Thursday, November 19, 2009

समझदारी के आगे नहीं टिकेगा स्वाइन फ्लू

सुधीर राघव
हमारे सरोकार
सर्दी बढऩे के साथ ही स्वाइन फ्लू के पॉजीटिव केस बढ़ रहे हैं। रोज दो-चार मामलों में पुष्टि हो जाती है। स्कूल और क्लासें बंद करने के लिए स्कूल प्रबंधन मजबूर है। चिंता की बात यह है कि असर बच्चों की पढ़ाई पर हो रहा है। यही वह समय है, जब सारा जोर स्लेबस पूरा कराने पर होता है। पिछला महीना तो त्योहार की छुट्टियों में कब निकला पता ही नहीं चला।
स्कूल प्रबंधन और अभिभावक सबसे ज्यादा चिंतित हैं। हल्के सर्दी-जुकाम के बाद ही बच्चे को वापस घर भेज दिया जाता है। माता-पिता के लिए यह परेशानी का सबब होगा ही। स्वाइन फ्लू पर नियंत्रण पाने का प्रशासन का अपना एजेंडा है। मैक्सिको से चलकर जिस तेजी से यह बीमारी भारत पहुंची है और अपने पांव पसार रही है, उसे हल्के में लिया भी नहीं जा सकता। वह भी तब जब 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू का उदाहरण इतिहास के पन्नों में मौजूद हो। समझा जाता है कि यह बीमारी भी सूअरों से ही इंसानों में फैली थी। इसका पहला केस भी अमेरिका में सामने आया और स्पेन से पहले आधे से ज्यादा यूरोप इसकी चपेट में था। फिर भी इसे स्पेनिश फ्लू नाम दिया गया। माना जाता है कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद सेना टुकडिय़ों की मोर्चों से वापसी के साथ यह और तेजी से फेला। पहला मामला मार्च 1918 में सामने आया था और आखिरी जून 1920 में। माना जाता है कि इस अवधि में पूरी दुनिया में ढाई करोड़ से ज्यादा लोगों की मौत इस संक्रमण से हुई। पूरी दुनिया में इसे ब्लैक डेथ के नाम से भी जाना गया। अकेले भारत में 1 करोड़ 70 लाख मौतों का अनुमान लगाया जाता है। कहा जाता है कि दुनिया कि एक तिहाई आबादी इस संक्रमण से प्रभावित हुई थी, और संक्रमित होने वालों में से 20 फीसदी काल का ग्रास बने थे।
यह उदाहरण भयभीत करने के लिए नहीं है। यह हाल तब का है, जब चिकित्सा विज्ञान आज के मुकाबले काफी पिछड़ा था। दूर-दराज के इलाके ही नहीं शहरों में भी पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। यह उदाहरण बताता है कि हम अपने चिकित्सकों पर भरोसा कर सकते हैं। स्वाइन फ्लू को विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही महामारी घोषित कर चुका है, हमें अपने चिकित्सकों का आभारी होना चाहिए जो लोगों की तमाम लापरवाहियों के बावजूद इस पर काबू पाने में जुटे हैं। लापरवाही, जो हमारे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर बरती गई। लोग अनजाने ही इसके कैरियर बनते चले गए। संक्रमण की गति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले दो महीने में ही 100 से ज्यादा पॉजीटिव मामले आ चुके हैं। इनमें करीब 20 चिकित्सक और चिकित्सा से जुड़े अन्य स्टाफ के लोगहैं। इन्हें मरीजों के उपचार के दौरान संक्रमण हुआ।
चंडीगढ़ स्वाइन फ्लू से हुई चार मौतों का गवाह भी है। इन सभी मामलों में रोग को शुरू में ही पहचानने में देर हुई।
स्वाइन फ्लू का संक्रमण लाइलाज नहीं है। समय पर इलाज शुरू कर इसे काबू किया जा सकता है। इससे भयभीत होने की जरूरत भी नहीं है। जरूरत सजगता की है। कोई भी वायरस ज्ञान-विज्ञान से सुसज्जित इन्सान के आगे ज्यादा दिन नहीं टिक सकता। इसके बावजूद यह सर्दियां हमें सावधानी से गुजारनी होंगी। हमारे पास एक विकसित मस्तिष्क है और एच1एन1 के पास यही नहीं है।
(19 नवंबर 2009 को हिन्दुस्तान के चंडीगढ़ संस्करण में प्रकाशित)

Tuesday, November 17, 2009

इस दीवार पर दीमक का असर नहीं

अहमदाबाद में धैर्यभरी एक और पारी से राहुल द्रविड़ ने यह जता दिया है कि यह दीवार दरकने वाली नहीं है। चयनकर्ता रूपी दीमक का इसपर कोई असर नहीं है। पिछले एक दिवसीय मैचों में जब उन्हें मौका दिया गया था, तब भी उन्होंने पिच पर टिक कर लड़खड़ाते हुए शर्मनाक हार की ओर बढ़ती टीम को काफी सम्मानजनक स्कोर तक पहुंचाया। इसके बावजूद उन्हें टीम में जगह नहीं दी गई। सोमवार को शतक बनने के बाद जो प्रतिक्रिया द्रविड़ की थी वह सचमुच सब्र के एक बांध के टूटने जैसी थी। महज ३२ रन पर देश के चार धुरंधर बल्लेबाज पवेलियन में बैठे धूल फांक रहे थे। क्रिकेट प्रेमी यह कायस लगा रहे थे कि क्या भारत आज मैच में १०० रन भी बना पाएगा या पारी पहले ही ढेर हो जाएगी। ऐसे में द्रविड़ ने युवराज के साथ मिलकर टीम को संभाला।
यह कोई पहला मौका नहीं है, जब द्रविड़ ने बड़े ही धीरज के साथ बल्लेबाजी करते हुए टीम को संकट से उबारा है। इसके बावजूद उन्हें कभी स्टॉर क्रिकेटर का रुतबा नहीं मिला। असल में वह एक असली खिलाड़ी है, जो खेल को खेल की तरह खेलता है। सफलता के शॉर्टकट उसे पसंद नहीं। जो क्रिकेट को एक खेल के रूप में पहचानते हैं वह द्रविड़ की कद्र भी जानते हैं। वर्ना लोगों का क्या है, वह तो पत्थर की प्रतिमा को भी भगवान की तरह पूज लेते हैं। उनके लिए सिर्फ हार जीत ही मायने रखती है। सफलता-असफलता खेल से बड़ी है। द्रविड़ बताते हैं कि नहीं खेल ही सबसे बड़ा है और उससे बड़ा है उसका कायदा। प्रतिद्वंद्वी की गेंद बनते सम्मान की हकदार है। किसी ऐंचकबेंचे शॉट से गेंद का फिल्डर के हॉथ से केच बचते-बचाते बाउंड्री पार कर जाने का नाम क्रिकेट नहीं है। हो सकता है ऐसे शॉट आपको जीत दिला दें मगर वे खेल के कायदे पर मातम करते जाते हैं। सच में द्रविड़ का मतलब मैदान में क्रिकेट होना है। मुझे लगता है कि अगर आप किसी क्रिकेटर पर यह भरोसा रख सकते हैं तो यकीन मानें यह सम्मान उसके लिए खेल जगत का सबसे बड़ा सम्मान है। द्रविड़ निस्संदेह इसके हकदार हैं।
sudhir Raghav

Saturday, October 24, 2009

एक गांव का नहीं, पूरे हरियाणे का चौधरी चाहिए

सुधीर राघव
हमारे सरोकार

बात वहीं से शुरू होती है, जहां छोड़ी गई थी। ताऊ का वोट बोला और खूब बोला। किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं। हरियाणा के मतदाता का संदेश साफ है। चौधर का सामंती दौर समापन पर है और लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। ये नतीजे उन लोगों के लिए भी सबक है, जो यह मान बैठे थे कि हरियाणा में विकास सिर्फ उसी क्षेत्र का होता है, जहां का मुख्यमंत्री होता है। सत्ता का उलझा गणित जनता की उस आवाज का भी प्रतीक है जो पूरे राज्य का विकास चाहती है। सिर्फ एक इलाके के दम पर पूरे राज्य का मुख्यमंत्री बनने का सपना आसानी से साकार कर लेना अब पुरानी बात हो चली है।
चुनाव से पहले कांग्रेस के जो नेता हवा में उड़ रहे थे, वह अब जमीन पर हैं। सत्ता के स्वर्ग में जो अपना सिंहासन पक्का मानकर चल रहे थे, उन्हें वोटर त्रिशंकु की तरह बीच में लटका देगा, ऐसी उम्मीद नहीं थी। इनेलो भले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी काफी दूर है, मगर उसकी झोली में इतने वोट तो बरस ही गए हैं कि सत्ता की सूखती बेल में देर सवेर अंकुर फूटने की आशा जाग उठी है। भाजपा और हजकां के बारे में विश्लेषक अब भी यही कहेंगे कि उन्हें किसी के साथ मिलकर ही चुनाव लडऩा चाहिए था। चौपाल पर हुक्का गुडग़ुड़ाते ताऊ का पोस्ट पोल विश्लेषण भी एक लाइन का ही है। हमने एक गांव का नहीं, पूरे हरियाणे का चौधरी चाहिए। अब यो चौधरी आपस में बैठकर फैसला कर लें।
दूसरी ओर वह चैनल वाले हैं, जो चुनाव से पहले कांग्रेस को 70 सीटें दे रहे थे और मतदान के बाद 50, उनका ताजा विश्लेषण फिर काफी लंबा-चौड़ा। उन्हें लगता है कि दर्शकों की यादाश्त काफी कमजोर होती है। इसलिए दावा करने से नहीं चूक रहे कि नतीजे ठीक वैसे हैं, जैसा कि उनके अनुमान लगाया था। लेकिन एक बात साफ है, मैदान में बहुत से दल होने का अर्थ हमेशा बिखरा विपक्ष नहीं होता, इसका अर्थ बहुत से विकल्प भी होता है। हरियाणा की जनता ने यही साबित किया है।

