पार्वती जी को पत्नी धर्म का उपदेश - यानी स्त्रियों की स्थिति का विवरण

शिव पुराण में आता है कि पार्वती जी की विदाई के समय माता मेना की इच्छा पर एक ब्राह्मण पत्नी ने पार्वती जी को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिया, जो इस प्रकार है-
पातिव्रत्य- धर्म में तत्पर रहने वाली स्त्री अपने प्रिय पति के भोजन कर लेने पर ही भोजन करे। शिवे। जब पति खड़ा हो, तब साध्वी स्त्री को भी खड़ी रहना चाहिए। शुद्ध बुद्धि वाली स्त्री पति के सोने पर ही सोये। वह छल कपट छोड़कर सदा उसके लिए हितकर कार्य करे। यदि पति किसी कार्य से परदेस में गया हो तो उन दिनों उसे कदापि शृंगार नहीं करना चाहिए। पतिव्रता कभी पति का नाम न ले। पति के कटुवचन कहने पर भी वह बदले में कड़ी बात न गहे. पति के बुलाने पर वह घर के सारे कार्य छोड़कर तुरंत उसके पास चली जाए और हाथ जोड़कर मस्तिष्क झुकाकर पूछे-नाथ. किसलिए इस दासी को बुलाया है? मुझे सेवा के लिए आदेश देकर अपनी कृपा से अनुग्रहित करें। फिर पति जो आदेश दे, उसका वह प्रसन्न हृदय से पालन करे। वह घर के दरवाजे पर देर तक खड़ी न रहे। दूसरे के घर न जाए। कोई गोपनीय बात जानकर हर एक को उसे न बताए। लोगों की भीड़ से भरी हुई सभा या मेले आदि उत्सवों को दूर से ही त्याग दे। जिस नारी को तीर्थयात्रा का फल पाने की इच्छा हो उसे पति का चरणोदक पीना चाहिए। उसके लिए उसी में सारे तीर्थ और क्षेत्र हैं, इसमें संशय नहीं।
पतिव्रता नारी पति के उच्छिष्ट अन्न आदि को परम प्रिय भोजन मानकर ग्रहण करे और पति जो कुछ दे, उसे महाप्रदास मानकर शिरोधार्य करे।
पति से द्वेष रखने वाली स्त्री का कभी आदर न करे। कहीं अकेल खड़ी न हो। कभी नंगी होकर न नहाये। मैथुनकाल के सिवा और किसी समय धृष्टता न करे। जिस-जिस वस्तु में पति की रुचि हो उससे वह प्रेम करे। पतिव्रता नारी के लिए पति ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव से अधिक माना गया है। उसके लिए अपना पति ही शिवरूप है। जो स्त्री पति के कुछ कहने पर क्रोधपूर्वक कठोर उत्तर देती है, वह गांव में कुतिया और निर्जन वन में सियारिन होती है। जो दुर्बुद्धि नारी अपने पति को त्यागकर एकान्त में विचरती है वह वृक्ष के खोखल में शयन करने वाली क्रूर उलूकी होती है। जो पर पुरुष को कटाक्षपूर्ण दृष्टि से देखती है वह ऐंचातानी देखनवाली होती हैं। पति को छोड़कर अकेले मिठाई खाती है वह गांव में सूअरी होती है। जो पति को तू कहकर बोलती है, वह गूंगी होती है। जो सौत से ईर्ष्या रखती है, वह दुर्भाग्यवती होती है। जो पति की आंख बचाकर दूसरे पुरुष पर दृष्टि डाले वह कानी, टेढ़े मुंहवाली तथा कुरूपा होती है। जो दुराचारिणी स्त्रियां अपना शील भंग कर देती हैं, वे अपने माता-पिता और पति तीनों कुलों को नीचे गिराती हैं और परलोक में दुख भोगती हैं।
यह वह पाठ है जो धर्म के नाम पर स्त्री के मायके से ससुराल विदा होने पर पढ़ाया जाता था। यह विचार ही समाज में मान्यता बनते चले गए। इसलिए कहा गया है कि सोच समझकर बोलो और लिखो तो उसे कई बार परख लो। कहीं आपका लिखा किसी दूसरे के लिए बेड़ियां न बन जाए।

Comments

रंजना said…
यह पहले भी सुना था,पर आपने जितने सुन्दर ढंग से इसे लिखा है,आपका आभार मानना ही पड़ेगा...

सच कहूँ....आज के दिन का यह सर्वश्रेष्ठ मनोरंजन रहा....हंसते हंसते बुरा हाल है...

वैसे कुछ बातें इसमें मानने लायक हैं,पर अधिकाँश ही हास्यास्पद हैं..
ACHEE PRASTUTI HAI .... PAR AAJ KE SAMAY ANUSAAR IT SAB BAATON MEIN PARIVARTAN KI GUNJAAISH HAI ....
virender rana said…
महिला के खिलाफ वैदिक-पौराणिक षडयंत्र का इससे अच्‍छा उदाहरण नहीं मिलेगा। इस षडयंत्र को धार्मिक आवरण चढा दिया गया है, ताकि महिला सवाल करने से ही संकोच करे। हां, कुछ बातों का पालन करने से वह गंभीर संकटों से बची रह सकती है। यह अच्‍छी बात है कि आज की भारतीय महिला इस षडयंत्र को धीरे-धीरे समझने लगी है।
Dr. shyam gupta said…
वैसे सभी पुरुष सोचें कि- सभी महिलायें ऐसा न करें तो पुरुषों व समाज़ का क्या होगा?

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