सुलझाए नहीं जा सकते। दो लोगों के झगड़े पूरे समूह और समुदायों में तबदील हो जाते हैं। इसमें पिसता है आम आदमी। मेहनतकश। जो बंद का आह्वान करता है, उसे सोचना चाहिए कि एक सींग-मूंगफली बेचने वाले के घर उस दिन रोटी कैसे पकेगी। वह तो रोज दिहाड़ी करके गुजारा करता है।

मान्यताओं को कुछ सरल उदाहरणों से भी समझा जा सकता है। सचिन क्रिकेट के भगवान हैं। यह एक मान्यता है। इसके बावजूद उनकी टीम हार जाती है। वह खुद कई बार शून्य पर आउट हुए हैं। नवर्स नाइनटीन के चक्कर में फंसे शतक को तरसते देखे गए हैं। अब कोई और उनसे अच्छा खेलता है या खेलेगा तो मान्यतावादी उसके पक्ष में लामबद्ध होकर एक नया विशेषण उसके नाम में जोड़ देंगे। इन्हीं विशेषणों के पीछे जब भीड़ जमा हो जाती है तो दंगे होते हैं। अगर हम अपनी भाषाओं से यही अनावश्यक विशेषण, जो हमारे मसल्स को अनियंत्रित कर देते हैं, निकाल दें तो समाज के बहुत से झगड़े खत्म हो सकते हैं।

Comments

आमीन said…
मान्यताएं बदलें न बदलें, व्याख्याएं जरूर बदलती हैं
(गुस्ताखी के लिए माफी चाहूंगा)

जिन्हें हम मान्यताएं मान रहे हैं, दरअसल वे मान्यताएं नहीं हैं। जो मान्यताएं हैं, वे बदलती हैं समय के अनुसार। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे मान्यताएं हमेशा झूठी थीं। कुछ मान्यताएं झूठी हो सकती हैं। उन्हें कुछ लोग ही मानते हैं, सब के सब नहीं। एक, दो, पांच, दस, सैकड़ों या हजारों लोगों को तो कोई मूर्ख बना सकता है पर पूरी दुनिया को एक-साथ मूर्ख नहीं बनाया जा सकता।(हो सकता है आप इस बात को मान्यता करार दें और तर्कहीन बताएं।) जिन सैकड़ों, हजारों लोगों को मूर्ख बनाया जाता है, वह भी सदा के लिए नहीं, बल्कि कुछ समय के लिए ही बनाया जा सकता है। आपने खुद कहा कि बहुत सी मान्यताएं टूटी हैं। क्योंकि वे झूठी थीं, और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बहुत-सी नहीं भी टूटी हैं।
एक उदाहरण आपने दिया, सचिन तेंदुलकर के बारे में। और एक अन्य उदाहरण था उन गांववासियों का जो बिना बात के उलझ पड़े।(आपका यह उदाहरण भी एक एेसी मनगढं़त बात हो सकती है, जिसे व्याख्यावादियों ने अपनी सुविधा के लिए गढ़ा हो सकता है।)
मैं भी सचिन के उदाहरण को आगे बढ़ाना चाहूंगा। सचिन जब पैदा हुए थे तो उनके माथे पर महान शब्द लिखा हुआ नहीं था कि वह मान्यता बन जाता। सचिन ने अपनी महानता साबित की है। तूफान में एक एेसी दीया जो तूफान जाने के बाद भी बुझा नहीं है, उसकी दाद देनी ही पड़ेगी। आपको याद होगा, एक समय था जब सचिन के आउट होने के बाद भारतीय क्रिकेट प्रेमियों की जीत की सभी आशाएं धूमिल हो जाती थीं। तब टीम बहुत दयनीय स्थिति में थी। तब भी सचिन अकेले लड़ते थे। जब कोई और बल्लेबाज साथ नहीं देगा और गेंदबाज भी लचर हो जाएंगे तो जीत कैसे लिखी जाएगी। जीत तो पूरी टीम के प्रयास से ही संभव है।
अगर कोई और बल्लेबाज एेसा आता है, जो सचिन से भी अच्छा खेलता है, तो उसे महान कहा जाएगा। लेकिन समय के अनुसार। सचिन के समय में कोई और बल्लेबाज एेसा नहीं हुआ, जिसे सचिन की बराबरी का दर्जा दिया जाए। 20 साल तक खेलने के बाद भी फिट रहना और शतक दर शतक लगाना आसान नहीं है। (हो सकता है इस संदर्भ में आपकी 'व्याख्याÓ कुछ और हो।) यदि कल को सचिन से महान खिलाड़ी होता है तो उसे महान कहने में हम हिचकेंगे नहीं। लेकिन कोई होना चाहिए।
ग्लैलियो ने जहर पीया, यह साबित करने के लिए कि सूर्य पृथ्वी के नहीं, बल्कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। बाद में यह सच भी साबित हुआ। कल को अगर यह यह साबित हो जाता है कि सचिन तेंदुलकर सिर्फ इस वजह से खेलते रहे कि उन पर पैसा लगाने वाली कंपनियां एेसा चाहती थीं(जैसा कि आप कहते हैं), तो हम भी मान लेंगे कि सचिन महान नहीं थे। सचिन महान है, यह मान्यता नहीं एक व्याख्या ही है, जो हर क्रिकेट प्रेमी जानता है।
मान्यताएं बदलें या न बदलें, लेकिन व्याख्याएं जरूर बदलती हैं। कई बार तो झूठी भी साबित होती हैं। जरूरी नहीं कि मान्यताएं झूठी साबित हों, उनका स्वरूप समय के अनुसार जरूर बदल जाता है।
सुधीर said…
मान्यतावादी जब व्याख्या करते हैं तो व्याख्याएं जरूर बदलती हैं