यह लेख 24 नवंबर 2009 को हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में प्रकाशित हुआ

Wednesday, October 14, 2009

ताऊ चुप सै तो के, उसका वोट तो बोलैगा

सुधीर राघव

हमारे सरोकार

देख रे भाई! वोटर ने तो मधानी घुमा दी। अब मक्खन का पेड़ा किसके हाथ आवैगा यो जानणा सै तो सब्र कर। चौपाल पर हुक्का गुडग़ुड़ाते ताऊ का हरियाणा चुनाव के बारे में यह एक लाइन का विश्लेषण है। लेकिन उसकी एक पंक्ति में छिपे भावार्थ काफी कुछ कहते हैं।
पिछले एक साल में बहुत कुछ बदला है। नई सदी के वोटर की नब्ज जानने में मीडिया के पसीने छूट जाते हैं। पिछले चुनाव के नतीजे गवाह हैं कि सारी आंकड़ेबाजी धरी रह गई। नब्बे के दशक में देश में मंडल-कमंडल की हवा बही और साथ ही बहा वोटर भी। देखते-देखते सेफोलोजिस्ट की सेना खड़ी हो गई। पत्रकार ज्योतिषियों से नजर आने लगे। चुनाव होने से पहले सबके पास भविष्यवाणी थी कि कौन सा दल कितनी सीटें ला रहा है। सबके पास थोड़े-बहुत अंतर से कमोबेश एक-जैसे आंकड़े होते थे और नतीजे आने पर दो-चार के अंतर से सभी की भविष्यवाणियां करीब-करीब सही निकलती थीं। हालत यह थी कि आम मतदाता भी पत्रकारों से पूछता कि किस दल की कितनी सीटें आ रही हैं और जवाब मिलने पर खुशी से ताली पीटता कि उसका भी अंदाजा यही है। हवा अपनी दिशा खुद बताती है। इसे बूझ लेने का भ्रम पाल कर एक आसान खुशी सबको मिल रही थी।
पर पानी जितना शांत होता है, उतना ही गहरा भी होता है। इसमें बहुत से अनुमान डूब जाते हैं। नई सदी का वोटर ऐसा ही शांत पानी है। देश को आठ फीसदी की ग्रोथ देने वाले नागरिक किसी हवा में बहक सकते हैं, ऐसा सोचने वाले भी दुस्साहसी हैं। वर्ष 2002 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने जब सारे पूर्वानुमान धराशायी करते हुए फीलगुड को फुस्स किया तो मीडिया के पंडितों की आंखें भी खुली की खुली रह गई थीं।
2009 में वोटर ने फिर चौंकाया। इसके बावजूद आंकड़ेबाजी जारी है। विधानसभा चुनाव में किस दल को कितनी सीटें मिल रही हैं, चुनाव पूर्व और मतदान के बाद, दोनों तरह के आंकड़े चैनलों पर चल चुके हैं। पहले अलग-अलग चैनलों में दो चार का अंतर होता था, अब हालत यह है कि एक ही चैनल के दो बार के आंकड़ों में दस-बीस का अंतर दिख रहा है। पहले जो किसी दल को 60 से 70 सीटें दे रहे थे, मतदान के बाद के विश्लेषण में 50 के करीब दे रहे हैं।
हरियाणा में इस बार पांच प्रमुख दल अलग-अलग ताल ठोक रहे हैं। इसलिए नतीजे आने के बाद का विश्लेषण भी तैयार हैं। एक चैनल का पत्रकार साथी सुझा रहा है, हारने वालों के लिए बिखरा विपक्ष सबसे बड़ा कारण बताया जा सकता है, जो जीतेगा वह सबसे बेहतर विकल्प कहलाएगा। इस विश्लेषण पर जब ताऊ की राय ली तो फिर वही जवाब था-बेटा सब्र कर।
संकेत साफ हैं, अब ताऊ नहीं उसका वोट ही बोलेगा। पत्रकार को वोटर की नब्ज जाननी है तो उसे भविष्यणियों का खेल छोड़कर लोगों के बीच निकलना होगा यह जानने के लिए कि कहां-कितना विकास हुआ है।

१४ अक्तूबर को दैनिक हिन्दुस्तान चंडीगढ़ में प्रकाशित

Tuesday, September 22, 2009

डीएनए और सूक्ष्म शरीर की अवधारणा में समानताएं

वेदान्त का सूक्ष्म शरीर ही है डीएनए। मेरे पिछले लेख पर श्री शशि भूषण तामरे जी का सुझाव आया कि इस विषय पर और अध्ययन के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाना चाहिए। यह सही बात है, डीएन का अध्ययन करने के लिए आपके पास विस्तार से जानकारियां हैं, मगर जब आप सूक्ष्म शरीर की बात करते हैं आप को बहुत ही मिलीजुली जानकारियां मिलती हैं। जैसे कुछ पुराणों में इसे अंगूठे के आकार का बताया गया है। मुझे लगता है कि यह भ्रांति बाद में ही आई होगी, और इससे पैदा हुई होगी कि हमारे स्थूल शरीर के अंदर ही हमारे जैसा एक शरीर होता है। तब किसी लेखक ने इसकी सूक्ष्मता का आकलन अपने अंगूठे से किया हो। मगर वेदकालीन साहित्य में हमें परमाणु और अणु आकारों का जिक्र मिलता है। कहा जाता है कि जो कर्म हम करते हैं उन्हें हमारा सूक्ष्म शरीर साथ ढोता है और अगले जन्मों में अच्छे-बुरे कर्मों के नतीजे भोगता है। असल में यह बात भले ही थोड़ी बढ़ा-चढ़ाकर है मगर एक हद तक सही है। अब आप डीएनए को ही लीजिए। इनमें शुगर और फासफेट के बंध वाले प्रोटीन्स की एक लंबी शृंखला होती है, जिन्हें जीन कहा जाता है।
असल में इन्ही जीन्स में छुपी है पुनर्जन्म की अवधारणा। यही जीन हमारी अनुवांशिकी को ढोते हैं। इसे ही डार्विन ने अनुवांशिकता पर आधारित जीव विकास का सिद्धांत बनाया। हमारे पुराणों ने जिसे कथाशैली बनाकर पुनर्जन्म में निपटा दिया, ठीक उसीकी व्याख्या डार्विन ने जैव विकास के रूप में की। जीन सचमुच संस्कार ढोते हैं, इसमें कोई शक नहीं। साइंस साबित कर चुकी है। अब मनुष्य के डीएनए में ३३ हजार से ज्यादा जीन्स की शृंखला है। इनका क्रमिक विकास हुआ। आज साइंस डीएनए जांच से यह बताने में सक्षम है कि कौन किस कुनबे का है।
इसी तरह वेदांत का विवरण बताता है कि सूक्ष्म शरीर हमारे संस्कारों को ढोता है। हमारे कर्मों और जीन में सीधा संबंध है। विकासवाद को ही मानें तो भी। हमारी पूंछ इसीलिए गायब हुई, क्योंकि हमारे दैनिक कर्म में उसका सरोकार नहीं रहा था और वह बाधा बनी थी। इस तरह कई पीढि़यों तक यह संदेश जीन को मिलने के बाद ही पूंछ गायब हुई। इस तरह कहा जा सकता है कि डीएनए और सूक्ष्म शरीर की अवधारणा में काफी समानता है।

Monday, September 21, 2009

वेदान्त का सूक्ष्म शरीर ही है डीएनए

वेदान्त दर्शन के मुताबिक तीन तरह के शरीर होते हैं- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। यह माना जाता है कि मृत्यु के समय सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर से निकलकर परलोक में अपने पाप-पुण्य का फल भोगता है। यह भी माना जाता है कि आत्मा इसी शरीर से आवृत्त रहती है। स्थूल शरीर पाँच तत्वों से बना होता है जो कि दिखाई देता है और सूक्ष्म शरीर तीन तत्वों से बना होता है जो दिखाई नहीं देता है। जीवात्मा का सूक्ष्म शरीर तीन तत्वों (1).मन (2).बुद्धि (3).अंहकार से बना होता है।


साइंस बताती है कि डीएनए में ही जीव का सूक्ष्मकोड होता है, जो तय करता है कि एक जीव कैसा होगा। शरीर की हर कोशिका के यह केंद्र में रहता है। अतः कहा जा सकता है कि शरीर इसी से मिलकर बना है। इस सूक्ष्म शरीर (डीएनए) का आकार २.२ नैनो मीटर से २.६ नैनोमीटर तक होता है। नैनो मीटर असल में एक मीटर का अरब वां हिस्सा है। सेंस और एंटीसेंस इसके दो मुख्य गुण हैं, जो इसे जीवन का आधार बनाते हैं। ये आरएनए की कॉपी से उत्पन्न होते हैं। शायद इसीको बुद्धि और अहंकार कहा गया होगा। सेंस ही बुद्धि है और एंटीसेंस यानी प्रतिक्रिया को अहंकार कहा जा सकता है। इसमें जीव के मैं भाव का बोध होता है। डीएनए आसानी से नष्ट भी नहीं होता। शायद इसी लिए यह अवधारणा बनी होगी कि यह सूक्ष्म शरीर आगे स्थूल को धारण करता है। यह अवधारणा इससे भी सिद्ध होती है कि मनुष्यों के डीएनए के जेनेटिकक्रम में ९९.९ तक की समानता होती है। व्यक्ति के दाह संस्कार के बाद भी उसकी बचने वाली हड्डियों और राख जिसे फूल कहा जाता है में यह मौजूद रहता है। इसलिए उसे सम्मान देने के लिए ही फूल चुनने की रस्म की जाती है।

