ताऊ चुप सै तो के, उसका वोट तो बोलैगा

सुधीर राघव

हमारे सरोकार

देख रे भाई! वोटर ने तो मधानी घुमा दी। अब मक्खन का पेड़ा किसके हाथ आवैगा यो जानणा सै तो सब्र कर। चौपाल पर हुक्का गुडग़ुड़ाते ताऊ का हरियाणा चुनाव के बारे में यह एक लाइन का विश्लेषण है। लेकिन उसकी एक पंक्ति में छिपे भावार्थ काफी कुछ कहते हैं।
पिछले एक साल में बहुत कुछ बदला है। नई सदी के वोटर की नब्ज जानने में मीडिया के पसीने छूट जाते हैं। पिछले चुनाव के नतीजे गवाह हैं कि सारी आंकड़ेबाजी धरी रह गई। नब्बे के दशक में देश में मंडल-कमंडल की हवा बही और साथ ही बहा वोटर भी। देखते-देखते सेफोलोजिस्ट की सेना खड़ी हो गई। पत्रकार ज्योतिषियों से नजर आने लगे। चुनाव होने से पहले सबके पास भविष्यवाणी थी कि कौन सा दल कितनी सीटें ला रहा है। सबके पास थोड़े-बहुत अंतर से कमोबेश एक-जैसे आंकड़े होते थे और नतीजे आने पर दो-चार के अंतर से सभी की भविष्यवाणियां करीब-करीब सही निकलती थीं। हालत यह थी कि आम मतदाता भी पत्रकारों से पूछता कि किस दल की कितनी सीटें आ रही हैं और जवाब मिलने पर खुशी से ताली पीटता कि उसका भी अंदाजा यही है। हवा अपनी दिशा खुद बताती है। इसे बूझ लेने का भ्रम पाल कर एक आसान खुशी सबको मिल रही थी।
पर पानी जितना शांत होता है, उतना ही गहरा भी होता है। इसमें बहुत से अनुमान डूब जाते हैं। नई सदी का वोटर ऐसा ही शांत पानी है। देश को आठ फीसदी की ग्रोथ देने वाले नागरिक किसी हवा में बहक सकते हैं, ऐसा सोचने वाले भी दुस्साहसी हैं। वर्ष 2002 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने जब सारे पूर्वानुमान धराशायी करते हुए फीलगुड को फुस्स किया तो मीडिया के पंडितों की आंखें भी खुली की खुली रह गई थीं।
2009 में वोटर ने फिर चौंकाया। इसके बावजूद आंकड़ेबाजी जारी है। विधानसभा चुनाव में किस दल को कितनी सीटें मिल रही हैं, चुनाव पूर्व और मतदान के बाद, दोनों तरह के आंकड़े चैनलों पर चल चुके हैं। पहले अलग-अलग चैनलों में दो चार का अंतर होता था, अब हालत यह है कि एक ही चैनल के दो बार के आंकड़ों में दस-बीस का अंतर दिख रहा है। पहले जो किसी दल को 60 से 70 सीटें दे रहे थे, मतदान के बाद के विश्लेषण में 50 के करीब दे रहे हैं।
हरियाणा में इस बार पांच प्रमुख दल अलग-अलग ताल ठोक रहे हैं। इसलिए नतीजे आने के बाद का विश्लेषण भी तैयार हैं। एक चैनल का पत्रकार साथी सुझा रहा है, हारने वालों के लिए बिखरा विपक्ष सबसे बड़ा कारण बताया जा सकता है, जो जीतेगा वह सबसे बेहतर विकल्प कहलाएगा। इस विश्लेषण पर जब ताऊ की राय ली तो फिर वही जवाब था-बेटा सब्र कर।
संकेत साफ हैं, अब ताऊ नहीं उसका वोट ही बोलेगा। पत्रकार को वोटर की नब्ज जाननी है तो उसे भविष्यणियों का खेल छोड़कर लोगों के बीच निकलना होगा यह जानने के लिए कि कहां-कितना विकास हुआ है।

१४ अक्तूबर को दैनिक हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में प्रकाशित

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