( प्रिय आमीन, गुस्ताखी के लिए माफ करते हुए)

मान्यता १ - सैंकड़ों लोगों को कोई मूर्ख नहीं बना सकता।

व्याख्या- कोई किसी को मूर्ख नहीं बनाता। लोग जानकारी के अभाव में प्रभावित होकर मान्यताओं से जुड़ते हैं। फिर अन्य मान्यतावादियों से इनका टकराव होता है। यह लड़ते हुए लोग तटस्थ या किसी तीसरी मान्यता वाले लोगों को मूर्ख नजर आते हैं। इस तरह कोई किसी को मूर्ख नहीं बनता। लोग मान्यता से कैसे जुड़ते हैं, इसे गांव के उदाहरण से समझा जा सकता है।

मान्यता २- सचिन के संदर्भ में।

व्याख्या - हालांकि वैचारिक रूप से यह अभी कोई बड़ा विषय नहीं। फिर भी प्रसंगवश आपने इस उठाया है तो व्याख्या हाजिर है-भगवान को लेकर चमत्कारिक नतीजे देने की मान्यता है। वह हर हार को अकेले बूते पर जीत में बदलते रहे हैं। दैत्यों की बड़ी-बड़ी सेनाओं को भगवान धूल चटाकर सत्य को स्थापित करते हैं, ऐसी मान्यता है। सचिन के संदर्भ में भगवान की मान्यता का ऐसा कोई बड़ा तर्क सामने नहीं आता। जहां तक टीम को जिताने का सवाल है तो स्टीव वॉ, रिकी पोंटिंग कई बार अपनी हारती टीम को अपने प्रदर्शन से जीत दिलाने में सफल रहे हैं। उनकी टीम लगातार वर्ल्डकप भी जीत रही है। इसके बावजूद उन टीमों में कोई भगवान नहीं है। मान्यतावादी गलतफहमी में रहते हैं, इसलिए उनकी व्यख्याएं बदलती रहती हैं। एक तरफ वह किसी एक को भगवान मानते हैं, दूसरी ओर जब हार होती है तो वह इसके लिए टीम वर्क के उसी सत्य की शरण में मुंह छुपाने चले जाते हैं, जो मानवों ने विकास के लिए गढ़ा है। भारतीय टीम में अगर कोई खिलाड़ी है, जिसके बारे में कहा जा सकता है कि अगर वह अपना चरम प्रदर्शन करे मैच का नतीजा एक तरफा हो जाता है, वह कोई और नहीं सहवाग ही है। इसके बावजूद उसे आप किसी मान्यता में नहीं बांध सकते। वह इन्सान की तरह गलतियां करता है और भगवान की तरह चमत्कार करता है। यही व्याख्या है, जो बदलती नहीं। मान्यतावादियों की व्याख्या ही बदलती है। वह इसलिए क्योंकि जानकारी के अभाव में और मान्यता के मोह में रह कर सही व्याख्या नहीं हो सकती। जब आदमी के पास तर्क खत्म हो जाते हैं तो वह गुंडा हो जाता है। गुंडे से आप झगड़े के अलावा और क्या उम्मीद कर सकते हैं।
kulwant happy said…
मुम्बई विवाद शायद मान्यताओं के दायरे से बाहर है। मुझे लगता मान्यताएं मतलब जो युगों युगांतरों से चली आ रही हों, उनको ही माना जाता है, जैसे ईश्वर का होना।