Tuesday, September 15, 2009

बिगबैंग का सिद्धान्त ऋग्वेद की देन

साइंस सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर सबसे प्रच्चलित मत बिग-बैंग थ्योरी है। यह सिद्धांत जॉर्ज लेमटायर बीसीवीं सदी के शुरू में लेकर आए। पहले इसे एक बड़ा मिथक माना गया, मगर हबल के गैलेक्सियों के सिद्धांत से इस दिशा में कुछ संकेत मिलने लगे। इस सिद्धान्त के अनुसार इस सृष्टि की उत्पत्ति ऊर्जा के एक स्रोत में महाविस्फोट के बाद हुई है और ब्रह्माण्ड तब से लगातार विस्तार कर रहा है। अब ऋग्वेद के ये श्लोक भी देखें-
असीदिदं तमोभूतमप्रग्यातमलक्षणम्। अप्रतर्क्यमविग्येयं प्रसुप्तमिव सर्वतः॥
यह सारा जगत सृष्टि से पहले अंधकार से आच्छादित था। उस समय इसमें जानने योग्य कुछ नहीं होता। इसी तरह अंत के पश्चात भी वैसा ही सुप्त होता है।

तम आसीत्तमसा गूढ़मग्रें प्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम। तुच्छ्येनाभ्वपिंहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकम्॥

यह सब जगत सृष्टि से पहले अन्धकार से आवृत, रात्रिरूप में जानने के अयोग्य आकाशरूप सब जगत तथा तुच्छ अर्थात अनन्त परमेश्वर के सम्मुख एकदेशी आच्छादित था। पश्चात परमेश्वर ने अपने सामर्थ्य से कारणरूप से कार्यरूप कर दिया।

इस तरह स्पष्ट है कि सृष्टि के निर्माण की साइंस की धाराणा और भारतीय दर्शन की धारणा में कितनी ज्यादा समानता है। अब भाषा और समय के अंतर को छोड़ दें तो वैदिक व्याख्या अधिक वैग्यानिक दिखती है। अगर यह मान लिया जाए कि आत्मा शब्द का मूल अर्थ वही है, जिसे अब ऊर्जा या एनर्जी कहा जाता है तो वैदिक दर्शन एक विग्यान नजर आता है। ऋग्वेद में आत्मा की परिभाषा देखें यही परिभाषा आगे गीता में भी रखी गई है-

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

यह आत्मा किसी काल में न तो जन्मता है और न मरता है। यह हमेशा साश्वत है। सिर्फ शरीर मरता है आत्मा नहीं।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्य 'नैनं छिदंति शस्त्राणी, नैनं दहति पावक। न चैनं क्लेदयां तापो, नैनं शोशयति मारूतः।।

आत्मा वो है जिसे किसी भी शस्त्र से भेदा नहीं जा सकता, जिसे कोई भी आग जला नहीं सकती, कोई भी दु:ख उसे तपा नहीं सकता और न ही कोई वायु उसे बहा सकती है।


अब ऊर्जा की परिभाषा देखते हैं-ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही उत्पन्न। सिर्फ एक ऊर्जा को दूसरी ऊर्जा में बदला जा सकता है।

जाहिर है आत्मा रूप बदलती है, यह दृष्टांत भी ऊर्जा के रूपांतरण से मिलता है। इस तरह वैदिक मान्यताओं का वैग्यानिक दृष्टिकोण से अध्ययन काफी ग्यानदायक है।

Friday, September 11, 2009

स्त्री और मनुस्मृति

मनुस्मृति काल के समाज के बारे में जो कुछ उपलब्ध है, वह बताता है कि वह जाति और वर्ण में बंधे समाज में पुरुष से दोयम होती चली गई। कुछ श्लोक ऐसे भी हैं जिनमें उस शूद्र के साथ बराबरी पर रखते हुए, उस तरह के व्यवहार की बात कही गई है। हालांकि विद्या के मामले में जो श्लोक हैं, उन्हें कई इतिहासविद क्षेपक मानते हैं। इसके अलावा स्त्री के लिए यौन शुचिता का बोझ अलग से बांधा गया, जिसे ढोते-ढोते न जाने कितनी स्त्रियों ने अग्नी-परीक्षा दी। पत्नी का कब-कब त्याग कर पति दूसरी शादी कर सकता है, इससे संबंधित रोचक श्लोक मनुस्मृति में है-

बन्ध्याष्टमेsधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजाः। एकदशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी॥
अर्थात-स्त्री संतान उत्पति में सक्षम न हो तो उसे आठवें वर्ष में, संतान होकर मर जाए तो दसवें वर्ष में तथा कन्या ही कन्या पैदा करे तो ग्यारहवें वर्ष में तथा अप्रिय बोलने वाली को तत्काल छोड़ देना चाहिए।
हालांकि पुरुष को स्त्री भी छोड़ सकती है, मनुस्मृति में इसका भी उल्लेख है। मगर इसके लिए उसे लंबा इंतजार सुझाया गया है। वह केवल पति के दूर जाने पर ही ऐसा कर सकती है। इंतजार की अवधि भी पति के उद्देश्य के मुताबिक घटी बढ़ी है। यदि पति धर्म के लिए परदेश गया है तो आठ वर्ष तक, विद्या के लिए तो छह वर्ष तक और धन के लिए गया हो तो तीन वर्ष तक उसका इंतजार करे।
यौन शुचिता का बोझ उसकाल की स्त्री पर कितना ज्यादा डाला गया, यह हमें राजा के लिए दंड विधान तय करने वाले अध्याय में देख सकते हैं। पर पुरुष से संबंध वाली स्त्री को राजा क्या दंड दे-देखें-
भर्तारं लंड्घयेद्या स्त्री स्वग्यातिगुणदर्पिता। तां श्वाभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते॥
अर्थात- जो स्त्री अपनी जाति गुण के घमंड में पति को छोड़कर व्यभिचार करे उसको स्त्री-पुरुषों की भीड़ के सामने जीवित ही कुत्तों से कटवा कर राजा मरवा डाले।
हालांकि मनुजी ने पुरुषों के लिए भी व्यभिचार की कठोर सजा कही है। उन्हें लोह के लाल तपे पलंग पर सुलाकर भस्म करने की बात कही गई है।
जाहिर है कि इस तरह के दंड अगर दिए जाते रहे होंगे, तभी समाज में झूठ और प्रपंच पनपे होंगे। यह देखा गया है कि जिस समाज में दंड व्यवस्था जितनी ज्यादा कठोर होती है, उसमें झूठ का उतना ही बोलबाला होता है। कठोर दंड से बचने के लिए झूठ बोलने में ही भलाई समझी जाती है। यही वजह है कि तालिबानी समाज कभी बेहतर नहीं हो पाते और हमेशा उनकी निन्दा की जाती रही है। इसके विपरीत उदार समाज भले ही आलोचना का ज्यादा शिकार बनते हों मगर उनमें ही सबसे तीव्र विकास होता है। जब तक भारत का समाज उदार था उसने तरक्की की। इसी तरह अब नई पीढ़ी समाज को उदार बना रही हो तो समाज तरक्की कर रहा है। दूसरी ओर तालिबानी समाज पूरे विश्व की शांति और विकास के लिए खतरा बना हुआ है।

