सांप की तरह अपने ही अंडे खा रही हैं खाप पंचायतें

सभी जीव अपनी संतती की रक्षा करते हैं और वृद्धि करते हैं। अपनी ही संतानों की हत्या के षड्यंत्र रचने के किस्से बहुत कम मिलते हैं। सौतेली संतानों के लिए ऐसा करने के बहुत उदाहरण होंगे। हां संतानों द्वारा बड़ों की हत्या कर सत्ता कब्जा लेने के भी बहुत उदाहरण हैं। जीव हमेशा अपनी वंश वृद्धि करते हैं और शत्रुओं का हनन करते हैं। हरियाणा की खाप पंचायतें जिनका मूल आधार ही गोत्र और वंश हैं, वे सांप की तरह अपने ही अंडे खा रहे हैं। ऐसे में कहां वे गोत्रों के विकास और रक्षा की बात कर रहे हैं। वह कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाकर ऐसा कर रही हैं।
इस संबंध में ग्रामीणों और संबंधित समुदायों को जागरूक करने के लिए क्या अभियान नहीं चलाया जाना चाहिए। यह सवाल मैंने हरियाणा के दो प्रमुख लोगों से पूछा, पहले थे अखिल भारतीय जाट महासभा के अध्यक्ष पवनजीत सिंह। वह झज्जर और सिंहवाल की घटना पर पहले तो सफाई देते से नजर आए। उनका कहना था कि पंचायतें ऐसा नहीं करती हैं, बात जब परंपराओं के खिलाफ जाती है तो लोग आवेश में आकर कदम उठाते हैं। वेदपाल की हत्या भी आवेश में की गई। जब उनसे यह पूछा गया कि जब पंचायतों की नाराजगी के बाद अपने ही गोत्र के बच्चे मारे जा रहे हैं तो क्या इस संबंध में पूरे प्रदेश में किसी अभियान की जरूरत महसूस नहीं हो रही है। ऐसे कौनसे कारक हैं जो ऐसे परिस्थितयां खड़ी कर रहे हैं और उनके समाधान के रास्ते निकाले जाने चाहिए। उनका कहना था कि हां अभियान की जरूरत हैं। हम लोग बैठकर विचार करेंगे।
यही सवाल आर्यसमाज के स्वामि अग्निवेश जी से किया गया तो उनका कहना था कि समाज दो जन्मना जातिवाद के खिलाफ दो सदी से मुहिम चलाए हुए है। अग्निवेश जी सुधारक और विचारक की छवि रखते हैं तथा मंदिरों के बहाने हो रहे अवैध कब्जों के खिलाफ मुहिम पर जोर देकर एक और अच्छी पहल की है। ऐसे में खाप-पंचायतों द्वारा कानून व्यवस्था के लिए खड़ी की जा रही समस्या के प्रति मुहिम खड़ी कर पाना खुद खाप से जुड़े लोगों द्वारा ही संभव है। अगर बाहरी लोग इस दिशा में कुछ करेंगे तो जाहिर है विवाद बढ़ेंगे, लेकिन समुदाय के पढ़े-लिखे लोगों को खापों की मनमानी के खिलाफ आगे आना चाहिए। अपने ही बच्चों को मार कर आप कोई भला संदेश नहीं दे रहे हैं, युवा खून विद्रोही होता है, पंचायतों पर हुक्का गुड़गुड़ाते बुढ़ाते लोग अगर समझते हैं कि उनके कठोर फैसले प्रेम विवाहों को रोक सकते हैं तो वे गलती पर हैं, ऐसे मामले और बढ़ेगे। समझदारी इसी में है कि बच्चों को सही संस्कार दें। डंडे के जोर पर काम करोगे तो तालिबान कहलाओगे या फिर जंगली। क्योंकि जंगल में ही लाठी अकल से बड़ी होती है।