शायद गलत भी हो सकता हूँ। मुझे आना पड़ा क्योंकि आमीन मुझे यहाँ तक खींच ला..आमीन को समझने के लिए आप तक आना जरूर था। लेकिन अभी अभी समझ से बाहर है।
आमीन said…
जानकारियों का अभाव किसे नहीं है... भगवान भी कोई नहीं
(फिर से गुस्ताखी के लिए माफी चाहूंगा)

मैंने अपनी पिछली टिप्पणी इस बात पर खत्म की थी 'जरूरी नहीं कि मान्यताएं झूठी साबित हों, उनका स्वरूप समय के अनुसार जरूर बदल जाता है।Ó ये मान्यताएं किसी व्याख्यावादी की भी हो सकती हैं। यह भी जरूरी नहीं कि तटस्थ या तीसरी मान्यता वाले लोगों के पास संसार की सभी जानकारियों हों और सही भी हों। वे अपने कार्यक्षेत्र में परफेक्ट हो सकते हैं, सभी में नहीं। एेसे में किसी अन्य की मान्यताओं पर हंसने का हक उन्हें नहीं होना चाहिए।

एक उदाहरण- मेरे एक दोस्त ने बताया कि कर्नाटक में एक प्रथा है कि विवाह योग्य होने पर युवती पर पहला अधिकार उसके मामा का होता है। यदि उसका मामा शादी से इनकार कर दे तो उसका विवाह किसी अन्य से तय किया जा सकता है। यह उनकी मान्यता है। हो सकता है कि 'तीसरी मान्यताÓ रखने वाले या फिर हम लोग इसकी हंसी उड़ाएं। पर हमें इस बात की जानकारी नहीं कि यह प्रथा क्यों और किन परिस्थितियों में शुरू हुई। एेसे में हंसना.....। (आपके गांव वाले उदाहरण पर मैं पहले ही प्रश्न उठा चुका कि, इस पर विश्वास कैसे किया जाए?)

सचिन के संदर्भ में-
आप भगवान के बारे प्रचलित 'मान्यताओंÓ का सहारा लेकर अपनी बात रखना चाहते हैं, जबकि मान्यताओं पर आप विश्वास नहीं करते। आप विश्वास करते हैं व्याख्याओं पर। आप इस मान्यता पर सहमत कैसे हुए कि भगवान ने दैत्यों को धूल चटाई? खैर, हम बात करते हैं वर्तमान की। मैंने सचिन के लिए महान शब्द का इस्तेमाल किया है। भगवान कभी नहीं कहा। उन्हें महान इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि वे दुनिया के सभी क्रिकेटरों से ज्यादा रन बना चुके हैं। क्रिकेट के हर बदलते दौर में भी वे टिके हुए हैं, बीस सालों से। उनके साथ ही विनोद कांबली का करियर शुरू हुआ था, लेकिन वे कहां हैं? उनके बाद भी सैकड़ों क्रिकेटर करियर शुरू करके गुमनामी के अंधेरे में खो चुके हैं। बीस साल कम नहीं होते। सचिन विशेषज्ञ बल्लेबाज हैं, न कि बॉलर। अगर वे हर क्षेत्र में परफेक्ट होते तो उन्हें भगवान कहा जा सकता था। क्रिकेट का भगवान तो ब्रैडमैन को भी नहीं कहा जा सकता।