Friday, September 4, 2009

व्यास जी के नाम पर हुए हैं मान्यताओं के घोटाले

आर्थिक घोटालेबाजी भले आपको आज की पीढ़ी के नेताओं की करतूत लगती हो मगर समाज में लाभ उठाने के लिए घोटाले पहले भी होते रहे हैं। प्राचीन इतिहास के जिस सबसे बड़े घोटाले के सूत्र हाथ लगे हैं, वह है मान्यताओं का घोटाला। स्त्री-पुरुष और कर्मकांड के नाम पर कई रूढ़ियां व्यासजी का नाम लेकर मान्य बनाई गई हैं। कर्मकांडियों और पोंगापंथियों ने अपनी दुकानदारी जमाने के लिए बहुत कुछ लिखा और उसे व्यासजी का नाम दे दिया। महार्षि दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश के एकादशसमुल्लास में इसके लिए राजा भोज के ग्रंथ संजीवनी का हवाला देते हैं। वह लिखते हैं-
राजा भोज के राज्य में व्यास जी के नाम से मार्कण्डेय और शिवपुराण किसी ने बना कर खड़ा किया था। उसका समाचार राजा भोज को हने से उन पंडितों को हस्तच्छेदनादि का दंड दिया और उनसे कहा कि जो गई काव्यादि ग्रन्थ बनावे तो अपने नाम से बनावे, ऋषि-मुनियों के नाम से नहीं। यह बात राजा भोज के बनाए संजीवनी नामक इतिहास में लिखी है कि जो ग्वालियर के राज्य भिंड नामक नगर के तिवाड़ी ब्राह्मणों के घर में है। --- उसमें स्पष्ट लिखा है कि व्यासजी ने चार सहस्र चार सौ (४४००) और उनके शिष्यों ने पांच सहस्र छह सौ श्लोक युक्त अर्थात सब दस सहस्र (दस हजार) श्लोकों का प्रमाण भारत बनया था। वह महाराज विक्रमादित्य के समय में बीस सहस्र और मेरे पिताजी के समय में पच्चीस सहस्र और मेरी आधी उम्र तक तीस सहस्र श्लोकयुक्त महाभारत पुस्तक के रूप में मिलता है। जो ऐसे ही बढ़ता चला तो महाभारत की पुस्तक एक ऊंट का बोझा हो जाएगा और ऋषि-मुनियों के नाम से पुराणदि ग्रंथ बनावेंगे तो आर्यवर्तीय लोग भ्रमजाल में पड़के वैदिक धर्म विहीन होकर भ्रष्ट हो जाएंगे।
अतः पुराणों में वर्णित स्वर्ग-नर्क तत्कालीन किवदंतियों और कल्पना के सहारे रचे गए। यह भी संभव है कि इसमें कुछ सुने-सुनाए एतिहासिक तथ्य भी हों जिनका वर्णन अपने अनुसार किया गया। सवाल यह उठता है कि लेखकों ने इन ग्रंथों को अपना नाम क्यों नहीं दिया। दयानन्द कहते हैं कि संभवतः उन्हें डर था कि लोग उनके लिखे को मानेंगे नहीं। इसलिए व्यासजी के नाम पर लिखा जाए। इसका अलावा यह भी संभव है कि जाति-प्रथा बंधन कठोर होने की वजह से भी लेखक अपना नाम देने का साहस न कर पाये हों। पुराणों में वेदों की सूक्तियों का भी हवाला दिया गया है। शूद्र और स्त्री आदि के लिए वेद वर्जित होने की मान्यता उसकाल तक थी, इसलिए लेखकों को दंडित होने का भय भी हो सकता है। राजा भोज द्वारा कुछ लेखकों दंडित करने का जिक्र उनकी संजीवनी में भी आता है। इसलिए कहा जा सकता है कि धर्मग्रंथों में व्यासजी के नाम पर मान्यताओं का एक महाघोटाला है।

Tuesday, September 1, 2009

पार्वती जी को पत्नी धर्म का उपदेश - यानी स्त्रियों की स्थिति का विवरण

शिव पुराण में आता है कि पार्वती जी की विदाई के समय माता मेना की इच्छा पर एक ब्राह्मण पत्नी ने पार्वती जी को पतिव्रत धर्म का उपदेश दिया, जो इस प्रकार है-
पातिव्रत्य- धर्म में तत्पर रहने वाली स्त्री अपने प्रिय पति के भोजन कर लेने पर ही भोजन करे। शिवे। जब पति खड़ा हो, तब साध्वी स्त्री को भी खड़ी रहना चाहिए। शुद्ध बुद्धि वाली स्त्री पति के सोने पर ही सोये। वह छल कपट छोड़कर सदा उसके लिए हितकर कार्य करे। यदि पति किसी कार्य से परदेश में गया हो तो उन दिनों उसे कदापि शृंगार नहीं करना चाहिए। पतिव्रता कभी पति का नाम न ले। पति के कटुवचन कहने पर भी वह बदले में कड़ी बात न गहे. पति के बुलाने पर वह घर के सारे कार्य छोड़कर तुरंत उसके पास चली जाए और हाथ जोड़कर मस्तिष्क झुकाकर पूछे-नाथ. किसलिलए इस दासी को बुलाया है? मुझे सेवा के लिए आदेश देकर अपनी कृपा से अनुग्रहित करें। फिर पति जो आदेश दे, उसका वह प्रसन्न हृदय से पालन करे। वह घरके दरवाजे पर देर तक खड़ी न रहे। दूसरे के घर न जाए। कोई गोपनीय बात जानकर हर एक को उसे न बताए। लोगों की भीड़ से भरी हुई सभा या मेले आदि उत्सवों को दूर से ही त्याग दे। जिस नारी को तीर्थयात्रा का फल पाने की इच्छा हो उसे पति का चरणोदक पीना चाहिए। उसके लिए उसी में सारे तीर्थ और क्षेत्र हैं, इसमें संशय नहीं।
पतिव्रता नारी पति के उच्छिष्ट अन्न आदि को परम प्रिय भोजन मानकर ग्रहण करे और पति जो कुछ दे, उसे महाप्रदास मानकर शिरोधार्य करे।
पति से द्वेष रखने वाली स्त्री का काभी आदर न करे। कहीं अकेल खड़ी न हो। कभी नंगी होकर न नहाये। मैथुनकाल के सिवा और किसी समय धृष्टता न करे। जिस-जिस वस्तु में पति की रुचि हो उससे वह प्रेम करे। पतिव्रता नारी के लिए पति ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव से अधिक माना गया है। उसके लिए अपना पति ही शिवरूप है। जो स्त्री पति के कुछ कहने पर क्रोधपूर्वक कठोर उत्तर देती है, वह गांव में कुतिया और निर्जन वन में सियारिन होती है। जो दुर्बुद्धि नारी अपने पति को त्यागकर एकान्त में विचरती है वह वृक्ष के खोखल में शयन करने वाली क्रूर उलूकी होती है। जो पर पुरुष को कटाक्षपूर्ण दृष्टि से देखती है वह ऐंचातानी देखनवाली होती हैं। पति को छोड़कर अकेले मिठाई खाती है वह गांव में सूअरी होती है। जो पति को तू कहकर बोलती है, वह गूंगी होती है। जो सौत से ईर्ष्या रखती है, वह दुर्भाग्यवती होती है। जो पति की आंख बचाकर दूसरे पुरुष पर दृष्टि वह कानी, टेढ़े मुंहवाली तथा कुरूपा होती है। जो दुराचारिणी स्त्रियां अपना शील भंग कर देती हैं, वे अपने माता-पिता और पति तीनों कुलों को नीचे गिराती हैं और परलोक में दुख भोगती हैं।
यह वह पाठ है जो स्त्री के मायके से ससुराल विदा होने पर पढ़ाया जाता था। यह विचार ही समाज में मान्यता बनते चले गए। इसलिए कहा गया है कि सोच समझकर बोलो और लिखो तो उसे कई बार परख लो। कहीं आपका लिखा किसी दूसरे के लिए बेड़ियां न बन जाए।

Friday, August 28, 2009

आज की स्त्री

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं समाज में चार तरह की गुलामी होती है। बल की गुलामी, यह जंगल की रीत है, जिसके पास बल है उसकी इच्छा का अन्य सम्मान करते हैं। उसके अनुसार चलते हैं। धन की गुलामी-यह मनुष्यों ने पैदा की है। धन और निर्वाह के लिए लोग दूसरे की इच्छा के अनुसार चलते हैं। तीसरी है मन की गुलामी- यह कुछ लोग अपने वाकचातुर्य से पैदा करते हैं। यह गुलामी सबसे ज्यादा खतरनाक है। मानसिक गुलामी पूरे समाज को सभी तरह की गुलामियों में धकेल देती है। इस तरह के वाकचातुर्य से भरे लोग सबसे निक्रिष्ट कोटी के होते हैं। वे अपनी जानकारियों के आधार पर अन्य से कहते हैं कि मैं तुम से अधिक जानकार हूं इसलिए है भेड़ बकरियो आओ और मेरी पूजा करो। चरण वंदना करो। मैं तुमसे अधिक श्रेष्ठ हूं।

हमारे ही नहीं हर पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों की इसी तरह गुलाम बनाया गया। माता का कुल, पिता का कुल और पति का कुल तीनों को तारने के लिए खुद को पति के साथ जिन्दा चिता में जलने के लिए उसे प्रेरित किया गया। गरुड़ पुराण कहता है- (दसवें अध्याय से श्लोक संख्या ३५-५३ तक से)

पतिव्रता नारी यदि उसके साथ परलोकगमन करना चाहे तो स्नान करे अपने शरीर को कुमकुम, अंजन, सुन्दर, वस्त्राभूषणादि से अलंकृत करे, ब्राह्मण और बन्धु बान्धवों को दान दे। ------तब वहां सूर्य को नमस्कार करके चिता की परिक्रमा करके पुष्पशय्यारूपी चिता पर चढ़े और अपने पति को अपनी गोद में लिटाए? तदनन्तर सखियों को श्रीफल देकर दाह की आज्ञा प्रदान करे और शरीरदाह को गंगाजल में स्नान के समान मानकर अपना शरीर जलाए (गंड़्गास्नानसमं ज्ञात्वा शरीरं परिदाहयेत्॥४०॥)
गर्भिणी स्त्री को पति के साथ अपना दाह नहीं करना चाहिए। प्रसव और बालक के पालन-पोषण करने के बाद उसे सती होना चाहिए। यदि स्त्री अपने मृत पति के शरीर को लेकर अपने शरीर का दाह करती है तो उसके शरीर मात्र को जलाते हैं, उसकी आत्मा को कोई पीड़ा नहीं होती। धौंके जाते हुए धातुओं का मल जैसे अग्नि में जल जाता है, उसी प्रकार नारी अमृत के समान अग्नि में अपने पापों को जला देती है। चितापर पति के शरीर के साथ संयुक्त वह नारी कभी नहीं जलती, प्रत्युत उसकी अन्तरात्मा मृत व्यक्ति की अन्तरआत्मा के साथ एकत्व कर लेती है।

