डीएनए और सूक्ष्म शरीर की अवधारणा में समानताएं

वेदान्त का सूक्ष्म शरीर ही है डीएनए। मेरे पिछले लेख पर श्री शशि भूषण तामरे जी का सुझाव आया कि इस विषय पर और अध्ययन के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाना चाहिए। यह सही बात है, डीएन का अध्ययन करने के लिए आपके पास विस्तार से जानकारियां हैं, मगर जब आप सूक्ष्म शरीर की बात करते हैं आप को बहुत ही मिलीजुली जानकारियां मिलती हैं। जैसे कुछ पुराणों में इसे अंगूठे के आकार का बताया गया है। मुझे लगता है कि यह भ्रांति बाद में ही आई होगी, और इससे पैदा हुई होगी कि हमारे स्थूल शरीर के अंदर ही हमारे जैसा एक शरीर होता है। तब किसी लेखक ने इसकी सूक्ष्मता का आकलन अपने अंगूठे से किया हो। मगर वेदकालीन साहित्य में हमें परमाणु और अणु आकारों का जिक्र मिलता है। कहा जाता है कि जो कर्म हम करते हैं उन्हें हमारा सूक्ष्म शरीर साथ ढोता है और अगले जन्मों में अच्छे-बुरे कर्मों के नतीजे भोगता है। असल में यह बात भले ही थोड़ी बढ़ा-चढ़ाकर है मगर एक हद तक सही है। अब आप डीएनए को ही लीजिए। इनमें शुगर और फासफेट के बंध वाले प्रोटीन्स की एक लंबी शृंखला होती है, जिन्हें जीन कहा जाता है।
असल में इन्ही जीन्स में छुपी है पुनर्जन्म की अवधारणा। यही जीन हमारी अनुवांशिकी को ढोते हैं। इसे ही डार्विन ने अनुवांशिकता पर आधारित जीव विकास का सिद्धांत बनाया। हमारे पुराणों ने जिसे कथाशैली बनाकर पुनर्जन्म में निपटा दिया, ठीक उसीकी व्याख्या डार्विन ने जैव विकास के रूप में की। जीन सचमुच संस्कार ढोते हैं, इसमें कोई शक नहीं। साइंस साबित कर चुकी है। अब मनुष्य के डीएनए में ३३ हजार से ज्यादा जीन्स की शृंखला है। इनका क्रमिक विकास हुआ। आज साइंस डीएनए जांच से यह बताने में सक्षम है कि कौन किस कुनबे का है।
इसी तरह वेदांत का विवरण बताता है कि सूक्ष्म शरीर हमारे संस्कारों को ढोता है। हमारे कर्मों और जीन में सीधा संबंध है। विकासवाद को ही मानें तो भी। हमारी पूंछ इसीलिए गायब हुई, क्योंकि हमारे दैनिक कर्म में उसका सरोकार नहीं रहा था और वह बाधा बनी थी। इस तरह कई पीढि़यों तक यह संदेश जीन को मिलने के बाद ही पूंछ गायब हुई। इस तरह कहा जा सकता है कि डीएनए और सूक्ष्म शरीर की अवधारणा में काफी समानता है।

Comments

Anonymous said…
बहुत रोचक दिलचस्प पोस्ट विचारणीय है .
कपिल मुनि said…
भाई क्या कमाल की बात निकाल कर लाए हो। आदि शंकराचार्य जी सांख्य के पदार्थवाद से संघंर्ष करते करते सांसारिक दुनिया से ब्रह्मलीन हो कर चल दिए। आप ने उन की प्रस्थापनाओं को 296 और 397 शब्दों के आलेखों से मटियामेट कर दिया। सूक्ष्म शरीर पदार्थ नहीं है उस के अतिरिक्त कुछ अन्य है। जब कि डीएनए की संरचना प्रोटीन अणुओँ की श्रंखला से हुई है। इस तरह यह साबित हो गया कि सूक्ष्म शरीर भी पदार्थ ही है।
शंकराचार्य जी धराशाई हुए। आप को बहुत बहुत बधाई। नोबुल प्राइज के हकदार हो गए हैं आप।
सुधीर said…
भाई कपिलमुनि जी

किसी अवधारणा से कोई धाराशायी नहीं होता। धाराशायी होती हैं हमारी गलतफहमियां। शंकराचार्य जी का तो दर्शन ही नेति-नेति का है। उनका दर्शन इस आलेख से और दृढ़ होता है। शून्य में बिगबैंग की साइंस की अवधारणा इस नेति-नेति से अलग नहीं है। जहां तक सूक्ष्म शरीर की बात है तो उसकी अवधारणा तो शंकराचार्य जी से पहले के ग्रंथों में मौजूद है। उन्होंने अपने काल के लोगों के लिए इसकी व्यख्या की है। आगे लोगों ने इसे अपने आप से विस्तृत किया। पुराणों और धऱ्म ग्रंथों के नाम पर रोजगार के हिसाब से क्षेपक जोड़े गए। इस तरह सूक्ष्म शरीर के नाम पर अब तक खूब पाखंड होता है। पोंगा पंडितों का धंधा फलता है। हम लोगों की यही कमजोरी है कि हम बहुत जल्दी ही किसी के पुरस्कार योग्य होने और खराब होने की घोषणा कर देते हैं। इसी घोषणावाद ने शायद देश को पतन और अंधविश्वास की राह पर धकेला।
vijay mishra said…
jaankari hakikat me rochak hai sir ji...
rochak vichar-work. sawal uthta hai kya DNA karma ke anusar badalta bhi hai ya nahin. Abhi to DNA vagyanik bhagyavad ka pratik ban gaya hai. kya kaheng aap?
आमीन said…
बहुत दिन हो गए सर जी, कुछ लिख नही रहे आप

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