पुराणों की हिन्दू स्त्री

-सुधीर राघव
वेदों में भले ही कहा गया है-यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता। मगर पौराणिककाल में यह अवधारणा विकृत होती सी दिखती है। इस पर यह भी कहा जाता है कि वेद और १८ मूल पुराणों के रचेयता एक वेदव्यास ही थे। हालांकि इन्हें पढ़ने से ही विचारधारा का स्पष्ट अंतर दिखता है। तालिबान या अरब देशों की निंदा हम स्त्रियों के प्रति उनके कट्टर रवैये के चलते करते हैं। हाल ही में अफगानिस्तान ने यह कानून पास किया है कि अगर स्त्री अपने पति से सेक्स से मना करती है तो वह उसे खाना देने से इनकार कर सकता है। इसके अलावा व्यभिचार के मामलों में स्त्रियों को कठोर दंड का प्रावधान है। धर्म के नाम पर और भी कई वर्जनाएं स्त्रियों के लिए रखी गई हैं।
हमारे पुराण भी स्त्रियों के प्रति वेदों जैसे उदार नहीं है। इन्हें पढ़कर लगता है कि दुनिया में पहली शताब्दी के आसपास ऐसा दौर चला जिसमें स्त्रियों को सुनियोजित तरीके से गुलाम बनाने पर जोर दिया गया। ऐशिया और अरब देशों में ही नहीं अन्य सभ्यताओं तक में इसका असर देखने को मिलता है। हालांकि माना जाता है कि मानव समाज भी शुरू में मातृसत्तात्मक रहा होगा। पुराणों में स्त्री को ब्रह्महत्या के दोष से पीड़ित तक कहा गया है और यह दोष उसकी काम आतुरता की वजह से उसे मिला बताया जाता है-
प्रथमेअहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी। तृतीय रजकी ह्योता नरकागतमातरः॥४॥
(गरुडपुराण, छठा अध्याय)
राजस्वला स्त्री प्रथम दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन रजकी कहलाती है।
शश्वत्कामवरेणांहस्तुरीयं जगृहुः स्त्रिय। रजोरूपेण तास्वंहो मासि मासि प्रदृश्यते।।६।९।९
(श्रीमद्भागवत पुराण)
स्त्रियों ने यह वर पाकर कि वे सर्वदा पुरुष का सहवास कर सकें, ब्रह्महत्या का तीसरा चतुर्थांश स्वीकार किया। उनकी ब्रह्महत्या प्रत्येक महीने में रज के रूप में दिखाई पड़ती है।
इसी तरह गरुड पुराण में उन स्त्रियों को शाल्मली के नरक में जाने और वैतरणी में गिरने और शाल्मली के वृक्षों द्वारा काटे जाने का भय दिखाया गया है, जो पतिव्रता नहीं हैं।
भर्तारं दूषयेन्नारी परं मनसि धारयेत्। इत्याद्याः शाल्मलीवृक्षे बहुताडनम्।। ३०।।
(गरुडपुराण, चौथा अध्याय)
अर्थात जो स्त्री अपने पति को दोष लगाकर पर पुरष में आसक्त हनेवाली है-ये सभी और इस प्रकार के अन्य पापी भी शाल्मली वृक्ष द्वारा बहुत ताडना प्राप्त करते हैं।
इतना ही नहीं ऐसी स्त्रियों के अगले जन्म तक का हिसाब-किताब तक पुराणों में गढ़ा गया है।
श्वश्रोअपशब्ददा नारी नित्यं कलहकारिणी। स जलौका च यूका स्याद्भर्तारं भर्त्सते च या।।२६।।
स्वपतिं च परित्यज्य परपुंसानुवर्तिनी। वल्गुनी गृहगोधा स्याद द्विमखी वाअथ सर्पिणी।।२७।।
(गरुडपुराण, पांचवां अध्याय)
सास-श्वसुर को अपशब्द कहनेवाली स्त्री तथा नित्य कलह करने वाली स्त्री जल की जौंक होती है और पति की भर्त्सना करने वाली स्त्री जूं होती है। अपने पति का परत्याग कर पर पुरुष का सेवन करनेवाली स्त्री चमगीदड़ी, छिपकली अथवा दो मुंहवाली सर्पिणी होती है।
इसी तरह शिव पुराण के माहात्म्य में दुराचार में जीवन व्यतीत करने वाली चंचुला की कथा है। चंचुला कथावाचक ब्राह्मण से सुनती है कि जो स्त्रियां परपरुषों के साथ व्यभिचार करती हैं, वे मरने के बाद जब यमलोक में जाती हैं, तब यमराज के दूत उनकी योनि में तपे हुए लोहे की परिध डालते हैं। यह ऐसी कथा है जिसे सुनकर तालिबान के रोंगटे भी शायद खड़े हो जाएं। जो ऐसी स्त्रियों को सरेआम कोड़े मारने की और उन्हें पत्थरों से मार डालने की सजा देते हैं। पुराणकालीन स्त्री को जब हम देखते हैं तो हिन्दू और मुसलिम समाज में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं दिखता। पांचवी सदी में शुरू हुए धर्म में जो कट्टरता है, उसकी विरासत पौराणिक समाज में करीब-करीब वैसी ही दिखती है। इसलिए स्त्री की आजादी के लिए अभी बहुत काम बाकी है।