यावच्चाग्नौ मृते पत्यौ स्त्री नात्मानं प्रदाहयेत्। तावन्न मुच्यते सा हि स्त्री शरीरात्कथञ्चन॥४६॥ पति की मृत्यु होने पर जब तक स्त्री उसके शरीर के साथ अपने शरीर को नहीं जला लेती, तब तक वह किसी प्रकार भी स्त्री शरीर प्राप्त करने से मुक्त नहीं होती।
---पति के मरने के बाद जो स्त्री अग्नि में आरोहण करती है, वह अरुन्धती (महर्षि वसिष्ठ की पत्नी) के समान होकर स्वर्गलोक में सम्मानित होती है। वहां वह पतिपरायाणा अप्सरागणों के द्वारा स्तूयमान होकर चौदह इन्द्रोंके राज्यकालपर्यन्त अपने पति के साथ स्वर्गलोक में रमण करती है।
मातृकं पैतृकं चैव यत्र सा च प्रदीयते। कुलत्रयं पुनात्यत्र भर्तारं या अनुगच्छति॥५०॥ जो सती अपने भर्ता का अनुगमन करती है वह अपने मातृकुल, पितृकुल और पतिकुल, इन तीनों कुलों को पवित्र कर देती है।

मनुष्य के शरीर में तीन करोड़ रोमकूप हैं, उतने काल वह नारी अपने पति के साथ स्वर्ग में आनन्द करती है। जब तक सूर्य और चंद्र की स्थिति रहती है तबतक पतिलोक में निवास करती है। इस प्रकार दीर्घ आयु प्राप्त करके पवित्र कुल में पैदा होकर पतिरूप में वह पतिव्रता नारी उसी पति को पुनः प्राप्त करती है।

या क्षणं दाहदुःखेत सुखमेतादृश्यं त्यजेत्। सा मूढ़ा जन्मपर्यन्त दह्यते विरहाग्निना॥५४॥ अर्थात जो स्त्री क्षणमात्र के दाह दुख के कारण उस प्रकार के सुखों को छोड़ देती है, वह मूर्खा (सा मूढ़ा) जन्मपर्यन्त विरहाग्नि में जलती रहती है।

इस तरह गरुड़ पुराण में सती होना य न होना उसकी इच्छा पर छोड़ा गया, मगर सति न होने वाली को सा मूढ़ा कहा गया। जाहिर है एक सदी पहले तक हमारे देश में सती प्रथा जोरों पर थी। विधवाओं की स्थिती दयनीय तो अब भी कई जगह दिख जाएगी। राजा राममोहन राय को इसके खिलाफ लंबा संघर्ष करना पड़ा। मानसिक गुलामी की जंजीरे इतनी मजबूत हैं कि अपने निर्णय लेती स्वतंत्र स्थिती हमें आज भी नहीं सुहाती। सच है मानसिक गुलामी तोड़ने में सदियां भी कम पड़ती है। यह मानव जाति के लिए श्राप है। इस प्रेत से मुक्ति आसान नहीं है यह रह रहकर समाज के आगे खड़ा होता रहा है, किसी सदी में पंडों के भेष में तो कभी तालिबान बनकर। कभी इसने सुकरात को विष दिया तो कभी गैलेलियो के सच को सजा के भय से झुकाना चाहा। पर सच निकल कर सामने आता है। यह प्रेत हमेशा हारा है। आज की स्त्री भी इसे ही साबित कर रही है।

Thursday, August 27, 2009

भस्मासुर की कथा

यह कथा एक लोकतांत्रिक देश की है। इसमें जनता ही महान ओघड़दानी शिव समान है। इस शिव की उपासना एक राजनीतिक दल ने वर्षों की। उसे वरदान मिला और दो सीटों से सत्ता तक पहुंचा। जनता का वरदान पाकर यह दल जनता की ओर ही दौड़ा। समाज में खूब मारकाट मची दंगे होने लगे। मंदिर-मस्जिद प्रेम-सौहार्द बढ़ाने की जगह लोगों में दंगे करवाने और नफरत फैलाने के लिए इस्तेमाल किए जाने लगे। पड़ोसी देशों ने घुसपैठ शुरू की। अपनी ही धरती पर देश को अपने वीर गंवाने पड़े। रक्षा विशेषग्य सलाह देते रह गए कि अगर हम सीमा पार कर व्यूह रचना करें तो अपने जवानों की जान बच सकती है, मगर ऐसा नहीं किया गया। बड़ी संख्या में वीर गंवाए गए। फिर ताबूतों में दुकानदारी हुई। कमीशन उड़ा। अतः जनता पीछा छुड़ाकर दौड़ी। पर दल जनता के पीछे फीलगुड करता दौड़ता रहा। उन्हें बताता रहा कि दूसरे सांप्रदाय कि उठने वाली उंगली वह काट सकता है। जनता अपनी अंगुलियां बचाने के लिए दूर दौड़ी। पर दल पीछा छोड़ने को राजी नहीं हुआ। बोला आईएम इन वेटिंग। मैं इंतजार कर रहा हूं। मेरे पास आओ जनता। जनता हांफ कर रुकी और दल से कहा तुम तो महान हो, तुम तो चरित्रवान हो, तुम तो दूसरों से अलग हो, पर कुछ नाचकर तो दिखाओ। वह नाचने लगा, नाच कभी जिन्न की समाधी के चारों और तो कभी महात्मा के सम्मान को रौंदते हुए। नाचते-नाचते उसका अपना ही हाथ अपने सिर पर पड़ा, अपना ही सिर घूम गया। दल दलदल होकर गिरने लगा। अपने ही अंगों को काटकर फेंकने लगा। सब अंग-एक दूसरे को गरियाने लगे। तब मोहनीरूप धारण कर दूसरे दल ने बैठे-बिठाये इसका लाभ उठाया। पर जनता जनार्दन की सुनने वाला कोई नहीं। वह अब भी महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान है। कालाबाजारी ने निवाले तक को नजर लगा रखी है। भस्मासुर के अवसान की कथा से कोई सबक लेने वाला नहीं दिख रहा।

Wednesday, August 26, 2009

वैदिक काल की स्त्री - स्वतंत्र और पूजनीय

-सुधीर राघव

पुराणों में स्त्री को लेकर जो मानसिकता दिखती है, वेद उसकी तुलना में ही नहीं आज की तुलना में भी अधिक उदार और सभ्य समाज का दृष्टिकोण लिए हुए हैं। पौराणिक काल की स्त्री जहां नर्क का द्वार जैसी बताई गई है, वहीं वेदों में ऐसा नहीं है। समाज का दुर्भाग्य यह रहा कि पौराणिक समाज सदियों से हिन्दू मानसिकता पर छाया है, जबकि वैदिक विचार पीछे छूटते गए। पौराणिक युग में कट्टरता बढ़ने के साथ यह तक कह दिया गया-स्त्रीशूद्रौ नाधीयातामिति श्रुतेः। अर्थात स्त्री और शूद्र वेद न पढ़े।

इसके विपरीत अथर्वेद में लिखा है-ब्रह्मचर्य्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्॥ यह श्लोक कन्या और युवक दोनों के लिए है कि वे ब्रह्मचर्य सेवन से पूर्ण विद्या और सुशिक्षा के बाद विवाह करें। यहां स्त्री पुरुष में कोई भेद नहीं है। इसके अलावा वेदों में यग्य के कई मंत्रों के लिए लिखा गया है कि इमं मन्त्रं पत्नी पठेत। अतः कहा जा सकता है कि जबतक हमने स्त्रियों को पढ़ने की आज़ादी दी देश विकास करता रहा। जैसे ही यवनों आदि के चलते हमने स्त्री को चारदीवारी में कैद किया और उसकी पढ़ाई तक रोकी समाज पतित होते हुए गुलामी की जंजीरों तक पहुंच गया। स्त्री के सतीत्व रक्षा का तथाकथित बोझ पूरे समाज को भारी पड़ा। अब जब २० वी सदी में स्त्रियों की पढ़ाई की व्यवस्था हुई तो इक्कीस वीं सदी में भारत ने फिर चौंकाने वाले तरक्की की है। अगर कट्टरपंथी हावी न हुए तो तरक्की का यह सफर जारी रहने वाला है। पौराणिक स्त्री को जहां परपुरुष के विचार मात्र से पतित बताया गया और विधवा के लिए तो समाज और भी कठोर था, मगर ऋग्वेद का यह मंत्र आंखें खोलने वाला है-
इमां त्विमंन्द्र मोढूवः सुपुत्रां सुभगौ कृणु। दशांस्यां पुत्रानाधेंहि पतिंमेकादशं कृंधि॥
अर्थात-हे वीर्य सेचन में समर्थ ऐश्वर्युक्त पुरुष, तू इस विवाहित या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठपुत्र और और सौभाग्ययुक्त कर। हे स्त्री, तू भी दस सन्तान उत्पन्न कर और ११वां पति को समझ।
इतना ही नहीं पुराणों में जिसे व्यभिचार कह कर स्त्रियों को गुलामी में धकेला गया है, वहीं वेद में पुरुष के संतान देने में सक्षम न होने पर नियोग की बात भी स्त्रियों के लिए कही गई है। वह भी ११ अलग-अलग पुरुषों से भी नियोग कर संताने उत्पन्न कर सकती है। देखें ऋग्वेद का यह मंत्र -
सोमः प्रथमो विंविदे गन्धर्वो विंविद उर्त्तरः।
तृतीयों अग्निष्टे पतिंस्तुरीयस्ते मनुष्यजा॥

