रूढ़ियों ने स्त्री से आजादी छीनी, लौटा रहा है बाजार

-सुधीर राघव
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हमारे सरोकार
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता। प्राचीन भारत में आर्य लोगों की जो पहचान स्त्रियों को आदर देने के लिए मिलती है, ऐसी विश्व के दूसरे समुदायों में नहीं दिखती। हमारे वेद और प्राचीन ग्रंथ बताते हैं कि आर्यों ने उस समय स्त्रियों का सम्पति का अधिकार मान्य किया था और उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता दी थी। यहां तक कि वे वर अपनी मर्जी से चुन सकती थीं। इसी प्रथा को स्वयंवर का नाम दिया गया। हालांकि रामायण और महाभारत काल में इस प्रथा में पिता की शर्तें भी जुड़ने लगी थीं। शायद इसका उद्देश्य एक निश्चित योग्यता निर्धारित करना था।
पूर्व मध्यकाल तक स्वयंवर के उल्लेख मिलते हैं। इनमें संयोगिता का स्वयंवर भी शामिल है। इसके बाद स्वयंवर की प्रथा लुप्तप्राय दिखती है। सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानन्द कहते हैं कि भारतवर्ष में जब तक स्वयंवर की प्रथा रही वह उन्नति करता रहा, जैसे ही यह खत्म हुई, हमारा पतन शुरू हो गया। इस तरह स्त्रियों की आजादी ही किसी समाज की खुशहाली तय करती है। रूढ़ियों ने उससे यह आजादी छीन ली और तलवार के जोर पर समाज पुरुष प्रधान हो गया।
अब यह प्रथा अचानक चर्चा में आई है, राखी सावंत के स्वयंवर के रूप में। पर यह स्वयंवर क्या अपने किसी सामाजिक सरोकार के लिए जाना जाएगा, या टीआरपी आधारित बाजार में निर्माताओं और कारोबार से जुड़े लोगों की विग्यापनी कमाई के लिए ही चर्चित रहेगा। राखी इस स्वयंवर से सचमुच अपने लिए वर चुनेंगी, इस पर भी कोई विश्वास करने को राजी नहीं था। देखने वाली बात यह भी थी कि शो के आयोजकों की कितनी चलती है, बाजार की कितनी चलती है और राखी की अपनी कितनी चलती है। स्वयंवर में सोलह दूल्हे आए। इनमें तेरह इलेमिनेट हुए और तीन फायनल राउंड तक पहुंचे। यह खिल्ली भी उड़ाई गई कि राखी तीनों वरों को चुन सकती है।
अंत भला तो सब भला। राखी ने यीशू की प्रार्थना कर इस स्वयंवर में अपने दूल्हे का फैसला किया। साथ ही पहले उन्होंने उनसे माफी मांगी, जिनका दिल उनके फैसले से टूटने वाला था। अंततः तो उन्होंने इलेश के गले में वरमाला डाल दी।
हरियाणा में जहां खापें शादियां तोड़ने के लिए चर्चित हो रही हैं, वहीं राखी स्वयंवर अपने पीछे संदेश छोड़कर जा रहा है कि अब बाजार स्त्री के साथ है। हमारी रूढ़ियों ने उससे जो आजादी छीनी, अब बाजार उसे लोटा रहा है। ग्याहरवीं सदी की संयोगिता के बाद इक्कसीवीं सदी के पहले दशक का राखी स्वयंवर भी लगता है याद किया जाता रहेगा।
(हिन्दुस्तान चंडीगढ़ के सोमवार के अंक में प्रकाशित)

Comments

नमश्कार !
अति उत्तम, आपने बहुत अच्छा लिखा है
बधाई हो ...
Nirmla Kapila said…
bahut baDiyaa aalekh hai sahee kahaa hai aabhaar
vijay mishra said…
sir ishase mahilaon ko kuchh sikhana chahiye sayad unki sonch me me kuchh parivartan ho jaye...

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