-सुधीर राघव

Comments

अच्छा लिखा है...इस तरह की आवाज हरियाणा में हर ओर से उठनी चाहिए..तब शायद परिवर्तन की संभावना बने...कम से कम इन पंचायतों को यह एहसास तो दिलाएं कि आप कहां गलत हो...हां साथ ही साथ पंचायतें जो अच्छा काम कर रही हैं उसे भी सामने लाने की जरूरत है..क्योंकि जाति, गोत्र विवाद में फंसना पंचायतों का काला पक्ष है तो वहीं शादी-विवाह संबंधी कई फैसले उनका उजला पक्ष भी है...अफसोस तो यह यही पंचायतें एक जगह प्रोग्रेसिव होती हैं और दूसरी जगह बैकवार्ड (विध्वंसक)....
virender rana said…
खाप पंचायतें जाटों में सुनने को मिलती हैं, जिनमें कई सरकारात्‍मक कार्यों को अंजाम दिया जाता है। मगर कई बार सुनने पढने को मिल जाता है कि समाज सुधार के इस बेहद महत्‍वपूर्ण मंच पर सरेआम और बेहद निर्लजता से दुश्‍मनी भी निकाली जाती है। बरसों पुरानी दंपति (जिनकी शादी दो भिन्‍न गोत्रों में हुई होती है) को तुडवा दिया जाता है और लोगों को संताप झेलने के लिए छोड दिया जाता है। खाप पंचायतें उस समय कहां जाती हैं, जब शादी ब्‍याह होने लगते हैं। उस समय क्‍यों नहीं विरोध्‍ा किया जाता। क्‍यों लडके व लडकी और उनके घरवालों (यदि संभावित रिश्‍ता एक ही गोत्र में होने जा रहा है अथवा मान्‍यता के खिलाफ है) को कह दिया जाता है कि यह शादी नहीं होनी चाहिए। उसके पीछे ठोस तर्क भी दिए जाने चाहिए। बाद में दुख झेलना पड सकता है। ऐसा लगता है कि उस समय खाप अथवा गोत्र पंचायतें मामले में नहीं पडना चाहती अथवा उनसे सलाह मशविरा (जाति विशेष अथवा गांव के गणमान्‍य लोगों से) ही नहीं किया जाता। यदि दोनों बातें सही हैं तो इसका अंदाज लगाने में कोई दिक्‍कत नहीं होनी चाहिए कि खाप पंचायतों का भविष्‍य ज्‍यादा लंबा नहीं है। पहले बडे मामलों में बुजुर्गों, चौधरियों की सलाह ली जाती थी और मौजिज लोग अपने आप भी सलाह देने पहुंच जाते थे (उनके दिल बहुत विशाल होते थे, दयालु और विनम्र होते थे, उनके अहं बेकार की बातों में नहीं उलझे रहते थे,पर आन की बात पर खूंटा भी गाड देते थे)। मगर ऐसा लगता है कि समाज में बीमारी गंभीर रूप धारण कर गई है। वैसे बुर्जुर्ग भी नहीं रहे। आज आपरेशन (बहुत बाद में जब मरीज म्रत्‍यु के किनारे पहुच जाता है) खाप पंचायतें कर रही हैं, कल इन पंचायतों का आपरेशन लोग करने लगेंगे। दो दिन पहले मैं अखिल भारतीय जाटा महासभा के प्रधान पवन को आईबीएन 7 पर सुन रहा था। वह गलत बात को गलत नहीं कर रहा था और सही बात को दम ठोककर भी नहीं कर रहा था। बहुत घबराए हुए था। चैनल का एंकर आशुतोष भी आदत के अनुसार मामले को धकिया रहा था। वह बस टाइम पास कर रहा था। बीमारी की जड तक नहीं पहुंच रहा था। उसको जानकारी ही नहीं होगी। मैं इंतजार कर रहा था, परंतु निराशा ही हाथ लगी। सो बात की एक बात, नफरत और अहं के किले पर मजबूत इमारत ज्‍यादा देर तक नहीं टिकी रह सकती। खापों के नेताओं को भी सोचना चाहिए कि वे जो फैसले सुनाते हैं उनका आधार संकीर्णता न हो।
vijay mishra said…
sir mujhe lagata hai ki ye samsya hariyana hi nahi jaha bhi panchayat raj hai vahan hai... aur aapne ish baare me likha sayad ishe padkar kuchh sudhar ho...

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