हे स्त्री, जो तेरा पहला पति है वह सोम है, जो दूसरा है वह गन्धर्व है, जो तीसरा है वह अग्नि है, इस तरह चौथे से ११वें तक हैं वे सभी मुनुष्य हैं।
अतः स्पष्ट है कि उस समाज में सिर्फ यौन सुचिता ही चरित्र का पैमाना नहीं थी। स्त्रियां और पुरुष अधिक स्वतंत्र थे और अपनी आवश्यकता के अनुसार विवाह कर सकते थे। विधवाओं के लिए भी वर्जनाएं नहीं थी। लेकिन बाद का समाज कट्टर होता गया। इसकी वजह रही होंगी, वर्ना गुलाम कौन होना चाहता है। स्त्रियों ने धीरे-धीरे गुलामीभरे माहोल को कैसे स्वीकार कर लिया, यह अलग शोध का विषय है।

Tuesday, August 25, 2009

पुराणों की हिन्दू स्त्री

-सुधीर राघव
वेदों में भले ही कहा गया है-यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता। मगर पौराणिककाल में यह अवधारणा विकृत होती सी दिखती है। इस पर यह भी कहा जाता है कि वेद और १८ मूल पुराणों के रचेयता एक वेदव्यास ही थे। हालांकि इन्हें पढ़ने से ही विचारधारा का स्पष्ट अंतर दिखता है। तालिबान या अरब देशों की निंदा हम स्त्रियों के प्रति उनके कट्टर रवैये के चलते करते हैं। हाल ही में अफगानिस्तान ने यह कानून पास किया है कि अगर स्त्री अपने पति से सेक्स से मना करती है तो वह उसे खाना देने से इनकार कर सकता है। इसके अलावा व्यभिचार के मामलों में स्त्रियों को कठोर दंड का प्रावधान है। धर्म के नाम पर और भी कई वर्जनाएं स्त्रियों के लिए रखी गई हैं।
हमारे पुराण भी स्त्रियों के प्रति वेदों जैसे उदार नहीं है। इन्हें पढ़कर लगता है कि दुनिया में पहली शताब्दी के आसपास ऐसा दौर चला जिसमें स्त्रियों को सुनियोजित तरीके से गुलाम बनाने पर जोर दिया गया। ऐशिया और अरब देशों में ही नहीं अन्य सभ्यताओं तक में इसका असर देखने को मिलता है। हालांकि माना जाता है कि मानव समाज भी शुरू में मातृसत्तात्मक रहा होगा। पुराणों में स्त्री को ब्रह्महत्या के दोष से पीड़ित तक कहा गया है और यह दोष उसकी काम आतुरता की वजह से उसे मिला बताया जाता है-
प्रथमेअहनि चाण्डाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी। तृतीय रजकी ह्योता नरकागतमातरः॥४॥
(गरुडपुराण, छठा अध्याय)
राजस्वला स्त्री प्रथम दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन रजकी कहलाती है।
शश्वत्कामवरेणांहस्तुरीयं जगृहुः स्त्रिय। रजोरूपेण तास्वंहो मासि मासि प्रदृश्यते।।६।९।९
(श्रीमद्भागवत पुराण)
स्त्रियों ने यह वर पाकर कि वे सर्वदा पुरुष का सहवास कर सकें, ब्रह्महत्या का तीसरा चतुर्थांश स्वीकार किया। उनकी ब्रह्महत्या प्रत्येक महीने में रज के रूप में दिखाई पड़ती है।
इसी तरह गरुड पुराण में उन स्त्रियों को शाल्मली के नरक में जाने और वैतरणी में गिरने और शाल्मली के वृक्षों द्वारा काटे जाने का भय दिखाया गया है, जो पतिव्रता नहीं हैं।
भर्तारं दूषयेन्नारी परं मनसि धारयेत्। इत्याद्याः शाल्मलीवृक्षे बहुताडनम्।। ३०।।
(गरुडपुराण, चौथा अध्याय)
अर्थात जो स्त्री अपने पति को दोष लगाकर पर पुरष में आसक्त हनेवाली है-ये सभी और इस प्रकार के अन्य पापी भी शाल्मली वृक्ष द्वारा बहुत ताडना प्राप्त करते हैं।
इतना ही नहीं ऐसी स्त्रियों के अगले जन्म तक का हिसाब-किताब तक पुराणों में गढ़ा गया है।
श्वश्रोअपशब्ददा नारी नित्यं कलहकारिणी। स जलौका च यूका स्याद्भर्तारं भर्त्सते च या।।२६।।
स्वपतिं च परित्यज्य परपुंसानुवर्तिनी। वल्गुनी गृहगोधा स्याद द्विमखी वाअथ सर्पिणी।।२७।।
(गरुडपुराण, पांचवां अध्याय)
सास-श्वसुर को अपशब्द कहनेवाली स्त्री तथा नित्य कलह करने वाली स्त्री जल की जौंक होती है और पति की भर्त्सना करने वाली स्त्री जूं होती है। अपने पति का परत्याग कर पर पुरुष का सेवन करनेवाली स्त्री चमगीदड़ी, छिपकली अथवा दो मुंहवाली सर्पिणी होती है।
इसी तरह शिव पुराण के माहात्म्य में दुराचार में जीवन व्यतीत करने वाली चंचुला की कथा है। चंचुला कथावाचक ब्राह्मण से सुनती है कि जो स्त्रियां परपरुषों के साथ व्यभिचार करती हैं, वे मरने के बाद जब यमलोक में जाती हैं, तब यमराज के दूत उनकी योनि में तपे हुए लोहे की परिध डालते हैं। यह ऐसी कथा है जिसे सुनकर तालिबान के रोंगटे भी शायद खड़े हो जाएं। जो ऐसी स्त्रियों को सरेआम कोड़े मारने की और उन्हें पत्थरों से मार डालने की सजा देते हैं। पुराणकालीन स्त्री को जब हम देखते हैं तो हिन्दू और मुसलिम समाज में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं दिखता। पांचवी सदी में शुरू हुए धर्म में जो कट्टरता है, उसकी विरासत पौराणिक समाज में करीब-करीब वैसी ही दिखती है। इसलिए स्त्री की आजादी के लिए अभी बहुत काम बाकी है।

Monday, August 24, 2009

नेता कितने झूठे होते हैं

समाज को दिशा देने का ठेका लेकर चलने वाले नेता कितने झूठे और मतलबपरस्त होते हैं, यह सब धीरे-धीरे सामने आ रहा है। इसलिए कहा जाता है कि वक्त से कुछ छिपा नहीं रहता। अपने लालकृष्ण आडवाणी जी को ही लीजिए। उनके कई चेहरे हम जानते हैं। सत्तर-अस्सी के दशक का कोई बहुत बड़े जनाधारवाला चेहरा नहीं। अस्सी के दशक के अंत में और नब्बे के दशक में यही चेहरा राम मंदिर निर्माण का बीड़ा उठाए रथ पर सवार, धारा ३७० के खिलाफ ठेठ राष्ट्रवादी हिन्दू चेहरा बन कर बड़ा होता गया। राम मंदिर के लिए गांव-गांव शिलापूजन हुए। लोगों ने आडवाणी के एक आह्वान पर अपनी जान की परवाह नहीं की। यह आमधारणा थी कि जिस दिन देश में भाजपा की सरकार होगी कश्मीर समस्या खत्म हो जाएगी, राम मंदिर ही नहीं मथुरा काशी के मंदिर भी बन जाएंगे, आडवाणी गृहमंत्री होंगे तो दूसरे ही दिन लाहोर में भारतीय सेना होगी। आखिर नब्बे के उत्तरार्ध में भाजपा सरकार बनाने में सफल हुई। आडवाणी गृहमंत्री भी बने पर कश्मीर समस्या नहीं सुलझी, बल्की शर्मनाक कंधार कांड हुआ। आतंकवदियों को छोड़ने के लिए लोहपुरुष की सरकार मजबूर हुई। हो सकता है मौजूदा परिस्थितियों के तहत यह सबसे अच्छा विकल्प रहा हो लेकिन गलती यह है कि राष्ट्र को गुमराह किया गया। आडवाणी ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा कि कंधार के आतंकवादी छोड़े जाने की उन्हें सूचना नहीं दी गई। उनका यह सच ठीक वैसा ही था, जैसा बाबरी मस्जिद ढाहे जाने के बाद उन्होंने कोर्ट में कहा कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था। इसी तरह संसद में पैसे उछालकर लोकतंत्र को बदनाम किया गया मगर यह कभी साबित नहीं हुआ। अब जसवंत सिंह बहुत सी बातें कह रहे हैं। अगर यह सच हैं तो भाजपा को राष्ट्र को बताना चाहिए कि उसने और क्या-क्या प्रपंच किए। झूठ का फीलगुड ऐसे ही फूटता है। सच जमीन पर महसूस होता है। यही वजह थी कि सबकी उम्मीद के खिलाफ जनता ने पिछले दोनों लोकसभा चुनावों में मात दी। क्या अब लोग उस पर विश्वास करेंगे। जनता से जुड़े मुद्दे यह पार्टी कभी उतनी शिद्दत से उठा नहीं सकी, जितनी तेजी से हिन्दू-मुस्लिम विवादों को इसने तूल दिया। मंदी की आग में लोग रोजगार गंवा रहे थे, मगर यह पार्टी चुप्प बैठी रही। महंगाई सिर से ऊपर हो रही थी, शेयर बाजार ने सबकी लुटिया डुबो दी थी। इस सबके बाबजूद कांग्रेस जीत गई, क्यों? क्योंकि भाजपा ने जनता से जुड़ी इन बातों को मुद्दा ही नहीं बनाया। वह विकास का कोई एजेंडा लोगों के सामने नहीं रख सकी। चुनाव आते ही उसने फिर हिन्दू-मुसलमान का राग छेडा़। गाली-गलोच और हो हल्ला की राह अपनाई। धार्मिक संगठनों से उम्मीद करती रही कि ये ही जिता देंगे।
देश की जनता अब बहुत पढ़लिख गई है। वह सत्तर और अस्सी के दशक जैसी नहीं है। आईटी में दुनिया में देश की तूती बोलती है। उसे देश के विकास का एजेंडा चाहिए। भाजपा की जो दुर्गति हो रही है, कांग्रेस को भी उससे सबक लेना चाहिए। झूठ की हाड़ी अब नहीं चढ़ने वाली। देश को महंगाई और रोजगार के मामले में ठोस काम चाहिए। बुराई का अंत कभी अच्छा नहीं होता। लालकृष्ण आडवाणी ने भले राजनीतिक जीवन में अनेक ऊंचाइयां छूईं मगर समय की कसोटी पर उनकी कई बातें सच साबित नहीं हुईं, वह वक्त की मशीन पर झूठ बोलते से लगे। यही वजह है कि उनके राजनीतिक जीवन से विदाई की बेला में संघ की ओर से बार-बार कहा जा रहा है कि नेतृत्व नए हाथ में सौंपो। शायद ही इतने बड़े नेता को कभी इस तरह राजनीति से धकेला जा रहा हो। आडवाणी जी के ऊपर है कि वह अब इस सबका पर्याश्चित कैसे करते हैं। लेकिन वह औरों के लिए भी एक सबक बन रहे हैं। देख रहे हो लालू जी, अमर सिंह जी, मुलायम जी, शरद पवार जी, मनमोहन और सोनिया जी। देश की पब्लिक झूठ पकड़ने की अब सबसे बड़ी मशीन है। जसवंत तो आज भेद खोल रहे हैं, देश की जनता तो २००४ में ही जान गई थी और उसने अपना फैसला भी दे दिया था।