Comments

pata nahi puran aisa kyo maanate hai stri ko ........par mard ke baare me purano ka kya mat hai .......kya kisi din aapne blog par awashya bataaye ...mujhe intajar rahega
vijay mishra said…
bahut achcha sir ji mai chahata hu ki ye mahilayen avasya pade taki kuchh to adhunikta kam ho ...
वेद,पुराण,उपनिषद इत्यादि की समझ के लिए एक बहुत ही गहन दृ्ष्टि चाहिए। ओर आपके इस लेख को पढकर मुझे आपमें उस समझ की बहुत न्यूनता दिखलाई पड रही है।।
वैदिक साहित्य को समझने के लिए अभी आपको बहुत गहन चिन्तन मनन की आवश्यकता है। हो सकता है कि मेरा इस प्रकार आलोचना करना आपको बुरा लगे। किन्तु लेखक को सदैव आलोचना और प्रशंसा,दोनों को समभाव में ही लेना चाहिए।।
सुधीर said…
भाई वत्स जी

मुझे लगता है कि प्रत्यक्ष सच और झूठ को समझने की सामान्य बुद्धि ईश्वर हर इन्सान को देता है, उसने उच्च और न्यून समझ जैसा उतना भेद नहीं बनाया है, जितना की हमारी गुरुडम प्रथाओं ने लोगों को मानसिक गुलाम बनाने के लिए ऐसे विशेषण इजाद किए और प्रत्यक्ष झूठ को अपने या अपनी पीढ़ियों के हित साधने के लिए स्थापित करने की कोशिश की, इससे बड़ा और क्या प्रमाण हो सकता है कि तालिबान के ऐसे फरमान हमें निंदनीय लगते हैं और पुराणों के नहीं, यह लिखने का मेरा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि कट्टरपंथी सब धर्मों में एक जैसे रहे हैं, होते हैं और होते रहेंगे। ये न हिन्दू हैं न मुसलमान हैं और न किसी अन्य धर्म के अनुयायी ये सिर्फ धर्म के ठेकेदार होते हैं और समाज में मारकाट-अशांति गोधरा, मंदिर-मस्जिद, जिहाद और आतंकवाद को ही जन्म देते हैं। अगर आपको लगता है कि लादेन और साध्वी प्रग्या उच्च समझ के हैं तो ऐसी समझ से मानवता बचना ही चाहेगी-

मैं अपनी बात नहीं स्वामी दयानंद जी के सत्यार्थप्रकाशः के एकादशसमुल्लास से ये पंक्तियां दे रहा हूं-
उत्तर- जो अठारह पुराणों के कर्त्ता व्यास जी होते तो उनमें इतने गपोड़े न होते। क्योंकि शारीरिक सूत्र, योगशास्त्र के भाष्य आदि व्यासीक्त ग्रन्थों के देखने से विदित होता है कि व्यास जी बड़े विद्वान, सत्यवादी, धार्मिक योगी थे। वे ऐसी मिथ्या कथा कभी न लिखते। और इससे यह सिद्ध होता है कि जिन सम्प्रदायी परस्पर विरोधी लोगों ने ये नवीन कपोलकल्पित ग्रन्थ बनाए हैं उनमें व्यास जी के गुणों का लेश भी नहीं था। और वेदशास्त्र के विरुद्ध असत्यवाद लिखना व्यास जी सदृश विद्वानों का काम नहीं किन्तु यह काम विरोधी, स्वर्थी, अविद्वान लोगों का है। ...
(पृष्ठ २२५)

मैं अब भी यह नहीं कहूंगा कि क्या सच है और झूठ, असल में जो लिखा है उसे ही पुराणों से उद्धृत किया, सिर्फ इसिलए कि धर्मिक कट्टरता पूरी मानव जाति के लिए सही नहीं है, जो जातियां समुदाय कट्टर हुए उनका पतन हुआ। हमने भी पांच सौ साल की गुलामी भोगी है। आपकी टिप्पणी पढ़ कर अच्छा लगा। ऐसी खरी बात सचमुच बहुत ऊर्जा देती है। मैं और पढ़ते हुए अपनी समझ का विस्तार करने की कोशिश भी करूंगा। आपका धन्यवाद।
Ye to kam se kam panddrah sadi purani baat hai. ab to tamam striyan to aisi hain ki narak ke doot bhi panah mange. Yakin Na ho, to Rajneeti ki chand charchit naariyon par nazar daalen.
Dr. shyam gupta said…
वत्स जि ने सही कहा--प्रत्यक्ष झूठ व सच समझने की सामान्य बुद्धि हर इन्सान में नहीं होती ,अन्यथा विद्वानों व सामान्य व्यक्ति में क्या अन्तर ? क्यों कोई रामायण लिख पाता है कोई नही? क्यों कोई मालिक ,कोई गुलाम होता है? सब बुद्धि का ही कमाल तो होता है।

Popular posts from this blog

चौकीदार का स्विस एकाउंट

जब जब धर्म को ग्लानि होती है, मैं उसका उत्थान करने स्वयं आता हूं : ईश्वर

कहत कत परदेसी की बात- प्रसंग पहेली का हल