बिगबैंग का सिद्धान्त ऋग्वेद की देन

साइंस सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर सबसे प्रच्चलित मत बिग-बैंग थ्योरी है। यह सिद्धांत जॉर्ज लेमटायर बीसीवीं सदी के शुरू में लेकर आए। पहले इसे एक बड़ा मिथक माना गया, मगर हबल के गैलेक्सियों के सिद्धांत से इस दिशा में कुछ संकेत मिलने लगे। इस सिद्धान्त के अनुसार इस सृष्टि की उत्पत्ति ऊर्जा के एक स्रोत में महाविस्फोट के बाद हुई है और ब्रह्माण्ड तब से लगातार विस्तार कर रहा है। अब ऋग्वेद के ये श्लोक भी देखें-
असीदिदं तमोभूतमप्रग्यातमलक्षणम्। अप्रतर्क्यमविग्येयं प्रसुप्तमिव सर्वतः॥
यह सारा जगत सृष्टि से पहले अंधकार से आच्छादित था। उस समय इसमें जानने योग्य कुछ नहीं होता। इसी तरह अंत के पश्चात भी वैसा ही सुप्त होता है।

तम आसीत्तमसा गूढ़मग्रें प्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम। तुच्छ्येनाभ्वपिंहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकम्॥

यह सब जगत सृष्टि से पहले अन्धकार से आवृत, रात्रिरूप में जानने के अयोग्य आकाशरूप सब जगत तथा तुच्छ अर्थात अनन्त परमेश्वर के सम्मुख एकदेशी आच्छादित था। पश्चात परमेश्वर ने अपने सामर्थ्य से कारणरूप से कार्यरूप कर दिया।

इस तरह स्पष्ट है कि सृष्टि के निर्माण की साइंस की धाराणा और भारतीय दर्शन की धारणा में कितनी ज्यादा समानता है। अब भाषा और समय के अंतर को छोड़ दें तो वैदिक व्याख्या अधिक वैग्यानिक दिखती है। अगर यह मान लिया जाए कि आत्मा शब्द का मूल अर्थ वही है, जिसे अब ऊर्जा या एनर्जी कहा जाता है तो वैदिक दर्शन एक विग्यान नजर आता है। ऋग्वेद में आत्मा की परिभाषा देखें यही परिभाषा आगे गीता में भी रखी गई है-

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

यह आत्मा किसी काल में न तो जन्मता है और न मरता है। यह हमेशा साश्वत है। सिर्फ शरीर मरता है आत्मा नहीं।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्य 'नैनं छिदंति शस्त्राणी, नैनं दहति पावक। न चैनं क्लेदयां तापो, नैनं शोशयति मारूतः।।

आत्मा वो है जिसे किसी भी शस्त्र से भेदा नहीं जा सकता, जिसे कोई भी आग जला नहीं सकती, कोई भी दु:ख उसे तपा नहीं सकता और न ही कोई वायु उसे बहा सकती है।


अब ऊर्जा की परिभाषा देखते हैं-ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही उत्पन्न। सिर्फ एक ऊर्जा को दूसरी ऊर्जा में बदला जा सकता है।

जाहिर है आत्मा रूप बदलती है, यह दृष्टांत भी ऊर्जा के रूपांतरण से मिलता है। इस तरह वैदिक मान्यताओं का वैग्यानिक दृष्टिकोण से अध्ययन काफी ग्यानदायक है।

Comments

Dr. shyam gupta said…
सुधीर जी आपका कथन एकदम सत्य है--मैंने यह विषय पूर्ण-व्याख्या से 'science bloggers association" par apane लेख ’स्रिष्टि व जीवन..." में लि्खा है। मेरी पुस्तक" श्रिष्टि-ईषत इच्छा या बिग-बेन्ग, एक अनुत्तरित-उत्तर" एवम मेरे ब्लोग " vijaanaati-vijaanaati-science.blogspot.com पर भी वर्णित है।

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