सहवाग के संदर्भ में-
आपने कहा- भारतीय टीम में अगर कोई खिलाड़ी है, जिसके बारे में कहा जा सकता है कि अगर वह अपना 'चरम प्रदर्शनÓ करे तो नतीजा एकतरफा हो सकता है। इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन आपने सहवाग की काबिलियत बखान करने के लिए एक शर्त का सहारा लिया है 'अगर चरम प्रदर्शन करे तो...Ó। इफ, एल्स जैसी कंडीशन्स लगाकर किसी की काबिलियत बखान नहीं की जा सकती। सीधा कहना ज्यादा अच्छा रहेगा। सचिन के लिए एेसी कोई कन्डीशन कभी किसी ने नहीं लगाई। एेसा कभी नहीं सुना, 'सचिन महान हैं.... यदि.....Ó इसे भी नहीं भूलना चाहिए कि वनडे मैच में वह अकेला ढाई या तीन सौ रन नहीं बना सकता। किसी साझेदार की जरूरत तो रहेगी ही। मेरा मानना है कि जो इन्सान की तरह गलतियां करता है, वह श्रेष्ठ या महान कैसे हो सकता है।

व्याख्याओं और मान्यताओं में अंतर-
जवाब पढऩे के बाद मैं मान्यता और व्याख्या में अंतर स्पष्ट नहीं कर पा रहा हूं। मैं चाहूंगा कि आप व्याख्याओं और मान्यताओं में अंतर स्पष्ट करें। व्याख्यावादियों और मान्यतावादियों में अंतर स्पष्ट करें।
Anonymous said…
sudhir ji ,aap ka lekh padh kar lag raha hai ki aap khud bhi apni baaton ko sahi saabit nahi kar pa rahein hain.dusron ko sahi galat batne key chakar mein aap khud hi uljh gaye lagte hain.na to sachin ne hi kabhi khud ko bhagvan kehlvya hai na hi mujhe lagta hai ki srk apni film k liye kisi bayan ka sahara lenge.or jahan tak sehwag ki baat hai to vo jab bhi kuch aisa bolte hain ki vo ye kar k dikheyge tab unhe mooh ki khani padi hai...
yhaan par baat sachin,sehwag ya sahruk ki nahi hai yhaan per uthaya gya mudaa desh ki akhandta ka hai. vyakhya to hum har kisi per kar sakte hain lekin manytaon ke khilaf aawaj uthana ek alag baat hai. kuch log manytaon ki duhai dete hue desh hit ko bhi nahi dekhte .
mere dost ne karnatka ki prtha ka jikr kiya hai agar is manyta ke virudh koi aawaj uthayega to use vhan per pagal samjha jayega ya phir ho sakta hai jaan se bhi hat dho bethe. Agar dekha jaye to ye prtha bilkul galat hai.
yhan per main baat ye hi hai ki kbhi bhi kisi baat ko lekar agar vivad hota hai to usme aam aadmi hi pista hai .
Isliye manytavadiyon ko koi vivad khada karne se pehle desh ki 100 corore janta ke bare mein bhi sochna chahiye.
manyataaon ke vishaya mein aapki manyata badi pakki nazar aati hai. mera manna hai, koi munnabhai kitni bhi gandhigiri kare, bina Manyata ke uska kaam chalta nahin. gambhir chintan prastut karne ke liye badhai.

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