Sunday, August 23, 2009

गरुड़ पुराण का नरक वर्णन

इनसान सद् मार्ग पर चले इसके लिए हमारे पूर्वजों ने उसे कई तरह के डर दिखाए हैं। इसके बावजूद बुराई समाज से खत्म नहीं हो पायी। यह भी संभव है कि पूर्वजों ने अपनी रचनाधर्मिता और कल्पनाशीलता के बल पर जो बातें लिखीं उसे ज्यादातर लोग पढ़ ही न पाये। थोड़ी बहुत व्यख्या होती रही वह भी जिसने की उसने अपनी बात जोड़ दी। इसके अलावा मेरा मन यह कहता है कि भय से कभी कुछ नहीं सिखाया जा सकता। पुराणों में खासकर गरुड़ पुराण में नरक की जो व्यख्या है उससे अधिक भयावह वर्णन कोई नहीं हो सकता। इसके बावजूद समाज में बुराई कम नहीं हुई। गरुड़ पुराण के इस िववरण को मैं यहां पर उद्धृत कर रहा हूं। यह इसके दूसरे अध्याय से है-
गरुड़जी ने कहा-हे केशव। यमलोक का मार्ग किस प्रकार दुखदायी होता है। पापीलोग वहां किस प्रकार जाते हैं मुझे बताइये।
श्रीभगवान बोले-हे गरुड़। महान दुख प्रदान करने वाले यममार्ग के विषय में मैं तुमसे कहता हूं, मेरा भक्त होनेपर भी तुम उसे सुनकर कांप उठोगे। यममार्ग में वृक्ष की छाया नहीं है, अन्न आदि भी नहीं है, वहां कहीं जल भी नहीं है, वहां प्रलयकाल की भांति बारह सूर्य तपते हैं। उस मार्ग से जाता हुआ पापी कभी बर्फीली हवा से पीडि़त होता है तो कभी कांटे चुभते हैं. कभी महाविषधर सर्पों द्वारा डसा जाता है, कहीं आग से जलाया जाता है, कहीं सिंहों, व्याघ्रों और भयंकर कुत्तों द्वारा खाया जाता है, कहीं बिच्छुओं द्वारा डसा जाता है। इसके बाद वह भयंकर असिपत्रवन नामक नरक में पहुंचता है जो दो हजार योजन के विस्तार वाला है। यह वन कौओं, उल्लुओं, गीधों, सरघों तथा डॉंसों से व्याप्त है। उसमें चारों ओर दावाग्नी है, वह जीव कहीं अंधे कुएं में गिरता है, कहीं पर्वत से गिरता है, कहीं छुरे की धार पर चलता है, कहीं कीलों के ऊपर चलता है, कहीं घने अन्धकार में गिरता है। कहीं उग्र जल में गिरता है, कहीं जोंकों से भरे हुए कीचड़ में गिरता है। कहीं तपी हुई बालुका से व्यापत और धधकते ताम्रमय मार्ग, कहीं अंगार राशि, कहीं अत्याधिक धुएं से भरे मार्ग पर उसे चलना पड़ता है। कहीं अंगार वृष्टि, कहीं बिजली गिरने, शिलावृष्टि, कहीं रक्तकी , कही शस्त्र की और कहीं गर्म जल की वृष्टि होती है। कहीं खारे कीचड़ की वृष्टि होती है। कहीं मवाद, रक्त तथा विष्ठा से भरे हुए तलाव हैं। यम मार्ग के बीचोबीच अत्यन्त उग्र और घोर वैतरणी नदी बहती है। वह देखनेपर दुखदायनी है। उसकी आवाज भय पैदा करने वाली है। वह सौ योजन चौड़ी और पीब तथा रक्त से भरी है। हड्डियों के समूह से उसके तट बने हैं। यह विशाल घड़ियालों से भरी है। हे गरुड़ आए पापी को देखकर वह नदी ज्वाला और धूम से भरकर कड़ाह में खौलते घी की तरह हो जाती है। यह नदी सूई के समान मुख वाले भयानक कीड़ों से भरी है। वज्र के समान चोंच वाले बडे़-बड़े गीध हैं। इसके प्रवाह में गिरे पापी हे भाई, हा पुत्र, हा तात। कहते हुए विलाप करते हैं। भूख-प्यास से व्याकुल हो पापी रक्त का पान करते हैं। बहुत से बिच्छु तथा काले सांपों से व्याप्त उस नदी के बीच में गिरे हुए पापियों की रक्षा करनेवाला कोई नहीं है। उसके सैंकड़ों, हजारों भंवरों में पड़कर पापी पाताल में चले जते हैं, क्षणभर में ही ऊपर चले आते हैं। कुछ पापी पाश में बंधे होते हैं। कुछ अंकुश में फंसा कर खींचे जाते हैं और कुछ कोओं द्वारा खींचे जाते हैं। वे पापी गरदन हाथ पैरों में जंजीरों से बंधे होते हैं उनकी पीठ पर लोहे के भार होते हैं। अत्यंत घोर यमदूतों द्वारा मुगदरों से पीटे जाते हुए रक्त वमन करते हैं तथा वमन कीए रक्त को पीते हैं। ---इस प्रकार सत्रह दिन तक वायु वेग से चलते हुए अठाहरवें दिन वह प्रेत सौम्यपुर में जाता है।
गरुड़ पुराण का यह वर्णन जाहिर है कि मनुष्यों को धर्माचरण और पाप से दूर रखने के लिए ही रचा गया होगा।

Saturday, August 22, 2009

मीमांसा के व्याख्या सिद्धांत ज्यादा वैज्ञानिक और सटीक

भारत में शब्दों की व्याख्या के ढाई हजार साल पुराना सिद्धांत मौजूद है लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इन्हें इस्तेमाल नहीं किया जाता। यहां तक कि हमारी अदालतें भी इन सिद्धांतों से अनभिज्ञ हैं और तथाकथित शिक्षित लोगों को इनकी जानकारी ही नहीं है। वकील अदालतों में क्रैईस और मैक्सेवेल के व्याख्या सिद्धांतों का उल्लेख तो करते हैं लेकिन मीमांसा सिद्धांतों का कभी जिक्र नहीं करते, शायद उन्होंने इसके बारे में कभी सुना भी नहीं होगा, जबकि ये सिद्धांत ज्यादा सटीक, वैज्ञानिक और तर्कसंगत हैं। यह कहना सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू का। जस्टिस काटजू इससे पूर्व भी मेरठ के एक मामले में बैलगाड़ी खेती का उपकरण है या नहीं, का फैसला कर चुके हैं। उन्होंने मीमांसा सिद्धांतों का प्रयोग करते हुए स्पष्ट किया था कि बैलगाड़ी फसल और सवारियां ढोने में काम आती है इसलिए इसकी खरीद पर सब्सिडी देना उचित है। उन्होंने कहा कि मैक्सवेल के व्याख्या सिद्धांतों का पहला संस्करण 18६5 में प्रकाशित हुआ था जबकि हमारे यहां ये सिद्धांत ढाई हजार वर्षों से मौजूद हैं। उदाहरण के तौर पर कहा जाता है कि 'न कलंजं भक्ष्येते यानी बासी खाना मत खाओ। यही भूमि अधिग्रहण एक्ट की धारा 6 में कहा गया है। इसमें स्पष्ट मनाही है कि समय सीमा बीतने के बाद भू-अधिग्रहण की सूचना प्रकाशित नहीं की जाएगी। जब कानून में स्पष्ट मनाही है तो उसकी व्याख्या कर इसे हां में कैसे बदला जा सकता है। सौ वर्ष पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सर जॉन एज ने बेनीप्रसाद बनाम हरदेयी बाई (१७८2) के केस में इन सिद्धांतों का प्रयोग किया इसके बाद मार्कंडेय काटजू ने इनका प्रयोग किया लेकिन फिर इन सिद्धांतों का इस्तेमाल नहीं हुआ है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में जैमिनी ने अपने मीमांसा सूत्र बनाए और इनकी सबर , कुमारिल भट्ट, प्रभाकर और मंडन मिश्रा ने व्याख्या की। इन सूत्रों को प्रख्यात न्यायविद विज्ञानेश्वर(उत्तर और दक्षिण भारत में लागू हिन्दू लॉ मिताक्षर के लेखक), जिमुत्वहन (बंगाल में लागू हिन्दू लॉ दयाभाग के लेखक), नंदा पंडित (दत्तक मीमांसा लेखक) ने प्रयोग किया है। जब भी मनुस्मृत्ति तथा यज्ञवल्क्य स्मृति में टकराव होता था इन सूत्रों का इस्तेमाल कर इसे दूर कर लिया जाता था। (दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित जस्टिस काटजू के व्याख्यान से)

