सुलगती नदी - सच ने खोजी अपनी कलम

पंजाब के आतंकवाद पर मार्क टुली से लेकर सरकारी तथा गैर सरकारी संगठनों और पत्रकार बिरादरी की रिपोर्ट में बहुत से कारण गिनाए गए हैं। अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय चर्चित-बदनाम संगठनों और अनगिनत जटिल शब्दों का सहार लेकर आतंकवाद का सच बताने का दावा किया जाता है। पर विश्वास नहीं जमता और सच की तलाश में हरबार नए सिरे से जांच शुरू होती है।
सच तो सहज होता है, उसे कहने के लिए साहस और बेबाक होने की जरूरत पड़ती है। शब्दों से सच नहीं गढ़ा जा सकता। सच अपने लिए शब्द खोज लेता है। अगर उसे कहा जाना है तो वह अपने लिए जुबां खोज लेता है और अगर लिखा जाना है तो कलम खोज लेता है। सच के लिए कोई बौद्धिक विलास नहीं करने पड़ते। सच वही है, जिस बच्चा-बच्चा जानता है। आतंकवाद का यही सच सहजता से कहा है पंजाब में हिन्दी के हस्ताक्षर सुरेश सेठ ने। उनकी किताब -सुलगती नदी- शब्दों का आडंबर नहीं है। इसके पन्नों में उतर कर जो तस्वीर आपको दिखती है, उसके बारे में पूरे दोआबा के किसी बच्चे से जाकर भी पूछ लेंगे तो वह कहेगा-हां आतंकवाद के दौरान ऐसा ही हुआ था। कैसे तस्कर आतंकवादी बन गए? कैसे बस्तियां उजड़ीं? कैसे कलम के ठेकेदार एक दूसरे को विघटनकारी और राष्ट्रनिर्माता कहते हुए रातोंरात धनकुबेर बने।

किताब कुछ इस तरह रू-ब-रू कराती है-

पहले दूसरे देशों से सोना-चांदी और न जाने क्या-क्या अलाबला ले आते थे और तस्कर कहलाते थे, अब हथियारों की खेप लेकर आते हैं, और बाबे बन गए हैं। पुलिस वाला उनका चौकी भरने चला आता है। कोई धाकड़ भी उनकी हवेलियों के पास से खांस कर गुज़र नहीं सकता। उनका गांव भी क्या कभी उजड़ेगा?

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पूरा इलाका तो एक सहमी हुई नींद में न जाने कब का गुम हो गया। दूर गांव की बस्तियां भी अब बुझ गयीं। कोई-कोई रोशनी कहीं-कहीं अब भी टिमटिमाती है। इस गांव के आसपास कुछ और गांव भी हैं, पर कहीं से भी एक कुत्ते का भौंकने का स्वर नहीं होता। बहुत दिन हुए जब इस सरहद से सोने-चांदी के स्थान पर हथियारों की तस्करी होने लगी थी, तो एक हुक्म हुआ था। किसी गांव में एक कुत्ता भी जिन्दा नहीं रहना चाहिए। इन्हें जहर दे दिया जाए।

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दौड़ते कदमों की आहट इस इलाके में कोई जिग्यासा पैदा नहीं करती। लोग यही मनाते रहते हैं कि यह कदम उनके घर के बाहर आकर न रुक जाएं। फिर कोई इस दर्द भरी आवाज से चीख उठे तो अजीब नहीं लगता। हां कोई जोर-जोर से हंसने लगे तो अवश्य भ्रम होता है, हम किसी दूसरे शहर में तो नहीं चले आये हैं।


सुलगती नदी के उपरोक्त तीनों अंश औपन्यासिक शैली में उस इतिहास को दर्ज करने की शुरुआत भर हैं, जिसे पंजाब के लोगों ने पंद्रह साल से भी ज्यादा समय तक भोगा।जैसे-जैसे कथानक आगे बढ़ता है, एक-एक चेहरे से नकाब उतरने लगता है। पुस्तक प्रदत्त नाम धुंधले पड़ जाते हैं और आप उनके असली नामों से उन्हें पहचानने लगते हैं। हाल ही में चंडीगढ़ की साहित्य अकादमी ने यहां के साहित्य प्रेमियों को सुरेश सेठ से रू-ब-रू कराया इस मौके पर उनके इस उपन्यास की भी चर्चा हुई। लेखिका इन्दुबाली ने उनसे कालजयी रचना के लिए सस्नेह आग्रह किया। माधव कोशिक ने मंच संचालन किया। शहर के लेखकों के तरकश में सुरेश सेठ के लिए कई सवाल थे। डॉ. आत्मजीत का सवाल था, जिन्होंने बंदूक उठाई तो क्यों उठाई। डॉ. चंद्र त्रिखा ने भी लेखक से अपनी उम्मीदों को उजागर किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कथाकार जगमोहन चोपड़ा ने सवालों की सार्थकता बताते हुए इस कार्यक्रम का समापन किया।

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