महंगाई और बेहयाई : जनता की क्रयशक्ति पर सरकारों की बुरी नजर

सुधीर राघव

हमारे सरोकार

महंगाई के दानव के आगे हथियार डालकर लड़ाई का वही तरीका अपनाया जा रहा है, जो हमेशा से किया जाता रहा है। एक योग्य अर्थशास्त्री से ऐसी उम्मीद नहीं थी। अर्थशास्त्र के वितंडों को नई दृष्टि से देखकर प्रधानमंत्री रचनात्मक सुधार के नए फार्मूले दे सकते थे। ऐसी योग्यता उनमें है। पर ऐसा नहीं किया गया। जनता को सिर्फ आश्वासन मिल रहे हैं। कदम जिस तरह के उठाए जा रहे हैं, उससे लगता नहीं कि कुछ ठोस होने वाला है।
असल में उत्पादन और मांग का संतुलन गड़बड़ाते ही बाजार में मौजूद पैसा खटकने लगा है। सीआरआर बढ़ाने का ऐलान हुआ। पेट्रो उत्पादों के दाम बढ़ाने की जो तलवार लटकी हुई है, उससे महंगाई की आग को नई हवा ही मिलेगी। उछलती-कूदती मुद्रास्फीति की ऊंची दर गवाह है कि जनता की जेब किस तरीके से कट रही है। सरकार असहाय है ऐसा नहीं है। वह विकास की नदी के स्वभाविक रास्ते में बांध बनाकर अपनी कुदाल से नहरें निकालना चाहती है। हमारा अनुभव गवाह है कि सरकारी खजाने से अफसरशाही के नियंत्रण में निकलने वाली ये नहरें भ्रष्टाचार की लीक पर चलती हैं। राजीव गांधी अपने कार्यकाल में इस व्यवस्था की यह कह कर आलोचना कर चुके हैं कि खजाने से निकला एक रुपया आम आदमी तक पहुंचते-पहुंचते 10 पैसे रह जाता है। इसके बावजूद उन्हीं की पार्टी की सरकार को बाजार की स्वभाविक विकासधारा खटक रही है। बाजार से पैसा निचोड़ा जा रहा है, आम आदमी की क्रयशक्ति पर डाका डाला जा रहा है।
बड़ा भाई तो बड़ा भाई, छोटा भाई सुभान अल्लाह। केंद्र के कदम देख राज्य सरकारों ने भी आम आदमी की कमाई निचोडऩे के लिए अपने खाली होते खजानों को सुरसा जैसे श्वांस दे दिए हैं। पंजाब सरकार ने एक ही झटके में राज्य की जनता पर 4000 करोड़ रुपए का बोझ डाला। इतना ही नहीं पेट्रोल-डीजल पर 10 फीसदी सरचार्ज भी लगा दिया गया। ऐसे में हरियाणा भी कहां पीछे रहने वाला था। वैट बढ़ा और 101 वस्तुएं महंगी कर जनता से सीधे-सीधे 600 करोड़ रुपए छीनने का जुगाड़ कर लिया गया है। यह पैसा घूम कर जनता तक किस तरह से पहुंचेगा और उसकी किस तरह से बंदरबांट होगी यह बताने की जरूरत नहीं है। पिछले चालीस साल से देश की जनता यह सब देख रही है।
इस सबके बावजूद महंगाई का इलाज नहीं होने वाला है। एक अरब की आबादी में खाद्य वस्तुओं की मांग घटने वाली नहीं है। भूखे पेट सोने वालों की संख्या बढ़ा कर भी नहीं। लोग कब तक भूखे सोयेंगे। यह तरीका समाज में अपराध तथा अशांति बढ़ाएगा। पिछले दस साल में रियल एस्टेट सेक्टर ने किसानों की जो जमीन निगली, उसके वैकल्पिक उपायों पर नहीं सोचा गया। किसानों का कर्जा माफ कर और मुफ्त बिजली का नामकर वोट तो बटोरे जा सकते हैं मगर उत्पादन नहीं बढ़ाया जा सकता। उत्पादन बढ़ाने के लिए किसान के ट्यूबवैल को पूरी बिजली चाहिए। बिजली मिलेगी तो वह उत्पादन से बिजली बिल का खर्चा भी निकाल लेगा। महंगाई के दुष्चक्र का इलाज जनता की जेब काटना नहीं है। अब वोट के लिए नहीं उत्पादन बढ़ाने के बारे में सोचा जाए।

(यह लेख 6 फरवरी 2010 को हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में प्रकाशित हुआ)

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