खमोश! जनता को ध्यान करने दो

सुधीर राघव
व्यंग्य
देश में शोर है कि जनता ध्यान कर रही है। तो क्या बड़े-बड़े योग गुरुओं, महात्माओं और महापुरुषों की मेहनत रंग ला रही है। वे वर्षों से जुटे थे कि लोग ध्यान करें, मगर पब्लिक मान नहीं रही थी। कोई सुबह चार बजे उठकर आंतडिय़ां घुमा रहा था कि अतीत के सुख-दुख को भूल जाओ। कल्पना में मत जिओ। कल्पनाजीवी और अतीतजीवी ध्यानी नहीं हो सकता। वर्तमान में दृष्टा बनकर जिओ या फिर नष्ट हो जाओ। ध्यानी बनकर ही आप सांसारिक लक्ष्यों को साध सकते हैं। पर ये गूढ़ बातें भी पब्लिक को समझ नहीं आ रही थीं।
पौराणिक कथन है कि भगवान शंकर ने माता पार्वती को ध्यान की 1१२ विधियां बताई थीं, हमारे ये नए मेडिटेशन स्पेशलिस्ट हर व्यक्ति के लिए एक अलग विधि लेकर हाजिर थे।
इसके बावजूद लोग आकर यही शिकायत करते कि गुरु जी ध्यान नहीं लग रहा। जनता ध्यान लगाए इसके लिए कला, विज्ञान और अध्यात्म को जोड़ कर डिवाइन विजन तैयार किया गया। समझाया गया कि ध्यान लगाओगे तो इन आड़ी तिरछी लकीरों में आपको अपने ईष्टदेव नजर आएंगे। पर पब्लिक को कुछ नजर नहीं आया।
अब अचानक क्या हुआ कि जनता ध्यान लगाए बैठी है। सत्ता पक्ष इसे भंग करने की जुगत में है। विपक्ष ऐसा होने नहीं देना चाहता। वह चीख रहा है, सत्ता पक्ष लिब्राहन रिपोर्टी रूप धार कर विश्वामित्र रूपी जनता का ध्यान भंग कर रहा है। जनता ध्यान में है इसे ध्यान करने दो।
उधर, योगियों ने भी तलाश शुरू कर दी है कि यह अचानक नया कौन सा मंत्र आ गया, जिसने सब पर जादू कर दिया। इसकी न मार्केटिंग हुई, न टीवी पर कोई प्रोग्राम आया। गुरुओं ने चेलों से कहा, जाओ पता लगा कर आओ यह किस नए गुुरु की करतूत है। कहीं चीनीयों का तो कोई चक्कर नहीं। वे अपनी जुगाड़ तकनीक से सब जगह टांग फंसाए हैं। अब हमारे धंधे में भी कूद पड़े तो सारा मार्केट चौपट कर देंगे।
जो आज्ञा गुरुदेव! कहकर चेला निकला और जनता के घर की घंटी बजा दी। काफी देर तक अंदर से कोई जवाब नहीं आया। चेले ने फिर घंटी बजाई। कोई प्रतिक्रिया नहीं। थक हार कर उसने सोचा कि अंदर चल कर देखा जाए, जनता जिंदा भी है या नहीं। उसने पहले भी सुन रखा था कि चोरी हो, डकैती हो, भ्रष्टाचार हो, चीर हरण हो, नेता धोखा दे कर दूसरे दल में शामिल हो जाए, सड़क पूरी बनने से पहले टूट जाए, हमारी जनता कोई प्रतिक्रिया नहीं देती। पर क्रिकेट मैच, टीवी की एड और दरवाजे की घंटी पर भी प्रतिक्रिया न दे, ऐसा हो नहीं सकता।
दरवाजा खुला था, चेले ने प्रवेश किया। सामने जनता एकटक रसोई की ओर निहार रही थी। टोकरी में सब्जी नहीं थी, डिब्बों में दाल नहीं थी, कनस्तर में आटा नहीं था। जनता का भूखा पेट पीठ से लगा था। उसमें आंतडिय़ों के उभार स्पष्ट नजर आ रहे थे। चेले ने अपनी तोंद पर हाथ फिराते हुए ये उभार गिने और फुसफुसाया- सिक्स पैक्स ऐब।
फिर उसने अपनी झोली से आड़ी-तिरछी लकीरों वाली तस्वीर निकाली और जनता की आंखों के ठीक सामने लाकर पूछा-गौर से देखो, तुम्हें इसमें डिवाइन विजन दिखेगा। जनता एक टक निहार रही थी। चेले ने दोहराया-देखो-देखो, डिवाइन विजन दिखेगा।
जनता की मरीयल सी आवाज निकली-हां दिख रहा है, डेविल...महंगाई का डेविल। महंगाई...महंगाई...हाय महंगाई...।
जनता लगातार बुदबुदा रही थी। हाय महंगाई। चेले के हाथ ध्यान का सूत्र लग चुका था। वह सोच रहा था कि अब -हाय महंगाई- के इस मंत्र को पेटेंट कराएगा। पूरी दुनिया को सिखाएगा और अपने गुरु का भी गुरु बन जाएगा।


(यह लेख 29 नवंबर 2009 को हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के कलम में प्रकाशित हुआ)

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