Friday, August 21, 2009

अचानक ये लाखों तितलियां कहां से आईं

सुधीर राघव
चंडीगढ़ और इसके आसपास के इलाकों में लाखों तितलियों के झुंड पूर्व से पश्चिम की ओर उड़ रहे हैं। ये तितलियां कुछ हरापन लिए पीली सी हैं। सभी एक ही परिवार की दिखती हैं। इतनी बड़ी संख्या को कुछ लोग किसी बड़े अनिष्ट का संकेत भी मान रहे हैं। हालांकि तितली विशेषग्य इस बात से खुश हैं कि ज्यादा तितलियां पर्यावरण बेहतर होने का संकेत हैं। इस तितली के बारे में कीट विग्यानी भी कई रोचक बातें बताते हैं-
कैटोप्सिलिया प्य्रेंथे मध्यम आकार की यह तितली पिएरिडे परिवार की है। इस परिवार की 8१ प्रजातियां भारत में पायी जाती हैं। आजकल चंडीगढ़ और इसके आसपास के इलाकों में जो तितलियां उड़ रही हैं वे इन्हीं में से एक हैं। चंडीगढ़ में उड़ रही तितलियां हरापन लिए हुए पीले रंग की हैं। इनके पंखों में कोई निशान भी नहीं है। हलांकि इस परिवार की अन्य प्रजातियों में काले रंग के निशान भी पाये जाते हैं। इनमें नर के पंख चाक जैसा सफेद होते हैं, जबकि मादा हरापन लिए पीले रंग के पंखों वाली है। अंडे से वयस्क बनने तक का इनका जीवन चक्र 2२ से 29 दिन का होता है। एक साल में इनकी 1१ से 12 पीढिय़ां हो जाती हैं। ये मुख्यत: दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य अफ्रीका, साउदी अरब के दक्षिण हिस्सों में और न्यू गुएना में पायी जाती हैं।
आजादी से पहले ब्रिगेडियर डब्ल्यू.एच. इ. वेन्स ने तितलियों पर काफी काम किया था, उन्होंने भारत और बर्मा में तितलियों की 14३८ प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की थी। मौजूदा समय में भारत में तितलियों के पांच परिवार बसते हैं। इनकी सैंकड़ों प्रजातियां हैं।
पहला परिवार है पैपिलियोनिडे है। दुनिया में इसकी करीब साढ़े 5 सौ प्रजातियां है इनमें भारत में 8४ पायी जाती हैं। ये बड़ी आकार की तथा खूबसूरत होती हैं। इनके पंख काफी चमकीले होते हैं। आपके किचन गार्डन में आकर ये सबसे पहले आपका ध्यान खींचती हैं। न्यम्पेलिडे परिवार दुनियां में तितलियों का सबसे बड़ा परिवार माना जाता है। क्षेत्र के हिसाब से अलग रंग-रूप के चलते इस परिवार की कई हजार प्रजातियां हैं। इनमें 48 प्रजातियां भारत में भी पायी जाती हैं। ये तितलियां मध्यम आकार की होती हैं और अनेक रंगों में मिलती हैं।
पिएरिडे परिवार की तितलियां तेज रफ्तार से उडऩे के लिए जानी जाती हैं। आकार मध्यम होता है। भारत में इस परिवार की 8१ प्रजातियां पायी जाती हैं। यह पीले और सफेद रंग की होती हैं तथा कुछ में काले निशान भी होते हैं।
रिडीनिडे परिवार की तितलियांये तितलियां आकार में छोटी धातु के रंग की चमकीली होती हैं। इन पर ऐसे ही रंगों के चकत्ते भी रहते हैं। दुनियाभर में इनकी हजार के करीब प्रजातियां हैं, जिनमें 8४ भारत में पायी जाती हैं।
ल्यकाईनीडे परिवार तितलियों का दुनिया में दूसरा बड़ा परिवार है। इसकी छह हजार से ज्यादा प्रजातियां हैं। इनकी एक खासीयत यह भी है कि इनके लारवा यानी केटरपिलर अपने भोजन के लिए चींटियों पर निर्भर करते हैं। एक तरह से ये चींटियों की सफाई करते हैं।

Thursday, August 20, 2009

नासा ने भी कहा-धरती पर जीवन अन्य ग्रह से आया

नासा ने अपनी साइट पर यह जानकारी डाली है कि धरती पर जीवन कहीं अन्य ग्रह से आया इसकी पुष्टि उसके प्रयोग से हुई है। नासा के डॉ जैसी एलसिला के अनुसार नासा के वैग्यानिकों ने जीवन के मूल तत्व ग्लाइसिन को एक धूमकेतु में पाया है। नासा का यान धूमकेतु वाइल्ड-२ के धूल अंश लेकर लौटा था। इसके अध्ययन के बाद यह पुष्टि की गई है। डॉ एलसिला के अनुसार ग्लाइसिन एक अमीनो एसिड है। इसीसे प्रोटीन और जीव बनते हैं। वह कहते हैं कि यह खोज बताती है कि धरती पर जीवन वर्षों पहले किसी उल्का पर सवार होकर ही शायद आया हो।
धरती पर जैव विकास की डार्विन से आगे की थ्योरी लेकर कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के माल्युकुलर जीव वैग्यानी जैम्स ए लेक भी हाजिर हैं। उनका शोध नचर साइस के २० ऑनलाइन संस्करण में दिया गया है। नासा ने भी इसे अपनी साइट पर रखा है। लेक कहते हैं कि २.५ अरब वर्ष पहले एक कोशकीय केंद्र रहित प्रोकार्योट्स ने जीवन की नींव रखी। तब इस माइक्रोब्स की एक समान दो प्रजातियां थीं, इन दोनों में संयुक्तरूप से यह क्षमता थी कि ये प्रकाश संशलेषण के जरिए सूर्य की रोशनी से सीधे ऊर्जा ले सकती थीं। उनकी इस क्रिया से ऑक्सीजन पैदा होती थी। ऐसा होने पर धरती ऑक्सीजन से भर गई। तब प्रोकार्योट्स ने आपस में मिल कर अधिक जटिल कोशकीय जीव बनाए जो ऑक्सीजन का इस्तेमाल कर फिर से कार्बन डाई ऑक्साइड में बदल सकें। इन्हीं जीवों में विकास होते हुए मानव बना है। इन जटिल जीवों को ही डबल मैम्बरेन प्रोकार्योट्स कहा गया।
हमारे वेदों और पुराणों में भी जीवन के किसी अन्य ग्रह संभवतः ब्रह्मलोक से आने के संकेत मिलते हैं। कम से कम तीन ऐसे ग्यात लोकों का जिक्र आता है, जहां जीवन रहा है- ये हैं स्वर्ग लोक, मृत्यु लोक (धरती) और पाताल लोक। इसलिए हमारे ग्रंथों को भी वैग्यानिक दृष्टि से पढ़े जाने की जरूरत है।
-सुधीर राघव

Monday, August 17, 2009

जिन्ना के अनुयायी

-सुधीर राघव
बड़ी-बड़ी बातें करते थे
ये कैसे भाजपायी निकले
सावरकर की बात छेड़कर
जिन्ना के अनुयायी निकले।
मस्जिद-मंदिर करवा डाला
बहुतों को यों मरवा डाला
मानवता के कसाई निकले
कैसे ये भाजपायी निकले
जिन्ना के अनुयायी निकले।
माफ करो ऐ, शिया-सुन्नी
ये अबला की छीनें चुन्नी
ये न किसी के भाई निकले
ये कैसे भाजपायी निकले
जिन्ना के अनुयायी निकले।
आडवाणी ने टेका माथा
जसवंत की अपनी गाथा
रामकसम हरजाई निकले
ये कैसे भाजपायी निकले
जिन्ना के अनुयायी निकले।
जिन्ना ने तो सरहद बांटी
करें ये दिल की काटा-काटी
कैसे-कैसे सौदाई निकले
ये कैसे भाजपायी निकले
जिन्ना के अनुयायी निकले।।
(जसवंत सिंह द्वारा जिन्ना को डेविल्स एडवोकेट कार्यक्रम में महान भारतीय बताने के बाद )